297 प्रयोगों के बाद छोटे फलों की कूलिंग के सटीक आंकड़े पाए - Jalandhar News

Published on 6 अक्टू॰ 2026

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ब्लू बेरी और चेरी जैसे छोटे फलों को जल्दी ठंडा करने के लिए डिफेंस इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड टेक्नोलॉजी, पुणे की पीएचडी शोधार्थी कृतिका ने एआई आधारित मॉडल तैयार किया है। उन्होंने यह शोध एनआईटी जालंधर में आयोजित इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन रिसेंट एडवांसेज इन फ्लूइड मैकेनिक्स एंड नैनो फ्लूड्स में प्रस्तुत किया।

कृतिका के अनुसार, फलों को ठंडा करने में अभी यह पता लगाने के लिए कंप्यूटर पर लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है कि फल कितनी जल्दी ठंडा होगा। साथ ही, कंप्यूटर में कई बार फलों का आकार एक जैसा मान लिया जाता है, जबकि असल में एक साथ रखे फलों का आकार अलग-अलग हो सकता है। इससे वास्तविक स्थिति का अनुमान लगाने में दिक्कत आती है।

इसी समस्या को कम करने के लिए कृतिका ने ऐसा एआई मॉडल तैयार किया, जो पहले से जुटाए फलों को ठंडा करने के आंकड़ों से सीखकर तेजी से अनुमान लगा सकता है। इसमें अलग-अलग परिस्थितियों में फलों को ठंडा करने के आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया। मॉडल की जांच 297 अलग-अलग प्रयोगों के आंकड़ों से की गई। इसमें फल के तापमान का अनुमान लगाने में औसत अंतर करीब 0.65 डिग्री सेल्सियस रहा।

यानी मॉडल से मिला तापमान वास्तविक माप के काफी करीब रहा। शोध में मॉडल को अलग-अलग मात्रा में हवा के प्रवाह के साथ भी जांचा गया और सभी स्थितियों में इसका अनुमान 1 डिग्री सेल्सियस की तय सीमा के भीतर रहा। कम समय लगता है शोध के तहत एक वेब आधारित एप्लिकेशन भी तैयार किया गया है। इसके जरिए फलों को ठंडा करने से जुड़ा अनुमान बहुत कम समय में लगाया जा सकता है।

आमतौर पर ऐसे कंप्यूटर सिमुलेशन में परिणाम आने में काफी समय लग सकता है, जबकि यह मॉडल मिली सेकंड में परिणाम दे सकता है। इससे प्री-कूलिंग यानी फलों को स्टोरेज या ट्रांसपोर्ट से पहले जल्दी ठंडा करने वाली कंपनियों के लिए प्रक्रिया को समझना और उसकी योजना बनाना आसान हो सकता है। तकनीक से फलों को सही तापमान तक जल्दी पहुंचाने की योजना बनाने में मदद मिल सकती है। इससे कटाई के बाद फलों की गुणवत्ता बनाए रखने और खराब होकर बर्बाद होने वाले फलों की मात्रा कम करने में भी मदद मिलने की संभावना है। इसका इस्तेमाल फलों की स्टोरेज और उन्हें एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के दौरान तापमान प्रबंधन में भी किया जा सकता है। फिलहाल मॉडल ब्लू बेरी के लिए तैयार किया गया है, लेकिन आगे इसे चेरी और दूसरे फलों पर भी इस्तेमाल करने की संभावना है। कृतिका ने यह शोध डिपार्टमेंट ऑफ एप्लाइड मैथ्स , डीआईएटी, पुणे के डॉ. एस.वी.एस.एस एन.वी.जी कृष्ण मूर्ति और आईआईटी कानपुर के प्रो. बी.वी. रथिश कुमार के मार्गदर्शन में किया है।