भारत में आज के समय में सुबह की चाय से लेकर राशन के बिल तक, हर जगह यूपीआई (UPI) का इस्तेमाल आम बात हो गई है. ऐसे में जब यूपीआई पर चार्ज लगने की खबरें आती हैं, तो हर आम आदमी की चिंता बढ़ जाती है. हाल ही में संसद में पेश हुए नए बिल के बाद यह बहस फिर से तेज हो गई है कि क्या अब डिजिटल पेमेंट करने पर हमारी जेब ढीली होगी? इस पूरे मामले पर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने 5 अगस्त को एक अहम बयान देकर स्थिति को साफ करने की कोशिश की है.
क्या आपकी जेब पर पड़ेगा असर?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या आम ग्राहक को यूपीआई इस्तेमाल करने के लिए पैसे देने होंगे? फिलहाल इसका जवाब ‘नहीं’ है. अभी तक ग्राहकों, दुकानदारों या किसी भी तरह के यूपीआई लेनदेन पर कोई नया चार्ज लागू नहीं किया गया है. मौद्रिक नीति के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने साफ किया कि अभी यह तय करना बहुत जल्दबाजी होगी कि अगर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू होता है, तो उसका वित्तीय बोझ कौन उठाएगा. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पेमेंट नेटवर्क को चलाने में खर्च आता है, जिसकी भरपाई किसी न किसी को करनी होती है. कई बार ग्राहक किसी न किसी रूप में इस बुनियादी ढांचे का खर्च अप्रत्यक्ष तौर पर उठाते ही हैं, भले ही वह सीधे तौर पर कोई ट्रांजैक्शन फीस न दे रहे हों.
2000 रुपये की लिमिट का क्या है नया फॉर्मूला
मीडिया रिपोर्ट्स और अधिकारियों के हवाले से यह बात सामने आ रही है कि सरकार 2,000 रुपये से ज्यादा के कमर्शियल यूपीआई पेमेंट (व्यापारियों को किए गए भुगतान) पर 0.5 प्रतिशत से कम का एमडीआर लगाने पर विचार कर रही है. राहत की बात यह है कि एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति (P2P) को भेजे जाने वाले पैसे इस प्रस्तावित ढांचे से पूरी तरह बाहर रहेंगे. आंकड़ों के मुताबिक, 2,000 रुपये से ऊपर के लेनदेन भले ही कुल यूपीआई पेमेंट का सिर्फ 5 फीसदी हों, लेकिन कुल वैल्यू में इनकी हिस्सेदारी लगभग 65 प्रतिशत है. इस नियम के लागू होने से छोटे भुगतानों पर कोई असर नहीं पड़ेगा. हालांकि, बिल में अभी तक किसी तय रेट या 2,000 रुपये की सीमा का कोई जिक्र नहीं किया गया है.
नए बिल से कैसे बदलेंगे डिजिटल पेमेंट के नियम
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 4 अगस्त को ‘कराधान और अन्य कानून (संशोधन) विधेयक, 2026’ पेश किया. यह नया बिल पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम एक्ट, 2007 की धारा 10A में बड़ा बदलाव करेगा. इसका सीधा मतलब यह है कि अब केंद्र सरकार के पास यह तय करने का अधिकार होगा कि कौन से इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट मोड पूरी तरह मुफ्त रहेंगे और किन पर चार्ज लगाया जा सकेगा. जब तक यह बिल कानून नहीं बन जाता और कोई नई गाइडलाइन नहीं आती, तब तक यूपीआई और रुपे डेबिट कार्ड पर जनवरी 2020 से चला आ रहा ‘जीरो-एमडीआर’ नियम ही लागू रहेगा.
क्यों उठ रही चार्ज लगाने की मांग
सरकार ने डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देने के लिए यूपीआई पर चार्ज को खत्म कर दिया था. लेकिन अब सिस्टम को चलाने वाले बैंक और पेमेंट कंपनियां लंबे समय से एक रेवेन्यू मॉडल की मांग कर रही हैं. उनका तर्क है कि तकनीक, साइबर सुरक्षा और नेटवर्क को संभालने में उनका भारी खर्च होता है. मार्च 2026 में आई संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट में भी इस बात पर मुहर लगाई गई कि सरकारी इंसेंटिव इंडस्ट्री के खर्चों को पूरा करने के लिए काफी नहीं हैं. जुलाई महीने में ही यूपीआई से 29.88 लाख करोड़ रुपये के 23.66 अरब लेनदेन हुए हैं. इतने विशाल नेटवर्क को सुरक्षित और सुचारू रूप से चलाने के लिए अब एक टिकाऊ वित्तीय ढांचे की तलाश की जा रही है.

विभव शुक्ला
विभव शुक्ला वर्तमान में TV9 हिंदी में सीनियर सब-एडिटर के तौर पर बिजनेस डेस्क पर कार्यरत हैं. पत्रकारिता में उन्हें छह वर्षों का अनुभव है. विभव मूल रूप से उत्तर प्रदेश के मऊ जिले के रहने वाले हैं. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत राजस्थान पत्रिका से की थी. इसके बाद वह Inshorts और गुजरात फर्स्ट जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से जुड़े रहे हैं.
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