27 में हिलेगा विरोधियों का किला या सपा हो जाएगी 'साफ’ - प्रवक्‍ता.कॉम - Pravakta.Com

Published on 13 जुल॰ 2026

राजेश श्रीवास्तव

 यूपी चुनाव 2०27 से पहले समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो अखिलेश यादव एक बार फिर ‘पीडीए रथ यात्रा’ पर सवार होने जा रहे हैं. अखिलेश पहले भी रथ निकाल चुके हैं. इसके बावजूद बीते दो चुनावों में वह हार रहे हैं. ऐसे में बड़ा सवाल इस बार पीडीए के रथ पर सवार होकर अखिलेश क्या सीएम योगी को टक्कर देंगे या फिर उनका चुनाव में हो जाएगा सफाया? सवाल यह भी है कि अगर अखिलेश इस बार साफ हो गये तो क्या समाजवादी पार्टी के अस्तित्व पर गहरा संकट नहीं छा जायेगा। 

गौरतलब है कि बीते लोकसभा चुनाव में ‘पीडीए’ पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक के बूते सूबे में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी समाजवादी पार्टी अब इसको किसी भी कीमत पर कम नहीं होने देना चाहती. इसी सिलसिले में पार्टी सूत्रों की मानें तो सपा प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव आगामी 23 अगस्त से पूरे उत्तर प्रदेश में ‘समाजवादी पीडीए रथ यात्रा’ की शुरुआत करने जा रहे हैं. इस यात्रा का मुख्य मकसद जमीनी स्तर पर जाकर पीडीए कुनबे को एकजुट करना और साल 2०27 में लखनऊ की गद्दी पर दोबारा कब्जा जमाना है.

अखिलेश अच्छी तरह जानते हैं कि राजनीति में जो ‘जमीन पर दिखता है, वही बिकता है’. लोकसभा की सफलता के बाद घर बैठने के बजाय वह सीएम योगी की तरह अब हर जिले में घूमकर माहौल बनाना चाह रहे हैं. इसी कड़ी में 23 अगस्त से रथ यात्रा शुरू करना उनकी एक आक्रामक और सोची-समझी रणनीति माना जा रहा है. जानकार मानते हैं कि सीएम योगी और बीजेपी इस यात्रा को बिल्कुल भी हल्के में नहीं लेगी. बीजेपी ने इसके जवाब में अपनी प्रशासनिक रैलियां, विकास कार्यों के उद्घाटन और ‘पन्ना प्रमुख’ सम्मेलनों को तेज कर दी है.

दरअसल यूपी चुनाव से पहले अब दोनों बड़े घटक चुनावी मोड में आ गए हैं. कांग्रेस-सपा गठबंधन जहां पीडीए समीकरण के साथ आगे बढ़ रही है, वहीं बीजेपी अपने कोर वोटर्स को और मजबूत करने के लिए एक से बढ़कर एक फैसले ले रही है. अभी हाल ही में प्रदेशश बीजेपी संगठन में वैसे नेताओं और जातियों को स्थान मिला है, जिसको लेकर अखिलेश यादव बड़े-बड़े दावे ठोक रहे हैं. लेकिन सवाल यह है कि अखिलेश अपने राजनीतिक करियर में अबतक कितने रथ पर सवार हुए हैं औऱ उसका हश्र क्या हुआ है?

अखिलेश यादव के राजनीतिक करियर में ‘रथ यात्राओं’ का हमेशा से एक खास और बेहद सफल इतिहास रहा है. जब-जब अखिलेश रथ पर सवार हुए हैं, तब-तब यूपी की राजनीति में बड़ा भूचाल आया है.

साल 2०11-12 (समाजवादी विकास रथ यात्रा) : अखिलेश यादव ने तत्कालीन मायावती सरकार के खिलाफ पूरे प्रदेश में साइकिल और रथ यात्रा निकाली थी. इसके बाद हुए चुनाव परिणाम में सपा को पूर्ण बहुमत मिला और अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने.

साल 2०16-17 (विकास से विजय की ओर) : पारिवारिक कलह के बीच अखिलेश ने रथ यात्रा निकाली लेकिन कांग्रेस के साथ गठबंधन के बावजूद सपा को करारी हार का सामना करना पड़ा और बीजेपी सत्ता में आई.

साल 2०21-22 (समाजवादी विजय यात्रा) : कोरोना काल के बाद अखिलेश ने फिर रथ संभाला. हालांकि सपा सत्ता में नहीं आ सकी लेकिन उसकी सीटें 47 से बढ़कर 111 हो गईं और वोट प्रतिशत में भारी उछाल आया.

लिहाजा यदि अखिलेश 23 अगस्त से इस यात्रा का शंखनाद करते हैं तो यूपी की राजनीति पर इसके दूरगामी प्रभाव देखने को मिल सकते हैं. यह यात्रा मुख्य रूप से गैर-यादव पिछड़ी जातियों और दलितों के बीच सपा की पैठ को और मजबूत करेगी, जो पारंपरिक रूप से भाजपा या बसपा के साथ रहे हैं. 2०27 के मुख्य चुनाव से पहले गांवों तक अखिलेश का पहुंचना पार्टी संगठन में नई जान फूंक देगा. इस यात्रा के जरिए अखिलेश खुद को मुख्यमंत्री योगी के सामने एकमात्र और सबसे मजबूत विकल्प के रूप में स्थापित करने की कोशिश करेंगे। 

सपा की इस रणनीति का मुकाबला करने के लिए बीजेपी और मुख्यमंत्री योगी के पास भी अपनी पुख्ता तैयारी है. योगी अपनी रैलियों के जरिए पिछड़ों और दलितों को गोलबंद कर रहे हैं. जैसे शनिवार को गोरखपुर में एक सभा में मुसहरों की दयनीय स्थिति के लिए अखिलेश पर हमला किया और बोले आज एक भी मुसहर के बच्चे नहीं मर रहे हैं. पीएम मोदी का मंत्र ‘सबका साथ, सबका विकास’ और सरकारी योजनाओं राशन, आवास के लाभार्थियों को सामने रखकर घेराबंदी कर रहे हैं. कानून-व्यवस्था को दुरुस्त कनने का मुद्दा बना रहे हैं. ‘माफिया राज बनाम सुशासन’ का नैरेटिव सेट करना और सपा के पुराने शासनकाल के दंगों और अपराधों की याद दिला रहे हैं. कुल मिलाकर, 23 अगस्त के बाद यूपी की सियासत पूरी तरह चुनावी मोड में आ जाएगी और मुकाबला बेहद दिलचस्प होने वाला है.