बिहार: बाढ़ प्रभावित इलाकों में सैकड़ों सरकारी स्कूल खस्ताहाल, पढ़ने वाले लाखों बच्चों की मुश्किलें क्या हैं?

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- Author, सीटू तिवारी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- ........से, पटना
प्रकाशित 7 घंटे पहले
पढ़ने का समय: 10 मिनट
बिहार में इस साल आई बाढ़ से 15 ज़िलों की क़रीब 50 लाख से ज़्यादा आबादी प्रभावित है. ये आलम तब है जब आपदा प्रबंधन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, राज्य में सामान्य से 28 प्रतिशत कम बारिश हुई है.
इन इलाकों में रहने वाले लोगों को कई बार अपना बना-बनाया बसेरा छोड़कर कहीं और शरण लेनी पड़ती है. रोजगार और गृहस्थी तो प्रभावित होती ही है और बच्चों की पढ़ाई पर भी इसका असर पड़ता है.
राज्य के 1,400 से ज़्यादा सरकारी स्कूल बाढ़ से प्रभावित हैं और तीन लाख से ज़्यादा स्टूडेंट्स की पढ़ाई पर इसका असर पड़ा है.
बीबीसी ने पटना ज़िले के बाढ़ प्रभावित इलाकों में सरकारी स्कूलों और उसमें पढ़ने वाले स्टूडेंट्स से बातचीत के आधार पर ये रिपोर्ट तैयार की है.
चौथी क्लास में पढ़ने वाली सनाया कुमारी भी इन्हीं बच्चों में से एक हैं. वह पुनपुन के प्राइमरी स्कूल मुंडीचक में पढ़ती हैं.
71 स्टूडेंट्स वाला ये स्कूल चारों तरफ़ से पानी से घिरा है और यह एक टापू जैसा दिखता है.
सनाया 'स्कूल डूब गया है..' कहकर थोड़ी देर के लिए चुप हो जाती हैं.
केरल में मजदूरी करने वाले उनके पिता पप्पू कुमार बाढ़ के हालात को देखकर अपने गांव लौट आए हैं. राज्य की राजधानी पटना से महज़ 15 किलोमीटर दूर स्थित मुंडीचक गांव में सनाया का घर है.
फूस की झोपड़ी वाला ये घर पानी में डूबा हुआ है.

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सनाया की मां मनीषा देवी का कहना है कि उनके पति बाढ़ की चिंता के बीच केरल से लौट तो आए हैं लेकिन यहां अब उनके पास कोई रोजगार नहीं है. ऐसे में घर चलाना भी मुश्किल है.
वो दोनों ही पति-पत्नी पढ़े-लिखे नहीं हैं और उनकी तमन्ना है कि उनकी बेटी बैंक मैनेजर बने.
बिहार के कुल 38 ज़िलों में से 28 ज़िले ऐसे हैं, जहां बाढ़ आने का ख़तरा बना रहता है.
प्राथमिक विद्यालय मुंडीचक में रेशमी कुमारी के भी दो बच्चे पढ़ते हैं. उनका घर भी कमर तक पुनपुन नदी से आए बाढ़ के पानी में डूबा है.
रेशमी बेबसी में कहती हैं, "मेरे चार बच्चे हैं. दो बच्चे सरकारी स्कूल में जाते थे लेकिन स्कूल ही डूब गया. बच्चों को मैंने उनकी नानी के यहां भेज दिया है. इधर रहेंगे तो डूबने का ख़तरा रहता है. पानी निकलेगा, तब स्कूल खुलेगा. लेकिन बच्चे जो सीख चुके थे, वो खेलने-कूदने में भूल जाएंगे."
'सारी पढ़ाई-लिखाई चौपट हो गई'
अपने बच्चों की पढ़ाई को लेकर मनीषा देवी और रेशमी जैसी कशमकश से जगत कुमार विभाकर भी गुजर रहे हैं.
पेशे से मजदूर जगत कुमार विभाकर के दो बेटे नौवीं और बारहवीं कक्षा के छात्र हैं. ये दोनों उच्च माध्यमिक विद्यालय, खोखना (फतुहा) में पढ़ते हैं.
उनके स्कूल का रास्ता गांव के बगीचे से होकर गुज़रता है जहां पानी जमा है.
जगत कुमार के बेटे प्रिंस बारहवीं कक्षा में साइंस स्ट्रीम के छात्र हैं और मर्चेन्ट नेवी में अपना करियर बनाना चाहते हैं.

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वो कहते हैं, "हमारे स्कूल के सभी शिक्षकों की ड्यूटी दूसरी जगह लगाई गई है. कुछ टीचर 12वीं का फ़ॉर्म भरवाने के लिए मंदिर के पास बैठते हैं. स्कूल और कोचिंग में दोस्तों के साथ पढ़ने में थोड़ा जुनून रहता है. ऐसे अकेले घर में अच्छा नहीं लगता है. मुझे अपने भविष्य की चिंता हो रही है."
प्रिंस के पिता जगत कुमार भी अपने बेटे को लेकर परेशान हैं.
वो कहते हैं, "बच्चों पर पढ़ाई छूटने का प्रभाव पड़ा है. कोचिंग भी बंद है. हम लोग कुछ कर भी नहीं सकते. गरीब आदमी कितना करेगा. जितना सक्षम है, उतना पढ़ाते हैं. लेकिन अब बाढ़ आ गई तो क्या कर सकते हैं?"
कुछ स्कूलों में पानी तो घटा मगर..

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राज्य में कई जगह बाढ़ का प्रभाव फ़िलहाल कम हो रहा है.
बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को पटना के पुनपुन, फतुहा और फुलवारी शरीफ़ में कुछ ऐसे सरकारी स्कूल मिले, जहां अब बाढ़ का पानी नहीं है.
लेकिन इन स्कूलों में बाढ़ के पानी के साथ आई गंदगी जमा है जो बीमारियों को न्योता दे रही है. इनमें से कुछ स्कूलों में पढ़ाई-लिखाई शुरू हो गई है, कुछ में शिक्षकों ने आना शुरू कर दिया है और कुछ में ताला लगा है.
फतुहा के रानीपुर स्थित प्राथमिक विद्यालय में पढ़ाई शुरू हो चुकी है. स्कूल के बाहर जमा पानी में ईंटों के सहारे स्टूडेंट्स के आने-जाने के लिए रास्ता बनाया गया है.
जब हम स्कूल पहुंचे तो स्कूल के सभी नलों को एहतियातन खोल दिया गया था ताकि पानी में से आ रही बदबू ख़त्म हो सके.

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स्कूल आने वाले स्टूडेंट्स यही पानी पीते हैं. इस स्कूल में महज दो कमरे हैं जिनमें पांचवी क्लास तक पढ़ाई होती है.
इसमें से भी एक कमरे में मिड डे मिल का सामान यानी बर्तन और अनाज रखने की जगह बनानी पड़ती है.
बाढ़ का पानी उतरने के बाद स्कूल के शिक्षकों ने यहां की सफाई करवाई है लेकिन ब्लीचिंग पाउडर और अन्य ज़रूरी चीजों का छिड़काव नहीं किया गया है.
स्कूल के प्रधान शिक्षक मोहम्मद अरशद बताते हैं, "सरकार ने छिड़काव या साफ़ सफाई के लिए कोई पाउडर नहीं दिया है. बाहर बाढ़ का पानी जमा हुआ है, जिसके लिए कोई इंतज़ाम नहीं है."
लेकिन इससे स्टूडेंट्स के बीमार होने का ख़तरा है?
इस सवाल पर अरशद कहते हैं, "मेरे पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं है क्योंकि स्कूल चलाना है. स्कूल नहीं चलाएंगे तो मुझ पर ही गाज़ गिर जाएगी."

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ब्लीचिंग पाउडर की व्यवस्था को लेकर बीबीसी ने जब शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी से पूछा तो उनका कहना था, "ग्राम पंचायत इसके लिए अधिकृत हैं. ग्राम पंचायत का काम है कि ब्लीचिंग पाउडर आदि का छिड़काव करे."
पुनपुन के ही प्राथमिक विद्दालय महीतपुर तेतरी का प्राथमिक विद्यालय खुला है. लेकिन उसमें अभी सिर्फ़ शिक्षक ही उपस्थित हैं. इस स्कूल में पढ़ाने वाली शिक्षिका चंपा कुमारी बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहती हैं, "बच्चों की सुरक्षा को देखते हुए अभी हम लोगों ने स्कूल में पढ़ाई शुरू नहीं की है. सांपों को दूर रखने वाला पाउडर छिड़कवाकर स्कूल शुरू कर देने की कोशिश रहेगी."
बाढ़ में तैरकर कोचिंग पढ़ने आते-जाते हैं

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इन सबके बीच सबसे बड़ी मुश्किल में गंगा के दियारा में बसे स्कूली बच्चों की है.
पटना के नकटा दियारा में सभी सरकारी और गैर सरकारी स्कूल पानी में डूबे हुए हैं. बाढ़ के पानी के बीच फंसे स्कूली बच्चे बड़ी तादाद में रोजाना पटना शहर की तरफ़ नाव से आते हैं.
ख़तरे के निशान से ऊपर बहती गंगा में ओवरलोडेड नाव जिसमें आम लोग बैठे होते हैं और इनके साथ ही साइकिल, घर गृहस्थी का सामान, दूध के बड़े-बड़े कैन, जानवरों का भूसा, आलू के बोरे रखे होते हैं.
इन नावों से यात्रा करने वालों में छोटे बच्चों से लेकर दसवीं क्लास में पढ़ने वाले स्टूडेंट्स शामिल हैं.
नंदिनी कुमारी ऐसी ही एक सातवीं कक्षा की स्टूडेंट हैं. वो नकटा दियारा से रोजाना पटना शहर में कोचिंग पढ़ने आती हैं. वो जिस सरकारी स्कूल में पढ़ती हैं, वो बाढ़ के पानी में डूबा हुआ है.
गंगा के मीनार घाट पर नाव का इंतजार कर रही नंदिनी बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहती हैं, "बाढ़ के पानी में हेल कर (तैरकर) कोचिंग पढ़ने के लिए आते जाते हैं. नाव में डर लगता है. सरकार को कुछ करना चाहिए. अगर कोचिंग पढ़ने नहीं आएंगे तो पढ़ाई में पीछे हो जाएंगे. सातवीं कक्षा में चले गए हैं."
इसी मीनार घाट पर हमें बादल कुमार भी मिले. वो स्कूल की ड्रेस में थे और रोजाना नदी पार करके स्कूल जाते हैं. बादल कुमार प्राइवेट स्कूल में पढ़ते हैं. वो कहते हैं, "डर लगता है फिर भी आते हैं."
गंगा माई हमें बचाएं चाहे डुबाए

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मीनार घाट पर गंगा के विस्तार देखकर डर लग जाता है. यहां पर लोगों को नाव के लिए घंटों का इंतज़ार करना पड़ता है. एक नाव भरने के बाद ही दूसरी नाव आती है.
ऐसे में ज़्यादातर नाव ओवरलोडेड चल रही होती हैं. नाव पर सवार लोग तेज धूप में खुद को राहत देने के लिए छाते का सहारा लेते हैं.
नकटा दियारा में रहने वाले छोटू कुमार कहते हैं, "नाव उतारेगी उसके बाद भी सब लोग कमर भर पानी में घुसकर ही अपने घर पहुंच पाएंगे क्योंकि वो डूबा हुआ है. बहुत रिस्क है लेकिन दियर (दियारा) के आदमी की ज़िंदगी ऐसे ही चलती है."
गंगा की विशालता को देखते हुए कुछ अभिभावकों ने अपने बच्चों को पटना शहर में रहने वाले अपने रिश्तेदारों के यहां ही शिफ्ट कर दिया है.
घाट पर रूआंसी बैठी बबिता कुमारी ने भी अपने नौ साल और 15 साल के बच्चों को पटना शहर में रहने वाले रिश्तेदार के यहां भेज दिया है. वो रोते हुए कहती हैं, " अब गंगा माई चाहे हमें बचाए या डुबाएं."
वो बताती हैं, "बच्चे रिश्तेदार के यहां से जाकर पढ़ेंगे. सरकार पुल दे देगी तो बच्चे खुद से आएंगे-जाएंगे."
शिक्षकों की परेशानियां

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राज्य में फ़िलहाल अर्धवार्षिक यानी छमाही परीक्षाएं चल रही हैं. शिक्षा विभाग ने घोषणा की है कि बाढ़ से प्रभावित स्कूल में ये परीक्षाएं बाद में शेड्यूल की जाएंगी.
हर साल बाढ़ से जूझते बिहार में बाढ़ प्रभावित स्कूलों के शिक्षकों की सेवाएं दो तरह से ली जाती हैं.
पहला राहत शिविरों में उनकी नियुक्ति की जाती है जहां उन्हें राहत शिविर में पहुंचे स्कूली बच्चों को पढ़ाना होता है और दूसरा उनको अपने मूल स्कूल के आसपास किसी अन्य स्कूल में टैग कर दिया जाता है.
लेकिन ज़मीनी स्तर पर ये बहुत प्रभावी नहीं होता.
आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के पूर्व उपाध्यक्ष व्यासजी ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "सरकार राहत शिविरों में बच्चों को पढ़ाने की व्यवस्था करती है लेकिन ये स्कूल जितना प्रभावी नहीं होता. इसकी कई वजह है जिसमें से एक वजह तो यही है कि सभी बाढ़ प्रभावित लोग राहत शिविरों तक नहीं पहुंचते. उनको अपने जानवरों आदि की सुरक्षा के लिए घर में ही रुकना होता है. ऐसे में जहां परिवार रहेगा, वहीं बच्चे रहेंगे."
शिक्षकों की सेवाएं लेने का दूसरा तरीका है कि उन्हें दूसरे स्कूल के साथ टैग कर दिया जाए. कई बार वहां बाढ़ प्रभावित स्कूल के स्टूडेंट्स को भी शिफ़्ट कर दिया जाता है यानी उनकी कक्षाएं वहीं लगे, इसका प्रावधान किया जाता है.

लेकिन बाढ़ में डूबे घर, स्कूल में जगह की कमी इस तरीके के प्रभावी होने में मुश्किलें खड़ी करती हैं.
जैसे मिडिल स्कूल, लखना (पुनपुन) में पढ़ाने वाले शिक्षक अनुज कुमार की ड्यूटी एक दूसरे स्कूल में बाढ़ के दौरान लगी थी, लेकिन बाढ़ के दौरान वो अपने ही मूल स्कूल में हाजिरी लगाते रहे.
कारण पूछने पर अनुज बताते हैं, "एक दिन साहेबनगर स्कूल में ड्यूटी लगाई गई थी. लेकिन वहां सिर्फ़ चार कमरे थे. जिसमें शिक्षक और साहेबनगर स्कूल के स्टूडेंट्स कैसे एडजस्ट होते. इसलिए हम लोगों को आदेश आया कि अपने ही स्कूल में वापस जाकर हाजिरी लगाइए. बच्चों की छुट्टी थी लेकिन हम लोग 10 से 4 ड्यूटी करते थे."
प्रभावित स्कूलों में सामान्य छुट्टियों की जगह बाढ़ की छुट्टी
राज्य के शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी भी इस मुश्किल को स्वीकारते हैं.
बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से वह कहते हैं, "इस बार कुल मिलाकर 10 दिन हमारा पठन-पाठन प्रभावित हुआ है. जिन इलाकों में पानी आ गया है उसके शिक्षकों और बच्चों को हम-दूसरे स्कूल में शिफ़्ट करते हैं."
"लेकिन दिक्क़त ये है कि बाढ़ के समय कई बार स्कूल ही आश्रय स्थल बन जाते हैं. उस आश्रय स्थल में परिवार रहते हैं. जहां नदी के किनारे लोग बसे हैं और उनकी डिमांड रहती है कि घर के बगल में स्कूल खोलें तो हमने ऐसे स्कूलों के प्रोटेक्शन के लिए जल संसाधन विभाग से आग्रह किया है."
लेकिन बाढ़ के दौरान स्टूडेंट्स की पढ़ाई प्रभावित नहीं हो, इसका सबसे आसान तरीका क्या है?
पूर्व प्रशासनिक अधिकारी व्यास जी कहते हैं, "कई बार ये अनुशंसाएं की गई हैं कि जो छुट्टियां होती है उनको उन इलाकों में अलग तरह से एडजस्ट किया जाना चाहिए. बाढ़ के इलाके में जब बच्चे स्कूल जा सकते हैं तो उस वक्त छुट्टी नहीं देकर उन्हें बाढ़ के वक्त छुट्टी दी जानी चाहिए. इसको हम फ़्लेक्सिबल टाइमिंग कहते हैं. सरकार को सभी स्टेक होल्डर से बात करके ऐसी नीति बनानी चाहिए."
लेकिन बाढ़ के बदलते पैटर्न में ये आसान नहीं होगा.
आपदा प्रबंधन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक़, इस बार राज्य में 1 जून से 16 सितंबर की अवधि में सामान्य से 28 प्रतिशत कम बारिश हुई है. साफ़तौर पर स्कूलों के इंफ़्रास्ट्रक्चर और शिक्षकों की नियुक्ति के मामले में चुनौतियां झेलती बिहार सरकार के सामने सुचारू संचालन भी नई चुनौती बनने जा रही है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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