Aug 03, 2026 09:25 pm ISTपीटीआई, नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस संजय करोल और एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने एक अहम फैसला सुनाया कि कानूनी रूप से वैध शादी न होने पर भी लिव-इन रिश्तों में रहने वालों पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A लागू होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498ए का दायरा बढ़ा दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (03 अगस्त) को एक अहम फैसला सुनाया है और भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498ए का दायरा बढ़ाते हुए कहा है कि लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली पार्टनर को भी पत्नी जैसा हक मिल सकता है। शीर्ष अदालत ने साफ किया कि लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले किसी भी व्यक्ति पर अपनी महिला पार्टनर के साथ क्रूरता करने के लिए मुकदमा चलाया जा सकता है, अगर वह रिश्ता शादी जैसा हो और दोनों पक्षों का एक-दूसरे से शादी करने का इरादा हो।
जस्टिस संजय करोल और एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने फैसला सुनाया कि कानूनी रूप से वैध शादी न होने पर भी ऐसे रिश्तों पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A लागू होगी। कोर्ट ने कहा, "धारा 498A उन लिव-इन रिश्तों पर लागू होती है जो शादी जैसे रिश्ते माने जाते हैं, और जिनमें शादी करने का इरादा उस रिश्ते का एक अहम हिस्सा होता है।" हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि हर लिव-इन रिलेशनशिप पर यह दंडात्मक प्रावधान लागू नहीं होगा। यह साबित करने की शुरुआती जिम्मेदारी उस महिला की होगी जो कानून के तहत सुरक्षा चाहती है और यह दिखाना चाहती है कि दोनों पक्षों का शादी करने का इरादा था।
कोर्ट ने अपने आदेश में क्या कहा?
बता दें कि IPC की धारा 498ए का संबंध किसी महिला के पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा महिला के साथ क्रूरता करने से है। पीठ ने कहा, "धारा 498ए उन 'लिव-इन रिश्तों' (सहजीवन रिश्तों) पर लागू मानी गई है, जो 'शादी जैसे रिश्ते' की श्रेणी में आते हैं और जिनमें विवाह करने का इरादा उस रिश्ते का एक अहम हिस्सा होता है।" अदालत ने कहा, “पूरी स्पष्टता के साथ यह कहा जा रहा है कि धारा 498ए के तहत सुरक्षित सहजीवन रिश्ते वे हैं, जो दो बालिग व्यक्तियों की आपसी सहमति से बने हों। कानून का यह सिद्धांत केवल IPC की धारा 498ए तक ही सीमित रहेगा और इस विस्तृत व्याख्या का असर किसी अन्य प्रावधान पर नहीं पड़ेगा।”
शुरुआती जांच के बिना गिरफ्तारी नहीं
पीठ ने कहा कि गिरफ्तारी से बचाव के नियमों और अन्य बातों को सख्ती से लागू किया जाना चाहिए। साथ ही, "शादी जैसे रिश्ते" में रहने वाले किसी व्यक्ति (चाहे वह सहजीवन साथी हो या उसका रिश्तेदार) को, जिस पर किसी महिला के साथ क्रूरता करने का आरोप हो, शुरुआती जांच के बिना गिरफ्तार नहीं किया जाना चाहिए। न्यायालय ने कहा कि कोई भी व्यक्ति यह जानते या अंदाजा लगाते हुए रिश्ते में नहीं जाता कि उसके साथ क्रूरता हो सकती है।
'शादीशुदा और 'शादी जैसे सहजीवन रिश्ते' के बीच फर्क
पीठ ने कहा, "जब कोई जोड़ा अपनी यात्रा शुरू करता है, तो आम तौर पर यही माना जाता है कि उनकी नीयत अच्छी होती है और वे हर तरह की खुशियां पाना चाहते हैं। हालांकि, समय के साथ कुछ रिश्ते मुश्किल भरे रास्ते पर भी जा सकते हैं। कानून में इसके लिए भी प्रावधान होना चाहिए।" कोर्ट ने कहा, "शादीशुदा और 'शादी जैसे सहजीवन रिश्ते' के बीच का यह फर्क-जहां तक धारा 498ए के तहत मिलने वाली सुरक्षा का सवाल है- घरेलू हिंसा को रोकने के मकसद से तार्किक रूप से नहीं जुड़ा है और इसलिए यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है।" यह फैसला उस सवाल पर सुनवाई के दौरान आया कि क्या लिव इन रिलेशन में रहने वाले किसी व्यक्ति पर भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 498ए के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है।
