बिहार के आम नागरिकों और देश-विदेश में रहने वाले प्रवासियों के लिए हवाई संपर्क का विस्तार हमेशा से एक बेहद संवेदनशील और जरूरी मुद्दा रहा है। वर्तमान में पटना, गया और दरभंगा जैसे सक्रिय एयरपोर्ट्स पर यात्रियों का अत्यधिक दबाव देखने को मिल रहा है। पटना के जयप्रकाश नारायण अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे और उत्तर बिहार के दरभंगा एयरपोर्ट की अपार सफलता ने यह साबित कर दिया है कि राज्य के छोटे जिलों में हवाई यात्रा की कितनी भारी मांग मौजूद है। इसी को देखते हुए अब राज्य सरकार और केंद्र सरकार के नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने बिहार भर में फैली लगभग 21 पुरानी, रक्षा क्षेत्र से जुड़ी और गैर-परिचालित (Unserved/Underserved) हवाई पट्टियों को फिर से सक्रिय करने का बड़ा खाका तैयार किया है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौर से लेकर आजादी के बाद बनी इन हवाई पट्टियों की बाउंड्री वॉल, रनवे की री-कारपेटिंग और सुरक्षा मानकों को परखने की प्रक्रिया तेज होने से एक बार फिर पूरे प्रदेश में सस्ती घरेलू उड़ानों की मजबूत उम्मीद जगी है।
उत्तर और दक्षिण बिहार के इन प्रमुख शहरों की हवाई पट्टियां हैं शामिल
बिहार में चिन्हित की गई इन 21 हवाई पट्टियों का नेटवर्क राज्य के लगभग हर प्रमंडल और सीमावर्ती क्षेत्रों को कवर करता है। इनमें मुजफ्फरपुर (पताही), भागलपुर, रक्सौल (पूर्वी चंपारण), गोपालगंज (सबेया एयरफील्ड), मुंगेर (सफियाबाद), सहरसा, पूर्णिया (चूनापुर), कटिहार, बीरपुर (सुपौल), छपरा, बेगूसराय, वाल्मीकिनगर (पश्चिम चंपारण), मधुबनी और बिहटा जैसे महत्वपूर्ण रणनीतिक ठिकाने शामिल हैं। इनमें से कई हवाई पट्टियां ऐसी हैं जहां रनवे का बेसिक ढांचा पहले से मौजूद है और थोड़ी सी मरम्मत व टर्मिनल शेड के निर्माण से छोटे 19 से 72 सीटर विमानों का परिचालन आसानी से शुरू किया जा सकता है। नेपाल सीमा से सटे रक्सौल और वाल्मीकिनगर जैसी जगहों पर हवाई सेवा शुरू होने से जहां राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूती मिलेगी, वहीं व्यापार और अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों की आवाजाही भी बेहद सुगम हो जाएगी।
मॉडिफाइड उड़ान स्कीम और 'चैलेंज मोड' से परियोजनाओं को मिली नई गति
केंद्र सरकार द्वारा शुरू किए गए 'मॉडिफाइड उड़ान 2.0' (Modified UDAN Scheme) के तहत अब राज्यों की सीधी भागीदारी तय की गई है। इस नए फ्रेमवर्क में राज्यों को 'चैलेंज मोड' के तहत यह छूट दी गई है कि वे खुद अपनी मांग और प्राथमिकताओं के आधार पर उन हवाई पट्टियों का प्रस्ताव केंद्र को भेजें जहां तत्काल उड़ानें संभव हैं। केंद्र सरकार ने एयरलाइंस के लिए वायबिलिटी गैप फंडिंग (VGF) की अवधि को बढ़ाकर 5 साल तक कर दिया है, ताकि छोटे रूट्स पर एयरलाइंस को शुरुआती नुकसान का डर न रहे और उड़ानें लंबे समय तक टिकाऊ बनी रहें। बिहार सरकार भी इन हवाई पट्टियों के लिए जरूरी अतिरिक्त भूमि अधिग्रहण, अप्रोच रोड, बिजली-पानी की व्यवस्था और सुरक्षा जांच चौकियों के निर्माण में तेजी ला रही है।
आम यात्रियों, प्रवासियों और स्थानीय व्यापार को मिलने वाले बड़े लाभ
बिहार के लाखों युवा और कामकाजी लोग रोजगार, उच्च शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए दिल्ली-एनसीआर, मुंबई, कोलकाता, बेंगलुरु और चेन्नई जैसे महानगरों में रहते हैं। जब भी छठ पूजा, दिवाली, ईद या शादी-विवाह का सीजन आता है, तो ट्रेनों में लंबी वेटिंग लिस्ट और पटना-दरभंगा की उड़ानों के आसमान छूते किराए लोगों की जेब ढीली कर देते हैं। यदि मुजफ्फरपुर, पूर्णिया, भागलपुर और गोपालगंज जैसे शहरों से रीजनल फ्लाइट्स चालू हो जाती हैं, तो यात्रियों को 100-150 किलोमीटर दूर पटना जाने के लिए जाम और सड़क के धक्कों से मुक्ति मिलेगी। इसके अलावा, भागलपुर का सिल्क उद्योग, मुजफ्फरपुर की लीची व कपड़ा मंडी, बेगूसराय के औद्योगिक कारखाने और मुंगेर के रेल-इंजीनियरिंग वर्क्स को सीधे राष्ट्रीय बाजारों से जोड़ा जा सकेगा, जिससे स्थानीय स्तर पर रोजगार के हजारों नए अवसर पैदा होंगे।
धार्मिक पर्यटन और मेडिकल इमरजेंसी के क्षेत्र में क्रांतिकारी साबित होगा यह नेटवर्क
हवाई संपर्क का यह पुनरुद्धार राज्य के पर्यटन उद्योग के लिए एक गेम-चेंजर साबित होगा। गया और नालंदा के अलावा बिहार में सीतामढ़ी (पुनौरा धाम), वाल्मीकिनगर टाइगर रिजर्व, मंदार हिल (बांका) और मिथिला क्षेत्र में विशाल सांस्कृतिक धरोहर मौजूद है। विदेशी पर्यटकों और तीर्थयात्रियों को अब एक जिले से दूसरे जिले तक पहुंचने में पूरा दिन नहीं गंवाना पड़ेगा। इसके साथ ही, गंभीर रूप से बीमार मरीजों के लिए यह रीजनल हवाई नेटवर्क 'एयर एंबुलेंस' की तरह काम कर सकेगा, जिससे सुदूर ग्रामीण व सीमावर्ती जिलों से मरीजों को आपातकालीन स्थिति में पटना एम्स या दिल्ली के बड़े सुपर-स्पेशियलिटी अस्पतालों तक जीवनरक्षक समय (गोल्डन ऑवर) के भीतर पहुंचाया जा सकेगा।
हवाई पट्टियों के विकास में सामने आने वाली प्रमुख चुनौतियां और आगे की राह
हालांकि 21 हवाई पट्टियों को दोबारा चालू करने की राह में कुछ व्यावहारिक और तकनीकी चुनौतियां भी हैं। सबसे बड़ी समस्या कई पुरानी हवाई पट्टियों के आसपास हुआ अतिक्रमण और रनवे की सीमित लंबाई है। बड़े जेट विमानों (जैसे एयरबस A320) को उतारने के लिए कम से कम 2.5 किलोमीटर लंबे रनवे और इंस्ट्रूमेंट लैंडिंग सिस्टम (ILS) की जरूरत होती है। वर्तमान में राज्य सरकार छोटे टर्बोप्रॉप विमानों (जैसे ATR-72 या Q-400) के जरिए शुरुआती परिचालन शुरू करने की योजना बना रही है, जिसके लिए छोटे रनवे भी पर्याप्त होते हैं। जिलाधिकारियों को अतिक्रमण हटाने और संबंधित एयरपोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (AAI) की टीमों के साथ संयुक्त सर्वे पूरा करने का निर्देश दिया गया है, ताकि दशकों से बंद पड़े इन हवाई रनवे पर एक बार फिर से जहाजों की गड़गड़ाहट गूंज सके।