इस बार निगम क्षेत्र के कुल 4,16,143 पंजीकृत मतदाताओं में से 69.77% (2,90,327 मतदाताओं) ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। 40 सेक्टर्स में विभाजित 80 वार्डों के आंकड़ों का गहराई से विश्लेषण करने पर सामने आया कि ग्रामीण सीमांत और भीतरी व्यावसायिक क्षेत्र
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शाम 6 बजे आधिकारिक समय समाप्त होने तक 67.26% दर्ज हुआ, जो कतारों में खड़े अंतिम मतदाताओं द्वारा वोट डालने के बाद यह बढ़कर 69.77% पर पहुंच गया, जो 1994 से अब तक में सर्वाधिक रहा। वर्ष 2019 के उदयपुर नगर निगम चुनाव में 57.81% मतदान हुआ था, जबकि 2014 के चुनावों में 64.00% मतदान दर्ज किया गया था। इस बार बढ़ा हुआ मतदान यह बताता है कि लोगों में राजनीतिक जागरूकता और उनके वोटिंग के प्रति भारी उत्साह रहा। मतदान समाप्त होते ही बाड़ेबंदी का दौर भी शुरू हो गया है और सभी की निगाहें अब 14 सितंबर को आने वाले अंतिम नतीजों पर टिकी हैं।
मेयर के दावेदारों सहित कई की प्रतिष्ठा दांव पर
भाजपा के मेयर पद के दो दावेदारों की सीट कांटे की टक्कर में फंसती दिखाई दे रही है। पूर्व डिप्टी मेयर महेंद्र सिंह शेखावत और पूर्व शहर भाजपा जिलाध्यक्ष दिनेश भट्ट की सीट पर कांटे की टक्कर बताई जा रही है। हालांकि, शेखावत पुराने जमीनी नेता हैं, जिन्हें जीत दर्ज करने का पूरा यकीन है। भट्ट भी जीत के लिए आश्वश्त दिखाई दे रहे हैं। वहीं, आकाश वागरेचा की भी अग्निपरीक्षा है, क्योंकि उनके वार्ड 5 में अल्पसंख्यक मतों की संख्या अधिक है। ऐसे में वागरेचा से चमत्कारी जीत की उम्मीद जताई जा रही है। ये तीनों नेता भी मेयर पद के दावेदार हैं। भाजपा में ही मेयर पद के अन्य दावेदारों में प्रमोद सामर, पारस सिंघवी, अतुल चंडालिया, यशवंत आंचलिया शामिल हैं। आंचलिया का मेयर पद के लिए नाम उपनगरीय क्षेत्र हिरणमगरी के सबसे ताकतवर पार्षद के रूप में उछला है। इन सभी दिग्गजों की प्रतिष्ठा दांव पर है।
विधायक को कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने घेरा
शहर विधायक ताराचंद जैन ने शहर के 40 से ज्यादा वार्डों के मतदान केंद्रों का दौरा किया, शेष वार्डों की फोन पर जानकारी लेते रहे और निर्देश जारी करते रहे। विधायक जैन जैसे ही आयड़ स्थित वार्ड 73 में पहुंचे तो कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने कहा कि ये तो मिनी पाकिस्तान है, आप यहां क्यों आए हो, यहां से जाओ। विधायक जैन गाड़ी से उतरे और कांग्रेस कार्यकर्ताओं से बातचीत कर तुंरत लौट गए। दरअसल, इस वार्ड पर कांग्रेस का कब्जा है। पिछले कई चुनावों में कांग्रेस ही जीतती रही है।
ईवीएम मशीन खराब हुईं, जिन्हें बदला गया
वार्ड 23 के आरएमवी मतदान केंद्र में 11 मतदाताओं ने मतदान किया, लेकिन वोट डले नहीं, फिर पता चला कि ईवीएम मशीन खराब है। वापस दूसरी मशीन से वोट डलवाए। वार्ड 16 में भी खराब ईवीएम को बदला गया। वार्ड 37 में ईवीएम दोपहर को खराब हुई, फिर दूसरी ईवीएम काम में ली। वार्ड 64 में 34 वोट डालने के बाद ईवीएम खराब हो गई, जिसे बदला गया। वार्ड 70 में ईवीएम बीच में खराब हुई। मतगणना के वक्त खराब हुई मशीनों में पड़े वोट भी गिने जाएंगे।
सर्वाधिक वोटिंग
शहर के ग्रामीण-शहरी सीमांत क्षेत्रों में शामिल सेक्टर 36 (गणेश नगर, कानपुर) में रिकॉर्ड 88.28% मतदान हुआ। इसके अलावा सेक्टर 38 (कलड़वास) में 83.56% और सेक्टर 24 (सेक्टर 3 व 4) में 83.19% वोट पड़े। पुरानी आबादी के भीतरी व्यावसायिक क्षेत्र (धानमंडी, बड़ा बाज़ार, घंटाघर) के सेक्टर्स 5, 6 व 9 में भी पोलिंग 71% से 74% के बीच रही।
सबसे कम वोटिंग
शैक्षणिक संस्थागत और नए विकसित पॉश इलाकों में मतदाताओं का रुझान कम रहा। सेक्टर 12 (सुविवि परिसर, आयड़) महज 60.21% मतदान के साथ सबसे निचले स्थान पर रहा। इसी तरह सेक्टर 21 (पंचवटी, मधुवन) में 62.80% और सेक्टर 11 (अशोक नगर, शक्ति नगर) में 63.50% ही वोटिंग दर्ज की गई।
एक्सपर्ट: परिणाम बताएंगे जनता का रुख
उदयपुर नगर निगम के 80 वार्डों में हुआ मतदान शहर का राजनीतिक मूड तय करेगा। भाजपा और कांग्रेस ने इसे सांगठनिक परीक्षा मानते हुए पूरा जोर लगाया। मतदाता पानी, सफाई, सड़क और लाइट जैसे दैनिक मुद्दों पर जागरूक दिखे और पार्षद को बड़े नेताओं से ज्यादा सुलभ माना। एक साथ संक्षिप्त चुनाव चक्र से विधानसभा-लोकसभा जैसा माहौल बना। स्थानीय स्तर पर ज्यादा मतदान के ट्रेंड, लोकसभा चुनाव के बाद गैप, सितंबर का सुहावना मौसम, सुबह 7 से शाम 6 बजे का समय और आयोग के प्रयासों से वोटिंग बढ़ी। बूथों पर सुचारू व्यवस्था से युवाओं-बुजुर्गों ने लंबी लाइनें लगाईं। कोर वोटरों के अलावा जैन-जी फ्लोटिंग वोटर के रूप में उभरे। मैदान में डटे निर्दलीयों ने पारिवारिक और मोहल्ला नेटवर्क से घर-घर प्रचार कर न्यूट्रल वोटरों को भी पोलिंग बूथ तक पहुंचाया। -डॉ. गिरिराज सिंह चौहान, सुविवि के लोक प्रशासन विभागाध्यक्ष
एंटी इनकंबेंसी या किसी लहर में बढ़ता है मतदान
सामान्यतः बढ़ा हुआ मतदान दो ही परिस्थितियों में होता है- या तो एंटी इनकंबेंसी को लेकर या फिर किसी लहर में। उदयपुर में स्थानीय शासन की नई व्यवस्था के 1995 में लागू होने के बाद से ही भाजपा का ही बोर्ड हमेशा बना है। इस बार का सेंटीमेंट एंटी इंकमबेंसी का रूप साबित हो सकता है। -प्रो. मनोज राजगुरु, राजनीति विज्ञान विभाग, वीबीआरआई