मध्य प्रदेश के धार जिले के ऐतिहासिक और विवादित भोजशाला परिसर मामले में एक बड़ा कानूनी मोड़ आया है। सुप्रीम कोर्ट सोमवार को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करने के लिए तैयार हो गया है, जिसमें इस विवादित परिसर क
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चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ के सामने मुस्लिम पक्ष ने इस मामले पर बेहद जल्द सुनवाई करने की गुहार लगाई थी।
CJI ने कहा याचिकाओं की कमियों को दूर करें
मामले की गंभीरता को देखते हुए मुस्लिम पक्ष की ओर से पेश वरिष्ठ वकील हुज़ेफ़ा अहमदी और वकील निज़ाम पाशा ने अदालत से इसे तुरंत सूचीबद्ध करने का अनुरोध किया। इस पर मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने वकीलों को याचिकाओं में मौजूद तकनीकी कमियों (defects) को फौरन दूर करने के निर्देश दिए। हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ मुस्लिम पक्ष (याचिकाकर्ताओं) की ओर से कई याचिकाएं एक साथ (समूह में) दायर की गई हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने भरोसा दिलाया कि जैसे ही ये कमियां दूर होंगी, इन याचिकाओं को जल्द ही सुनवाई के लिए एक उचित पीठ के समक्ष सूचीबद्ध कर दिया जाएगा। वहीं दूसरी ओर, हिंदू पक्ष ने भी पहले ही सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दाखिल कर दी है, ताकि उनका पक्ष सुने बिना अदालत इस मामले में कोई एकतरफा आदेश पारित न करे।

हाई कोर्ट ने मंदिर मानकर रद्द किया था 21 साल पुराना आदेश
गौरतलब है कि इसी साल 15 मई 2026 को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर पीठ ने इस मामले में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। हाई कोर्ट ने विवादित भोजशाला-कमल मौला मस्जिद परिसर को स्पष्ट रूप से देवी सरस्वती (वाग्देवी) का मंदिर माना था।
इसके साथ ही कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अप्रैल 2003 के उस 21 साल पुराने आदेश को पूरी तरह से रद्द कर दिया था, जिसके तहत हिंदुओं को मंगलवार को पूजा करने और मुस्लिम समुदाय को शुक्रवार को नमाज़ पढ़ने की इजाजत दी गई थी। कोर्ट ने परिसर के पूरे प्रबंधन और प्रशासन की जिम्मेदारी भी केंद्र सरकार और एएसआई को सौंपने का आदेश दिया था।

1034 ईस्वी में राजा भोज ने बनवाया था संस्कृत अध्ययन केंद्र
हाई कोर्ट के जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में एएसआई की वैज्ञानिक रिपोर्टों और ऐतिहासिक साक्ष्यों का हवाला दिया था।
अदालत ने कहा था कि पुरातात्विक और ऐतिहासिक तथ्यों से यह पूरी तरह साफ है कि यह इमारत एक हिंदू मंदिर और संस्कृत भाषा का अध्ययन केंद्र है। इतिहास का जिक्र करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि इस परिसर का निर्माण 1034 ईस्वी में राजा भोज द्वारा कराया गया था, जो कि दूसरे समुदाय द्वारा मस्जिद निर्माण के दावे (1935) से सदियों पुराना है। इसके साथ ही कोर्ट ने अपने कर्तव्यों में ढिलाई बरतने और ऐतिहासिक स्मारक की उपेक्षा करने पर एएसआई को कड़ी फटकार भी लगाई थी।

मस्जिद के लिए अलग जमीन और लंदन से मूर्ति लाने का सुझाव
अदालत ने मुस्लिम समुदाय के धार्मिक अधिकारों को सुरक्षित रखने और न्याय करने के लिए मध्य प्रदेश सरकार को एक विशेष निर्देश भी दिया था। कोर्ट ने कहा था कि राज्य सरकार धार जिले में ही मस्जिद निर्माण के लिए किसी दूसरी उपयुक्त और स्थायी जमीन के आवंटन पर कानून के तहत विचार करे, जिसके लिए वक्फ बोर्ड आवेदन कर सकता है।
इसके अलावा, हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार को यह भी सुझाव दिया था कि वह लंदन के म्यूजियम में रखी देवी सरस्वती की मूल वाग्देवी प्रतिमा को भारत वापस लाने और उसे फिर से भोजशाला परिसर में स्थापित करने की याचिकाकर्ताओं की मांग पर गंभीरता से विचार करे। हाई कोर्ट के इसी फैसले के बाद अब यह पूरी कानूनी लड़ाई देश की सबसे बड़ी अदालत के दरवाजे पर पहुंच गई है।

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