वो शिवालय, जहां 226 साल से जल रही अखंड ज्योत: गजनवी से लेकर खिलजी के हमले झेले, गुजरात से लाकर राजस्थान में स्थापित किया - Pali (Marwar) News

Published on 5 अग॰ 2026

सदियों से जलती एक अखंड ज्योत... पत्थरों पर आज भी दिखाई देते विदेशी आक्रमणों के घाव... और गर्भगृह में विराजमान वह शिवलिंग, जिसकी रक्षा के लिए हजारों लोगों ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए।

.

यह कोई लोककथा नहीं, बल्कि पाली शहर में 1121 साल पुराने सोमनाथ महादेव मंदिर का इतिहास है। सावन महीने में देशभर से श्रद्धालु यहां पूजा-अर्चना करने आते हैं।

मंदिर के पुजारी दीपक रावल बताते हैं- नौवीं शताब्दी में निर्मित इस मंदिर का नाम पहले सोमेश्वर महादेव था। इतिहासकारों के अनुसार, इसकी स्थापत्य कला, मूर्तिकला और शिल्प इसे राजस्थान के प्राचीन और महत्वपूर्ण शिव मंदिरों में शामिल करती है।

पाली शहर में बना सोमनाथ महादेव मंदिर करीब 1121 साल पुराना है, जिसके गुंबद पर बनी कई मूर्तियों पर आक्रमण के निशान आज भी दिखाई देते हैं।

पाली शहर में बना सोमनाथ महादेव मंदिर करीब 1121 साल पुराना है, जिसके गुंबद पर बनी कई मूर्तियों पर आक्रमण के निशान आज भी दिखाई देते हैं।

226 सालों से जल रही देसी घी की अखंड ज्योत

मंदिर के पुजारी दीपक रावल बताते हैं कि इस मंदिर की सबसे बड़ी पहचान इसकी 226 सालों से लगातार जल रही देसी घी की अखंड ज्योत है, जो आज भी श्रद्धा और विश्वास की लौ बनकर प्रज्ज्वलित है।

इस अखंड ज्योत के लिए रोजाना करीब 250 ग्राम घी की जरूरत होती है। सालों से पाली के घी व्यापारी बिना किसी व्यवधान के इसकी व्यवस्था करते आ रहे हैं। यही कारण है कि यह ज्योत दो शताब्दियों से अधिक समय से कभी नहीं बुझी।

पाली के सोमनाथ महादेव, जिनके दर्शन करने के लिए राजस्थान, गुजरात सहित देशभर से श्रद्धालु आते हैं।

पाली के सोमनाथ महादेव, जिनके दर्शन करने के लिए राजस्थान, गुजरात सहित देशभर से श्रद्धालु आते हैं।

गजनवी के हमले के बाद बदला मंदिर का इतिहास

वर्ष 1125 में महमूद गजनवी ने पाली पर हमला करते हुए सोमेश्वर महादेव मंदिर में तोड़फोड़ की और मूर्तियों व शिवलिंग को क्षतिग्रस्त कर दिया। इसी दौरान सौराष्ट्र स्थित सोमनाथ मंदिर पर भी हमले की आशंका गहराने लगी। कहा जाता है कि गुजरात के राजा कुमारपाल वहां का शिवलिंग सुरक्षित रथ में रखकर पाली लाए और पल्लीवाल(पालीवाल) ब्राह्मणों को सौंप दिया।

इसके बाद 1140 में कुमारपाल ने मंदिर का जीर्णोद्धार शुरू कराया। दिन-रात काम चला। 1152 में शिवलिंग की स्थापना हुई और संवत 1209 में मंदिर का नाम बदलकर सोमनाथ महादेव रखा गया।

विदेशी शासकों के आक्रमण से खंडित हुई मूर्तियां आज भी मंदिर में दिख जाती हैं।

विदेशी शासकों के आक्रमण से खंडित हुई मूर्तियां आज भी मंदिर में दिख जाती हैं।

खिलजी ने शिखर पर कराया था हमला

पुजारी के अनुसार, 1298 में गुजरात जाते समय अलाउद्दीन खिलजी ने मंदिर के शिखर को क्षतिग्रस्त कराया। बाद में पालीवाल ब्राह्मणों ने इसका पुनर्निर्माण करवाया। इसके बाद नसीरूद्दीन और फिरोजशाह जलालुद्दीन के हमलों का भी मंदिर ने सामना किया, लेकिन शिवभक्तों की आस्था कभी नहीं टूटी।

हजारों पालीवाल ब्राह्मणों ने दी थी कुर्बानी

लोक परंपराओं के अनुसार, जब नसीरूद्दीन ने शिवलिंग को खंडित करने का प्रयास किया, तब हजारों पालीवाल ब्राह्मण मंदिर की रक्षा के लिए उसके सामने खड़े हो गए। भीषण संघर्ष में अनेक लोगों ने अपनी जान न्योछावर कर दी, लेकिन गर्भगृह की प्रतिमाओं को बचा लिया। मंदिर परिसर में धौला चौतरा के जूझारजी उस बलिदान की गवाही देते हैं और यहां हर साल वीरों को नमन भी किया जाता है।

वर्ष 1970 से राजस्थान के देवस्थान विभाग की ओर से मंदिर की देखरेख की जा रही है।

वर्ष 1970 से राजस्थान के देवस्थान विभाग की ओर से मंदिर की देखरेख की जा रही है।

मंदिर गर्भगृह 16 कलात्मक स्तंभों पर टिका

मंदिर के पुजारी दीपक रावल ने बताया- मंदिर का गर्भगृह 16 कलात्मक स्तंभों पर टिका है। सभा मंडप की छत पर श्रीकृष्ण की रासलीला, गोपियों की मनोहारी प्रतिमाएं और शिखर पर नृत्य मुद्राओं में उकेरी गई मूर्तियां प्राचीन भारतीय शिल्पकला पर आधारित हैं। गर्भगृह में शिवलिंग के साथ माता पार्वती और भगवान गणेश की प्राचीन प्रतिमाएं भी स्थापित हैं।

घांची समाज के इष्टदेव, आस्था का सबसे बड़ा केंद्र

पाली के ध्वस्त सोमेश्वर महादेव मंदिर का पुनर्निर्माण साल 1140 में राजा कुमारपाल ने शुरू करवाया था। कहा जाता है कि मंदिर निर्माण का काम दिन-रात चलता रहा। सैनिकों ने तेल निकालने के लिए घाणियां चलाईं और उसी तेल से मशालें जलाकर निर्माण कार्य पूरा करवाया। बाद में यही सैनिक घांची कहलाए। आज भी घांची समाज सोमनाथ महादेव को अपना इष्ट देव मानता है।

वर्ष 1152 में सौराष्ट्र से लाए गए शिवलिंग को इस मंदिर में स्थापित किया गया। वैशाख शुक्ल पक्ष की चतुर्थी, संवत 1209 को विधि-विधान से इसकी प्रतिष्ठा की गई और मंदिर का नाम सोमनाथ महादेव रखा गया। घांची समाज के आनंद सोलंकी के अनुसार, पहले मंदिर में घांची समाज की ओर से सोमनाथ महादेव को कासा (धार्मिक भेंट) चढ़ाई जाती थी, क्योंकि वे उन्हें अपना आराध्य (इष्ट) देव मानते हैं।

पाली के सोमनाथ मंदिर में पिछले करीब 226 सालों से प्रज्ज्वलित हो रही अंखड ज्योत।

पाली के सोमनाथ मंदिर में पिछले करीब 226 सालों से प्रज्ज्वलित हो रही अंखड ज्योत।

नाथ संप्रदाय ने रावल परिवार को सौंपी मंदिर की जिम्मेदारी

मंदिर के पुजारी दीपक रावल के अनुसार, साल 1350 में पालीवाल ब्राह्मणों के पलायन के बाद नाथ संप्रदाय ने मंदिर की देखरेख संभाली। वर्ष 1600 में नाथ संप्रदाय के महंत भोलानाथ ने मंदिर की पूजा व्यवस्था रावल ब्राह्मण परिवार को सौंप दी और समाधि ले ली।

सोमनाथ महादेव मंदिर में वर्ष 1800 में घी की अखंड ज्योत शुरू की गई, जो आज भी लगातार जल रही है। वर्ष 1970 में राजस्थान के देवस्थान विभाग ने मंदिर की व्यवस्था की जिम्मेदारी संभाल ली।