आकांक्षा दुबे केस की CBI जांच की मांग खारिज: हाईकोर्ट ने कहा- प्रोटेस्ट पिटीशन न दाखिल करना, शव के अभाव में दोबारा जांच पहीं - Prayagraj (Allahabad) News

Published on 13 अक्टू॰ 2026

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वाराणसी के सारनाथ थाने से जुड़े आकांक्षा दुबे की आत्महत्या के मामले की निष्पक्ष जांच और सीबीआई जांच की मांग वाली याचिका को निस्तारित करते हुए रिकॉर्ड में दाखिल करने को कहा है।

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यह आदेश न्यायमूर्ति राजीव मिश्र एवं न्यायमूर्ति डॉ अजय कुमार द्वितीय की खंडपीठ ने मधु दुबे की याचिका पर उनके अधिवक्ता सौरभ तिवारी व विपक्षी के वकील को सुनकर दिया है। तस्वीरों का हवाला दिया गया सुनवाई के दौरान अधिवक्ता सौरभ तिवारी ने संलग्न तस्वीरों का हवाला देते हुए बताया कि मृतका का बायां पैर जमीन को छू रहा था और वह बिस्तर पर बैठी हुई स्थिति में थी, जो साफतौर पर आत्महत्या नहीं बल्कि हत्या की ओर इशारा करता है।

मृतका की कलाई पर चोट के निशान मौजूद थे। इसके अलावा मृतका के शरीर और कपड़ों से स्पर्मेटोजोआ बरामद हुआ, जिसकी एफएसएल लैब की डीएनए रिपोर्ट का मिलान अपराध में शामिल एक व्यक्ति से हुआ है। उन्होंने आरोप लगाया कि हाईकोर्ट में दाखिल जवाबी हलफनामे में तत्कालीन एसएचओ ने जानबूझकर डीएनए मिलान की बात छिपाई, जिससे पुलिस की मिलीभगत स्पष्ट होती है। साथ ही आरोप लगाया कि एफआईआर में दर्ज तथ्य भी मृतका की मां से दबाव डालकर लिखवाए गए थे।

पूजा पाल का केस डिसकल हुआ अधिवक्ता सौरभ तिवारी ने पूजा पाल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए तर्क रखा कि चार्जशीट दाखिल होने और संज्ञान लिए जाने के बाद भी न्यायालय के पास निष्पक्ष जांच के लिए मामले को सीबीआई को ट्रांसफर करने का पूरा अधिकार है। उन्होंने कहा कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट मौत के तौर-तरीके का अंतिम सबूत नहीं होती।

विपक्ष के वकीलों ने विरोध किया

विपक्षी के अधिवक्ता ने कोर्ट को अवगत कराया कि पुलिस ने आईपीसी की धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) के तहत चार्जशीट दाखिल कर दी थी, जिस पर सक्षम मजिस्ट्रेट ने संज्ञान भी ले लिया है।

​खंडपीठ ने याची के अधिवक्ता से पूछा कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए डीएम के समक्ष दोबारा परीक्षण के लिए कोई अर्जी दी गई थी या भगवंत सिंह बनाम कमिश्नर ऑफ पुलिस के फैसले के तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष चार्जशीट के खिलाफ कोई प्रोटेस्ट पिटीशन दाखिल की गई थी या नहीं? अधिवक्ता ने स्वीकार किया कि ऐसी कोई आपत्ति या प्रोटेस्ट पिटीशन दाखिल नहीं की गई। कोर्ट ने कहा कि आईपीसी की धारा 306 में चार्जशीट दाखिल होने और कानूनी प्रोटेस्ट पिटीशन के अभाव में यह तर्क निराधार है कि मामला हत्या का है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मृतका के शव के अभाव में अब घटना की पुन: जांच या मौत के तौर-तरीकों की पड़ताल नहीं की जा सकती। इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने याचिका को निस्तारित कर रिकॉर्ड में दाखिल करने का निर्देश दिया।