विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के छात्रसंघ चुनाव के नतीजों में ABVP को क्यों मिल रही सफलता? जानें वजह

Published on 17 अक्टू॰ 2026

सोशल मीडिया, रील्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म के बढ़ते प्रभाव के बीच युवाओं की राजनीतिक भागीदारी को लेकर अक्सर बहस होती है. माना जाता है कि Gen-Z पारंपरिक राजनीति से दूरी बनाकर अपनी अलग दुनिया में व्यस्त है, लेकिन देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में छात्रसंघ चुनावों के नतीजे इस धारणा पर सवाल खड़े करते हैं. ओडिशा से लेकर दिल्ली, पंजाब और उत्तराखंड तक अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) की चुनावी सफलता ने छात्र राजनीति में संगठन की स्थिति को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है. ऐसे में सवाल है कि क्या यह जीत युवाओं के बदलते राजनीतिक रुझान का संकेत है या इसके पीछे संगठन की सक्रियता, स्थानीय समीकरण और छात्र हितों से जुड़े मुद्दों की अहम भूमिका है?

ओडिशा में ABVP का प्रदर्शन, छात्र राजनीति में बदले समीकरण

ओडिशा में करीब आठ साल के अंतराल के बाद हुए छात्रसंघ चुनावों में ABVP ने उल्लेखनीय प्रदर्शन किया. उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, राज्य के 13 विश्वविद्यालयों में से आठ में संगठन के उम्मीदवारों ने जीत हासिल की. वहीं, बीजू जनता दल (BJD) से संबद्ध छात्र संगठन बीजू छात्र जनता दल (BCJD) को पांच विश्वविद्यालयों में सफलता मिली.

कॉलेजों के चुनाव परिणाम भी ABVP के पक्ष में रहे. घोषित नतीजों के अनुसार, 342 कॉलेजों में से 208 में संगठन के उम्मीदवार विजयी हुए. BCJD को 117, जबकि कांग्रेस समर्थित नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI) को 17 कॉलेजों में जीत मिली. इन आंकड़ों ने ओडिशा में छात्र राजनीति के बदलते समीकरणों पर बहस को तेज कर दिया है.

हालांकि, किसी संगठन के प्रदर्शन को केवल सीटों की संख्या से समझना पर्याप्त नहीं है. इसके लिए यह देखना भी जरूरी है कि चुनाव में कितने छात्रों ने मतदान किया, उम्मीदवारों को कितना समर्थन मिला और अलग-अलग परिसरों में स्थानीय मुद्दों का प्रभाव कितना रहा.

दिल्ली और पंजाब में भी ABVP को सफलता

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ (DUSU) चुनाव में ABVP ने चार प्रमुख पदों में से तीन पर जीत दर्ज की. संगठन ने अध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव का पद अपने नाम किया. देश के प्रमुख विश्वविद्यालयों में शामिल दिल्ली विश्वविद्यालय में मिली इस सफलता को संगठन की कैंपस स्तर पर मौजूदगी और चुनावी सक्रियता के लिहाज से अहम माना जा रहा है.

पंजाब यूनिवर्सिटी में भी ABVP ने लगातार दूसरी बार अध्यक्ष पद हासिल किया. इसके अलावा उत्तराखंड के देहरादून, मसूरी, अल्मोड़ा और बागेश्वर सहित विभिन्न क्षेत्रों के कॉलेजों में संगठन के उम्मीदवारों को कई सीटों पर सफलता मिली.

अलग-अलग राज्यों में मिले इन नतीजों से यह जरूर संकेत मिलता है कि ABVP कई परिसरों में अपना चुनावी आधार बनाए रखने या मजबूत करने में सफल रही है. लेकिन इन परिणामों को पूरे देश के युवाओं के एकसमान राजनीतिक झुकाव का प्रमाण मानना जल्दबाजी होगी. प्रत्येक विश्वविद्यालय की अपनी सामाजिक, राजनीतिक और शैक्षणिक परिस्थितियां होती हैं, जो चुनावी नतीजों को प्रभावित करती हैं.

क्या Gen-Z विचारधारा के आधार पर कर रही है मतदान?

छात्र राजनीति में किसी संगठन की सफलता के पीछे विचारधारा एक महत्वपूर्ण कारक हो सकती है, लेकिन चुनावी व्यवहार को केवल इसी आधार पर नहीं समझा जा सकता. छात्र मतदाता अपने व्यक्तिगत अनुभव, उम्मीदवार की छवि, संगठन की सक्रियता और कॉलेज की समस्याओं को लेकर उसके रुख के आधार पर भी फैसला कर सकते हैं.

आज के युवा शिक्षा और रोजगार से जुड़े मुद्दों को लेकर पहले की तुलना में अधिक मुखर दिखाई देते हैं. कॉलेज की फीस, छात्रवृत्ति, हॉस्टल में सुविधाएं, लाइब्रेरी, परीक्षा परिणामों में देरी, शिक्षकों की उपलब्धता और प्लेसमेंट जैसे विषय सीधे उनके भविष्य से जुड़े हैं. ऐसे में छात्र संगठनों के लिए इन मुद्दों को उठाना ही नहीं, बल्कि समाधान की दिशा में ठोस पहल करना भी जरूरी है.

यही वजह है कि किसी संगठन की चुनावी सफलता के पीछे उसकी विचारधारा के साथ-साथ जमीनी कामकाज और छात्रों के बीच उसकी स्वीकार्यता की भूमिका भी हो सकती है. हालांकि, ABVP की हालिया जीत में इन कारकों का कितना योगदान रहा, इसका स्पष्ट आकलन करने के लिए छात्रों की राय और विस्तृत चुनावी आंकड़ों की जरूरत होगी.

सोशल मीडिया ने बदली छात्र राजनीति की रणनीति

डिजिटल दौर में छात्रसंघ चुनावों का स्वरूप भी बदल रहा है. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म उम्मीदवारों को अपनी बात बड़ी संख्या में छात्रों तक पहुंचाने का अवसर देते हैं. रील्स, छोटे वीडियो, डिजिटल पोस्टर और ऑनलाइन संवाद चुनाव प्रचार के महत्वपूर्ण माध्यम बन चुके हैं.

लेकिन डिजिटल लोकप्रियता अपने आप में चुनावी जीत की गारंटी नहीं है. कैंपस में व्यक्तिगत संपर्क, छात्रों के बीच नियमित उपस्थिति, समस्याओं पर कार्रवाई और प्रशासन के सामने प्रभावी तरीके से मुद्दे उठाने की क्षमता भी महत्वपूर्ण रहती है.

Gen-Z के लिए डिजिटल माध्यम राजनीतिक जानकारी हासिल करने और अपनी राय व्यक्त करने का जरिया हैं. इसके साथ ही विश्वविद्यालय परिसर उन्हें सीधे राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेने, नेतृत्व करने और अपने प्रतिनिधियों से जवाब मांगने का अवसर देते हैं. इसलिए छात्र राजनीति में डिजिटल प्रचार और जमीनी सक्रियता को एक-दूसरे के विकल्प के बजाय एक-दूसरे के पूरक के रूप में देखा जा सकता है.

छात्रसंघ चुनावों में निर्दलीय उम्मीदवारों की सफलता भी इस तस्वीर का अहम हिस्सा है. कई बार किसी उम्मीदवार की व्यक्तिगत लोकप्रियता और छात्रों से उसका सीधा जुड़ाव संगठनात्मक पहचान से अधिक प्रभावी साबित हो सकता है. इसी तरह, चुनाव के बाद किसी निर्दलीय उम्मीदवार का किसी संगठन को समर्थन देना और औपचारिक रूप से उस संगठन में शामिल होना अलग-अलग बातें हैं. ऐसे मामलों में संबंधित परिसर से पुष्टि के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित होगा.

चुनावी जीत के बाद वादे पूरे करना सबसे बड़ी चुनौती

विभिन्न विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में मिली सफलता ABVP के लिए उत्साह बढ़ाने वाली हो सकती है, लेकिन निर्वाचित प्रतिनिधियों के सामने अब छात्रों की अपेक्षाओं पर खरा उतरने की चुनौती है. चुनाव प्रचार के दौरान किए गए वादों को पूरा करना, प्रशासन के साथ संवाद कायम करना और कैंपस की समस्याओं के समाधान के लिए लगातार प्रयास करना उनकी वास्तविक कार्यक्षमता का पैमाना बनेगा.

छात्र राजनीति में किसी संगठन की लोकप्रियता स्थायी बनी रहेगी या नहीं, यह केवल एक चुनाव के नतीजों से तय नहीं होता. छात्रों का भरोसा बनाए रखने के लिए जरूरी है कि प्रतिनिधि फीस, छात्रवृत्ति, हॉस्टल, परीक्षा व्यवस्था और रोजगार जैसे मुद्दों पर ठोस प्रगति दिखाएं. यदि चुनावी वादे पूरे नहीं होते हैं, तो अगली बार छात्र अपने विकल्प बदलने का फैसला भी कर सकते हैं.

युवाओं के राजनीतिक रुझान की पूरी तस्वीर अभी बाकी

ओडिशा से दिल्ली और पंजाब तक ABVP के प्रदर्शन ने छात्र राजनीति में संगठन की मौजूदगी को फिर सुर्खियों में ला दिया है. ये परिणाम बताते हैं कि डिजिटल दौर में भी कैंपस चुनाव युवाओं की राजनीतिक भागीदारी का महत्वपूर्ण मंच बने हुए हैं.

हालांकि, यह कहना कि Gen-Z का राजनीतिक रुझान पूरी तरह बदल रहा है या युवा किसी एक विचारधारा की ओर निर्णायक रूप से झुक रहे हैं, उपलब्ध नतीजों के आधार पर उचित नहीं होगा. इसके लिए विभिन्न राज्यों के चुनाव परिणामों, मतदान के रुझान, छात्रों की प्राथमिकताओं और अलग-अलग संगठनों के प्रदर्शन का व्यापक अध्ययन जरूरी है.

फिलहाल, ABVP की चुनावी बढ़त छात्र राजनीति में उसकी संगठनात्मक ताकत का संकेत जरूर देती है. लेकिन इस बढ़त का दीर्घकालिक प्रभाव इस बात से तय होगा कि संगठन और उसके निर्वाचित प्रतिनिधि छात्रों के मुद्दों पर कितना काम करते हैं. आखिरकार, कैंपस में मिली जीत को युवाओं के स्थायी राजनीतिक भरोसे में बदलने के लिए नारों और प्रचार से आगे बढ़कर परिणाम दिखाने होंगे.