UP चुनाव: सपा 60-70 सीट देने को तैयार, कांग्रेस 105 पर अड़ी?

Published on 15 सित॰ 2026

UP चुनाव: सपा 60-70 सीट देने को तैयार, कांग्रेस 105 पर अड़ी?

अखिलेश यादव और राहुल गांधी

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में अभी करीब छह महीने का वक्त बाकी है, लेकिन सत्ता की लड़ाई से पहले गठबंधनों के भीतर सीटों की लड़ाई शुरू हो गई है. सबसे ज्यादा नजर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच होने वाली सीटों की बातचीत पर है. सूत्रों के मुताबिक, समाजवादी पार्टी अपनी आंतरिक टीम के साथ कांग्रेस को करीब 60 से 70 सीटें देने के विकल्प पर मंथन कर रही है. इसके लिए हर जिले और हर संभावित सीट का जातीय समीकरण, संगठन की स्थिति और जीत की संभावना का आकलन किया जा रहा है.

इतना ही नहीं, जिन सीटों पर कांग्रेस को उतारने पर विचार हो रहा है, वहां के संभावित दावेदारों से भी संपर्क साधा जा रहा है, ताकि बाद में टिकट को लेकर असंतोष न उभरे, लेकिन कांग्रेस की दावेदारी इससे काफी ज्यादा है. कांग्रेस 2017 के सपा-कांग्रेस गठबंधन को आधार बनाकर करीब 105 सीटों का दावा कर रही है. तो सवाल है कि सपा, कांग्रेस को सिर्फ 60-70 सीट क्यों देना चाहती है? और क्या कांग्रेस मानेगी?

चुनाव से पहले सीटों का खेल शुरू

2027 का चुनाव अभी दूर है, लेकिन समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने सीटों के गणित पर काम शुरू कर दिया है. सूत्रों के मुताबिक, सपा की ओर से हर जिले की सीटों पर अलग-अलग स्तर पर जानकारी जुटाई जा रही है. कहां किस जाति की कितनी प्रभावी मौजूदगी है… किस सीट पर कौन सा दल मजबूत है… किस सीट पर पिछली बार किसका प्रदर्शन कैसा रहा… किस संभावित उम्मीदवार की जमीन पर पकड़ है… और सबसे अहम… कौन सी सीट गठबंधन के लिए जीती जा सकती है? इसी आधार पर सपा कांग्रेस के लिए सीटों का प्रारंभिक खाका तैयार कर रही है.

सपा का संदेश- सीट नहीं, जीत महत्वपूर्ण

अखिलेश यादव पहले भी गठबंधन की राजनीति को लेकर संकेत देते रहे हैं कि सिर्फ सीटों की संख्या महत्वपूर्ण नहीं है. महत्वपूर्ण ये है कि जिस सीट पर जिस दल की जीत की संभावना ज्यादा है, वहां उसी दल को आगे किया जाए. यही सोच 2027 के सीट बंटवारे में भी दिखाई दे सकती है. यानी सपा का संभावित तर्क होगा कि सिर्फ इसलिए किसी सीट पर दावा नहीं माना जा सकता कि वहां कांग्रेस पहले चुनाव लड़ चुकी है. पहले ये देखना होगा कि आज उस सीट पर कांग्रेस की जमीन कितनी मजबूत है.

कांग्रेस के संभावित उम्मीदवारों की सूची भी मांगी गई

सूत्रों के मुताबिक, सीटों पर बातचीत के बीच सपा ने कांग्रेस से उसके संभावित उम्मीदवारों की जानकारी भी मांगी है. इसका मतलब साफ है कि कांग्रेस को सिर्फ ये नहीं बताना होगा कि उसे कौन-कौन सी सीट चाहिए बल्कि उसे ये भी बताना होगा कि इन सीटों पर चुनाव जीतने वाला चेहरा कौन है… कहां कांग्रेस के पास मजबूत स्थानीय संगठन है… कहां पुराने कार्यकर्ता सक्रिय हैं… कहां उसका पारंपरिक मतदाता आधार मौजूद है… और कहां वह भाजपा या अन्य दलों को सीधी चुनौती देने की स्थिति में है… इन सभी पहलुओं पर बातचीत हो सकती है.

किन जिलों पर सपा-कांग्रेस की नजर?

सूत्रों के मुताबिक, जिन जिलों की कई सीटों पर कांग्रेस की दावेदारी पर विचार हो रहा है, उनमें रायबरेली, लखनऊ, गोरखपुर, महाराजगंज, आगरा, वाराणसी, बाराबंकी, लखीमपुर, अमेठी, गाजियाबाद, गौतमबुद्धनगर, गोंडा, जौनपुर, मेरठ, सहारनपुर, प्रतापगढ़, हाथरस, कानपुर और प्रयागराज जैसे जिले शामिल हैं. इनमें कुछ ऐसे जिले हैं जहां कांग्रेस का पुराना राजनीतिक आधार है… कुछ ऐसे हैं जहां शहरी मतदाता महत्वपूर्ण हैं…और कुछ सीटों पर कांग्रेस अपने पुराने संगठन और स्थानीय नेताओं के आधार पर दावा कर सकती है.

अमेठी-रायबरेली पर सबसे पेचीदा बातचीत

सीट बंटवारे में सबसे दिलचस्प लड़ाई उन सीटों पर हो सकती है जिन्हें कांग्रेस अपनी राजनीतिक पहचान से जोड़ती है. अमेठी और रायबरेली इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं. कांग्रेस के लिए ये सिर्फ दो लोकसभा क्षेत्र नहीं हैं… इन सीटों का जुड़ाव पार्टी के दशकों पुराने राजनीतिक आधार से रहा है… हालांकि, 2022 के चुनाव में कांग्रेस दोनों जिलों की एक सीट नहीं जीत पाई थी और सपा ने रायबरेली की 4 और अमेठी की 2 सीटों पर जीत दर्ज की थी. सपा दोनों जिलों की एक-एक सीट ही कांग्रेस को देने पर विचार कर रही है.

सपा का शहरी सीटों पर दांव?

सूत्रों के मुताबिक, सपा कांग्रेस को बड़ी संख्या में शहरी और अर्धशहरी सीटें देने के विकल्प पर भी विचार कर रही है. लखनऊ, कानपुर, मेरठ, गाजियाबाद, गौतमबुद्धनगर, आगरा, प्रयागराज और वाराणसी… जैसे शहरों में कांग्रेस की संभावित दावेदारी इसी रणनीति का हिस्सा हो सकती है. सपा का आकलन हो सकता है कि इन क्षेत्रों में कांग्रेस का शहरी संगठन और पारंपरिक मतदाता आधार गठबंधन को फायदा दे सकता है. हालांकि कांग्रेस की नजर उन ग्रामीण और अर्धशहरी सीटों पर भी होगी जहां उसके पुराने नेता और संगठन सक्रिय हैं.

2017 का 105 सीट वाला उदाहरण

अब आते हैं कांग्रेस की सबसे बड़ी दावेदारी पर. कांग्रेस की ओर से 2017 के विधानसभा चुनाव का उदाहरण दिया जा रहा है. उस चुनाव में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने गठबंधन करके चुनाव लड़ा था. सीट बंटवारे में कांग्रेस को 105 सीटें मिली थीं. हालांकि चुनावी नतीजों में कांग्रेस सिर्फ 7 सीटों पर जीत हासिल कर सकी. यही आंकड़ा अब सपा के लिए कांग्रेस की मौजूदा दावेदारी पर सवाल उठाने का आधार बन सकता है. सपा का तर्क हो सकता है कि 2017 का राजनीतिक वातावरण अलग था… तब के समीकरण अलग थे… और आज गठबंधन की जमीन भी अलग है.

पंकज चतुर्वेदी

पंकज चतुर्वेदी

पंकज चतुर्वेदी को पत्रकारतिा के क्षेत्र में एक दशक से ज्यादा का अनुभव है. देश और उत्तरप्रदेश की राजनीति को कवर करते आ रहे हैं. दिल्ली में अमर उजाला और पंजाब केसरी से पत्रकारिता की यात्रा की शुरुआत हुई.  दिल्ली में 2 साल की पत्रकारिता के बाद मिट्टी की खुशबू यूपी खींच लाई और तब से राजधानी लखनऊ में ही पत्रकारिता हो रही है. 2017 में यात्रा को विस्तार देते हुए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े. राजनीतिक खबरों में गहरी रुचि और अंदर की खबर को बाहर लाने का हुनर, साथ ही यूपी की ब्यूरोकेसी में खास पकड़.  पत्रकारिता का फलसफा खबरों को खबर के रूप में ही जनता तक पहुंचाना.

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