नीतीश पाला बदलें तो कैसे बनेगी सरकार, 3 समीकरण?: RJD ने साथ आने का न्योता क्यों दिया, क्या जदयू छोड़ पाएगी भाजपा का साथ? - Bihar News

Published on 16 सित॰ 2026

गृह मंत्री अमित शाह ने 13 सितंबर को कहा कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले BJP-NDA शासित 21 राज्यों में UCC लागू कर दिया जाएगा।

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जदयू ने इसका विरोध किया है। प्रदेश महासचिव श्याम रजक ने कहा, ‘बिहार में इसे लागू नहीं होने देंगे।’ राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने कहा, ‘हम इसके प्रारूप को देखेंगे, इसके बाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात करेंगे।’

कुल मिलाकर UCC के मुद्दे पर जेडीयू की राय बीजेपी से अलग है। इस मतभेद के बीच राजद के नेताओं को सत्ता पाने की उम्मीद दिखने लगी है। राजद ने कहा है कि जेडीयू बीजेपी का साथ छोड़ दे और महागठबंधन के साथ आकर सरकार बनाए।

राजद ने जदयू से क्यों NDA छोड़ने की अपील की? क्या नीतीश कुमार भाजपा से अलग होकर सरकार बना पाएंगे? पढ़िए रिपोर्ट.. ।

तेजस्वी यादव से बात कर भाई वीरेन्द्र ने जदयू को महागठबंधन में आने का न्योता

राजद के सीनियर नेता भाई वीरेन्द्र से भास्कर ने पूछा, क्या UCC के मुद्दे पर आपकी बात तेजस्वी यादव से हुई है? उन्होंने जवाब दिया, ‘हम ऐसे थोड़े ना कह रहे हैं। हमारा बयान मायने रखता है।’

सूत्रों के अनुसार तेजस्वी यादव से बातचीत के बाद भाई वीरेन्द्र ने यह बयान दिया है। उन्होंने कहा, ‘यह देश धर्मनिरपेक्ष है। देश जब गुलाम था तो इसे आजाद कराने में हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी ने अपनी कुर्बानी दी। सबका अधिकार देश पर है। कानून पहले का है, संविधान में भी जगह मिली है, तो कैसे यूसीसी लागू कर सकते हैं?

यह पब्लिक का ध्यान भटकाने के लिए है। महंगाई, बेरोजगारी, अपराध से ध्यान भटकाने के लिए सरकार की ओर से बयान आया है। लोगों को इसे समझने की जरूरत है। केंद्र सरकार महंगाई से निजात नहीं दिला पा रही है।

जेडीयू का बयान आया है कि यूसीसी को बिहार में लागू नहीं होने देंगे। मैं जेडीयू से कहूंगा कि आपके अंदर बीजेपी के कुछ लोग हैं जो बरगला रहे हैं। दुविधा में रखकर बीजेपी का काम कर रहे हैं। उनसे होशियार रहना चाहिए। नीतीश कुमार को महागठबंधन के साथ आकर बिहार में सरकार बनानी चाहिए।

नीतीश कुमार समाजवादी पृष्ठभूमि से रहे हैं, लेकिन उनका बड़ा योगदान बिहार में बीजेपी को पनपाने में रहा है। वे अभी भी चेत जाएं और धर्म के नाम पर देश को बर्बाद करने वाले का साथ छोड़ते हैं तो हम लोग तैयार हैं। जेडीयू के साथ मिलकर हम महागठबंधन की सरकार बनाएंगे।’

नीतीश को आरजेडी से परहेज नहीं

आरजेडी ने यह मैसेज देने की कोशिश की है कि जदयू अभी भी बिहार में भाजपा को छोड़कर सरकार बना सकती है। शर्त इतनी है कि जेडीयू चाहे। नीतीश कुमार को राजद से परहेज नहीं रहा है।

  • नीतीश ने फरवरी 2015 में जीतन राम मांझी के इस्तीफे के बाद आरजेडी और कांग्रेस के बाहरी समर्थन से मुख्यमंत्री पद संभाला था। यह चुनाव तक की अंतरिम सरकार थी।
  • इसके बाद नवंबर 2015 में विधानसभा चुनाव में जेडीयू, आरजेडी और कांग्रेस ने मिलकर महागठबंधन बनाया। जीत के बाद नीतीश मुख्यमंत्री और तेजस्वी यादव उपमुख्यमंत्री बने।
  • 9 अगस्त 2022 को नीतीश ने बीजेपी से गठबंधन तोड़ा और आरजेडी, कांग्रेस व वाम दलों के साथ महागठबंधन सरकार बनाई। तेजस्वी यादव फिर उपमुख्यमंत्री बने। ये परिस्थितियां तब थीं जब नीतीश कुमार ताकतवर माने जाते थे।

आरजेडी क्यों कह रही, नीतीश साथ आइए सरकार बनाइए

आरजेडी के पास अभी बीजेपी की राजनीति को रोकने के लिए पर्याप्त संख्या बल नहीं है। ऐसे में उसके नेता पहले आजमाए गए विकल्प पर काम करना चाहते हैं। वह है जेडीयू को महागठबंधन में शामिल करना।

  • जेडीयू की मदद से आरजेडी फिर से सरकार में आती है तो अपने संगठन को चुनाव के लिए मजबूत कर पाएगी।
  • जेडीयू के अंदर दो बड़े नेताओं के बीच पावर वार की चर्चा है। ऐसे में राजद ने राजनीतिक फायदा उठाने के लिए दांव खेला है।
  • ‘नीतीश जेडीयू’ नाम देने के पीछे की राजनीति से लोगों के बीच कई तरह का मैसेज गया है। जो इस नाम से तैयार नहीं उन्हें रास्ता दिखाने की कोशिश।
  • मुसलमानों के बड़े वोट बैंक में मैसेज देने की कोशिश कि यूसीसी से बिहार को बचाने के लिए आरजेडी ने नीतीश कुमार के सामने अपना बड़ा दिल दिखाया है।

अब समझते हैं तीन समीकरण, क्या नीतीश बना सकते हैं नई सरकार

1- JDU-RJD साथ आ जाएं

बिहार विधानसभा में सदस्यों की कुल संख्या 243 है। बहुमत के लिए 122 विधायकों का साथ चाहिए। जदयू के 85 और राजद के 25 विधायक हैं। दोनों को मिलाकर 110 होते हैं। मतलब, दूसरी पार्टियों के समर्थन की जरूरत होगी। महागठबंधन की सभी सहयोगी पार्टियों के संख्या बल को भी मिला दें तो आंकड़ा 121 तक ही पहुंच पाएगा।

2- JDU के साथ सभी विपक्षी दल आ जाएं

जदयू अगर NDA छोड़ दे और महगठबंधन में आ जाए तब भी सरकार नहीं बनेगी। सरकार बनाने के लिए असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM के 5 विधायकों के समर्थन की जरूरत होगी। ऐसे में आंकड़ा 126 तक पहुंच जाएगा।

नीतीश ऐसे में सरकार तो बना पाएंगे, लेकिन वह बड़ी कमजोर होगी। उनके पास बहुमत से सिर्फ 4 विधायक अधिक होंगे। किसी भी पार्टी में टूट हुई या उसके विधायक ने विश्वास मत के पक्ष में वोट नहीं दिया तो सरकार गिर जाएगी।

3- नीतीश को सरकार बनाने नहीं देगी भाजपा

तीसरी स्थिति की संभावना ज्यादा है। बिहार में भाजपा को पहली बार अपना सीएम बनाने का मौका मिला है। नीतीश बिना बीजेपी के सरकार बनाने की कोशिश करेंगे तो ज्यादा संभव है कि भाजपा इस बार चुप नहीं बैठेगी। वह उनकी पार्टी को तोड़ने का प्रयास करेगी। इसके 3 कारण हैं….

राजद-कांग्रेस कमजोर कड़ी- राजद के पास 25 और कांग्रेस के पास 6 विधायक हैं। कांग्रेस के 6 में से 3 विधायक मार्च 2025 के राज्यसभा चुनाव में भाजपा के साथ दिखे थे। ऐसे में पहला वार भाजपा कांग्रेस पर कर सकती है।

राजद के कुछ विधायक भी भाजपा के साथ जा सकते हैं। ऐसे विधायकों की संख्या करीब 8 है। राजद के कई विधायक जांच एजेंसियों की रडार पर है। एक ऐसे ही विधायक ने मार्च 2025 में राज्यसभा चुनाव के समय वोट नहीं दिया था।

नीतीश के विधायक साथ छोड़ सकते हैं- अगर राजद और कांग्रेस के विधायक बच भी जाते हैं तो बीजेपी नीतीश कुमार की पार्टी पर अटैक करेगी। नीतीश स्वस्थ्य संबंधी कारणों से पूरी तरह एक्टिव नहीं हैं।

उनके बाद जदयू में उनके कद के नेता नहीं है। जदयू के कई विधायक ऐसे हैं जो आगे की राजनीति को देखते हुए भाजपा के साथ ज्यादा कंफर्टेबल फील कर सकते हैं।

प्रशासनिक रूप से बीजेपी मजबूत- सरकार में आते ही सम्राट चौधरी ने नीतीश कुमार के करीबी अधिकारियों को हटाना शुरू कर दिया है। अपने करीबी लोगों की टीम रखी है।

CMO से नीतीश के करीबी अधिकारी हट गए हैं। सम्राट चौधरी प्रशासनिक पकड़ के मामले में मजबूत हो गए हैं जो सत्ता को बरकरार रखने के लिए महत्वपूर्ण कड़ी है।

नीतीश कुमार की मुश्किलें, पहले की तरह भाषण नहीं दे पाते

नीतीश कुमार राज्यसभा के सदस्य हैं। मुख्यमंत्री की कुर्सी बीजेपी के सम्राट चौधरी के पास है। जदयू सत्ता में भागीदारी के लिहाज से एनडीए में छोटे भाई की भूमिका में है।

  • नीतीश पहले की तरह भाषण नहीं दे पाते। उनकी अजीबोगरीब गतिविधियां कई बार सामने आ चुकी हैं। वह जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। परिवारवाद शब्द को त्यागकर अपने पुत्र निशांत को पहले मंत्री और फिर एमएलसी बना चुके हैं।
  • तृणमूल कांग्रेस के अंदर ऑपरेशन लोटस चलाने के बाद बीजेपी को केंद्र में जेडीयू की बहुत जरूरत नहीं रह गई है। जेडीयू NDA से अलग होकर भी केन्द्र सरकार को नुकसान नहीं कर सकती।
  • यही वजह है कि यूसीसी के मुद्दे पर फुलवारीशरीफ के विधायक और पूर्व मंत्री श्याम रजक ने कड़ा बयान दिया, लेकिन नीतीश कुमार, संजय झा या निशांत कुमार की तरफ यूसीसी पर कड़ा बयान नहीं आया।

बीजेपी के इन 3 बड़े एजेंडे पर नीतीश को झुकना पड़ा

वक्फ संशोधन कानून 2025: पहले तो जेडीयू ने इस बिल पर आपत्ति जताई। पार्टी के कई नेता विरोध में सामने आए। आपत्तियां जताते हुए संशोधन की मांग की। अंत में हुआ यह कि संसद में बीजेपी का साथ देकर बिल के पक्ष में वोट किया। जेडीयू के कई नेताओं ने पार्टी से इस्तीफा तक दिया। मुसलमानों के बीच नीतीश कुमार और जेडीयू की छवि को काफी धक्का लगा।

अनुच्छेद 270: पहले नीतीश कुमार और उनकी पार्टी जदयू विरोध करती रही। लेकिन 2019 में एनडीए में रहते हुए जेडीयू ने संसद में इसका विरोध नहीं किया। बीजेपी के फैसले का समर्थन कर दिया।

तीन तलाक कानून: जेडीयू ने शुरू में तो इसको लेकर अलग रुख दिखाया। संसद से वॉकआउट तक किया, लेकिन बीजेपी के साथ गठबंधन में रहते हुए इस मुद्दे पर टकराव नहीं बढ़ाया। सरकार के खिलाफ वोटिंग नहीं की। निशांत को आगे करने की रणनीति

नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के बाद उनके बेटे निशांत राजनीति में आए। पहली बार में स्वास्थ्य विभाग जैसे बड़े विभाग के मंत्री बने। निशांत अस्पतालों के निरीक्षण में लगे हैं। कैबिनेट की बैठक में स्वास्थ्य विभाग से जुड़े फैसले ताबड़तोड़ लिए जा रहे हैं।

18 सितंबर को पटना में जेडीयू ने एक महत्वपूर्ण बैठक बुलाई है। इसमें निशांत की और अच्छी ब्रांडिंग होनी है। इसमें बड़े फैसले पार्टी ले सकती है।

जेडीयू को किससे है खतरा?

राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि जेडीयू को खतरा कांग्रेस या आरजेडी से नहीं है। उसकी सहयोगी पार्टी बीजेपी से ही है!

बीजेपी साथ रहकर चिराग के जरिए एक बार जेडीयू के साथ खेल कर चुकी है। 2020 के विधानसभा चुनाव में एलजेपी ने जदयू को 35 सीटों पर नुकसान पहुंचाया। जेडीयू 43 सीटों पर आ गई। अपने दूसरे प्रयास में बीजेपी सम्राट चौधरी के रूप में बिहार में अपना मुख्यमंत्री बनाने में सफल हुई।

अब चर्चा यह है कि बिहार में बहुमत का आंकड़ा पाने के लिए बीजेपी नया दांव खेल सकती है। निशांत के सामने सबसे बड़ी चुनौती जेडीयू को एकजुट रखने की है। नीतीश कुमार के अस्वस्थ होने के बाद पार्टी में कई वरिष्ठ नेताओं की महत्वाकांक्षाएं हिलोरें मार रही हैं।