BRICS घोषणा पर सुबह 4 am तक चली बैठक, ईरान-रूस-चीन की आपत्तियों के बीच भारत ने कैसे साधा संतुलन?

Published on 13 सित॰ 2026

India Diplomacy: BRICS नई दिल्ली घोषणा पर सहमति बनाने के लिए भारत ने रात लगभग 4 बजे तक वार्ता चलाई। ईरान‑UAE के पश्चिम एशिया विवाद से लेकर रूस की यूक्रेन‑संबंधी आपत्तियों और चीन के ग्लोबल साउथ एजेंडा तक, दस्तावेज़ ने “संप्रभुता, संयम और संवाद‑कूटनीति” के सिद्धांतों पर सभी को साथ रखा।

BRICS New Delhi Declaration 2026: विस्तारित BRICS समूह के बीच नई दिल्ली घोषणा को सर्वसम्मति से अपनाना भारत के लिए सिर्फ एक दस्तावेज पर हस्ताक्षर कराने की प्रक्रिया नहीं थी। इसके पीछे कई महीनों से चल रही जटिल कूटनीतिक बातचीत थी, जिसमें अलग-अलग देशों के राष्ट्रीय हित और क्षेत्रीय प्राथमिकताएं सामने थीं। ईरान और UAE के बीच पश्चिम एशिया को लेकर मतभेद थे, सऊदी अरब की अपनी क्षेत्रीय चिंताएं थीं, रूस यूक्रेन से जुड़े किसी सीधे संदर्भ को लेकर सतर्क था और चीन BRICS के जरिए ग्लोबल साउथ की भूमिका मजबूत करने पर जोर दे रहा था। इसके बावजूद अंतिम दौर की बातचीत रात करीब 4 बजे तक चली और सभी सदस्य देश घोषणा पर सहमत हो गए।

पश्चिम एशिया बना सबसे मुश्किल मुद्दा

नई दिल्ली घोषणा पर बातचीत में सबसे कठिन मुद्दा पश्चिम एशिया की स्थिति रही। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान चाहता था कि उसके क्षेत्र पर हुए हमलों और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के कथित उल्लंघन का स्पष्ट उल्लेख किया जाए। वहीं UAE की प्राथमिकता थी कि ईरानी हमलों को उसकी संप्रभुता और क्षेत्रीय सुरक्षा से जोड़कर दर्ज किया जाए।

भारत ने किसी एक पक्ष को जिम्मेदार ठहराने वाली भाषा के बजाय साझा सिद्धांतों पर जोर दिया। अंतिम दस्तावेज में पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव पर चिंता जताते हुए संयम बरतने और ऐसे कदमों से बचने की अपील की गई, जो स्थिति को और खराब कर सकते हैं।

‘अपने-अपने राष्ट्रीय रुख’ ने निकाला रास्ता

घोषणा में ‘अपने-अपने राष्ट्रीय रुखों को स्मरण’ करने वाली भाषा महत्वपूर्ण मानी गई। इस फॉर्मूले ने सदस्य देशों को अपने अलग-अलग विचार बनाए रखते हुए साझा दस्तावेज पर सहमति बनाने का रास्ता दिया।

यही संतुलन BRICS के लिए अहम रहा, क्योंकि संगठन में शामिल देशों की पश्चिम एशिया और वैश्विक राजनीति को लेकर प्राथमिकताएं हमेशा एक जैसी नहीं रही हैं।

रूस ने यूक्रेन संदर्भ वाली भाषा पर जताई सावधानी

रूस भी घोषणा पत्र की भाषा को लेकर सतर्क था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, मॉस्को ऐसी शब्दावली से बचना चाहता था जिसे यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में सीधे पढ़ा जा सके। इसी वजह से दस्तावेज में रूस-यूक्रेन युद्ध का सीधा उल्लेख नहीं किया गया।

इसके बजाय संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता, विवादों के शांतिपूर्ण समाधान और कूटनीति जैसे व्यापक सिद्धांतों को जगह दी गई। इस भाषा ने BRICS के भीतर अलग-अलग राष्ट्रीय रुखों को एक साझा ढांचे में रखने में मदद की।

चीन के एजेंडे को भी मिली जगह

चीन की प्राथमिकता BRICS और ग्लोबल साउथ की भूमिका को और मजबूत करने की रही। नई दिल्ली घोषणा में विकासशील देशों के प्रतिनिधित्व, वैश्विक संस्थाओं में सुधार और दक्षिण-दक्षिण सहयोग को समर्थन दिया गया।

घोषणा में एकतरफा व्यापार प्रतिबंधों, टैरिफ और संरक्षणवादी नीतियों को लेकर भी चिंता जताई गई। हालांकि, इसमें अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का नाम सीधे तौर पर नहीं लिया गया। इस संतुलित भाषा के जरिए चीन और रूस की कुछ प्राथमिकताओं को जगह मिली, जबकि दस्तावेज किसी एक देश के खिलाफ राजनीतिक घोषणापत्र बनने से बचा रहा।

महीनों की बातचीत के बाद दिल्ली में बनी बात

इस सहमति के पीछे कई महीनों की कूटनीतिक कोशिश रही। रिपोर्ट्स के अनुसार, अप्रैल में BRICS की बैठक पश्चिम एशिया के मुद्दे पर संयुक्त बयान तक नहीं पहुंच सकी थी और भारत को Chair’s Summary जारी करनी पड़ी थी। मई में विदेश मंत्रियों की बैठक के दौरान भी मतभेद बने रहे।

शिखर सम्मेलन से पहले दिल्ली में हुई सघन बातचीत और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन तथा अबू धाबी के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नहयान के बीच मुलाकात ने भी तनाव कम करने में भूमिका निभाई। अंततः संवाद, परामर्श और कूटनीति के जरिए अंतरराष्ट्रीय विवादों के शांतिपूर्ण समाधान की प्रतिबद्धता पर सभी सदस्य देशों ने सहमति जताई।

भारत की कूटनीति की बड़ी परीक्षा

नई दिल्ली घोषणा पर बनी सर्वसम्मति को भारत की कूटनीतिक क्षमता की बड़ी परीक्षा के तौर पर देखा जा रहा है। अलग-अलग क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर विरोधी रुख रखने वाले देशों को एक साझा दस्तावेज पर लाना आसान नहीं था।

भारत ने किसी एक पक्ष की भाषा को प्राथमिकता देने के बजाय ऐसी शब्दावली पर जोर दिया, जिसमें सदस्य देश अपने राष्ट्रीय हितों को बरकरार रखते हुए साझा मंच पर साथ खड़े हो सकें। रात तक चली बातचीत के बाद घोषणा पर बनी सहमति इसी संतुलित कूटनीति का परिणाम मानी जा रही है।