फिल्म 'दायरा' (Daayra) गंभीर मुद्दे पर आधारित है, जिसमें पृथ्वीराज सुकुमारन और करीना कपूर खान ने मुख्य भूमिका निभाई है। ...और पढ़ें

गंभीर मुद्दा पर कमजोर कहानी से उलझी दायरा
HighLights
पृथ्वीराज सुकुमारन और करीना कपूर खान का दमदार अभिनय
फिल्म गंभीर सामाजिक और कानूनी मुद्दों पर सवाल उठाती है
मेघना गुलजार की फिल्म आखिर कहां चूकी?
एंटरटेनमेंट डेस्क, नई दिल्ली। 'इससे अच्छा होता तो क्राइम पेट्रोल का एपिसोड ही देख लेते...', फिल्म खत्म होने के बाद सिनेमाघर से बाहर निकलते एक दर्शक ने कुछ यही कहा। दरअसल, फिल्ममेकर मेघना गुलजार जब भी कोई नई कहानी लाती हैं, तो दर्शकों को उम्मीद होती है कि इसमें दमदार सस्पेंस, थ्रिलर और गहराई होगी, जैसा कि हम 'राजी' और 'तलवार' जैसी फिल्मों में देख चुके हैं।
इस बार मेघना अपनी नई फिल्म 'दायरा' लेकर आई हैं। लेकिन क्या 'दायरा' वाकई में सिनेमाघरों में जाकर देखने लायक है या यह सिर्फ समय की बर्बादी है? जानने के लिए पढ़िए ये पूरा रिव्यू (Daayra Movie Review)
क्या है फिल्म की कहानी?
मेघना गुलजार की 'दायरा' में मुख्य किरदारों में पृथ्वीराज सुकुमारन (Prithviraj Sukumaran) और करीना कपूर खान (Kareena Kapoor Khan) हैं। फिल्म की कहानी एक युवा लड़की रागिनी (प्रगति मिश्रा) के अचानक गायब होने और फिर उसकी जली हुई लाश मिलने से शुरू होती है। जांच गैंगरेप और हत्या के दायरे तक पहुंचती है और फिर मामला डीसीपी रमन कुमार (पृथ्वीराज सुकुमारन) और उनकी टीम के पास आता है।

आरोपियों को पकड़ने के बाद लड़की और उसकी पूरी फैमिली को पूरी तरह न्याय दिलाने के लिए सुकुमारन और उनकी टीम उन चारों अपराधियों का एनकाउंटर कर देती है। दूसरी तरफ SIT ऑफिसर अजूनी कोहली (करीना कपूर खान) इस एनकाउंटर की शिनाख्त करती हैं कि क्या यह एनकाउंटर सेल्फ डिफेंस में किया गया था या फिर जानबूझकर। एक तरफ ये दिखाया गया कि अगर पुलिस की कार्रवाई थोड़ी मजबूत होती तो शायद उस लड़की की जान बच सकती थी।
दूसरी तरफ जब सिस्टम में बैठे लापरवाह लोगों पर फिर नकेल कसी जाती है। अब इस सबके बीच कई सवाल खड़े होते हैं क्या अपराधियों का एनकाउंटर करना सही है या फिर अपराध कबूल हो जाने के बावजूद कानूनी प्रक्रिया का इंतजार करना चाहिए? जब न्याय मिलने में कई साल लग जाते हैं तो क्या वह सही न्याय है? क्या एक नाबालिग द्वारा रेप किए जाने पर उसे कम सजा मिलनी चाहिए? इन सब सवालों के जवाब फिल्म देती है।
कैसा है सितारों का काम?
फिल्म में पृथ्वीराज सुकुमारन ने डीसीपी के किरदार को बखूबी निभाया है। ये कहना बिल्कुल सही है कि, दायरा की सबसे मजबूत कड़ी इसके एक्टर ही रहे हैं। पृथ्वीराज पुलिस के किरदार में हमेशा की तरह बेहतरीन लगे हैं। जब वे स्क्रीन पर आते हैं तो दमदार दिखते हैं। हालांकि उनके डायलॉग्स में कहीं-कहीं साउथ भाषा का एक्सेंट जरूर आता है पर वो पावरफुल लगे हैं। फिल्म की एक कमजोर कड़ी यह है कि करीना को फिल्म में कम स्पेस दिया गया है।

करीना अक्सर ऐसे किरदारों को बखूबी निभाती हैं। द बर्किंघम मर्डर हो या फिर जाने जां हो, करीना की पकड़ इन किरदारों पर अच्छी है। अजूनी के किरदार में करीना दमदार लगती हैं और जज की बेटी के रूप में स्क्रीन पर अपनी छाप छोड़ती हैं। हालांकि करीना के किरदार को और बेहतर किया जा सकता था। सपोर्टिंग कैरेक्टर्स ने भी अच्छा काम किया है, खासकर प्रगति मिश्रा (दुष्कर्म का शिकार होने वाली लड़की के किरदार में) और उनकी मां का किरदार निभाने वाली क्षिती जोग का काम प्रभावशाली है। इसके अलावा अचिंत कौर, कंवलजीत सिंह, सीमा आजमी, अनुजा साठे और बिस्वापति सरकार को जितना स्क्रीन स्पेस मिला उन्होंने ठीक काम किया।
कैसा है डायरेक्शन?
अब फिल्म मेघना गुलजार (Meghna Gulzar) ने बनाई तो जाहिर है दर्शकों को एक झकझोर देने वाली कहानी की उम्मीद बढ़ जाती है। कहानी तो अच्छी चुनी गई, लेकिन दुर्भाग्य से 'दायरा' (Daayra) ऐसा नहीं कर पाती। कहानी की शुरुआत से ही मेघना गुलजार बिना समय गंवाए मुद्दे पर आती हैं और फर्स्ट हाफ में सीन का री-क्रिएशन और दोनों टीमों के बीच के इंटरकट्स बहुत सधे हुए लगते हैं। लेकिन सेकंड हाफ में आते-आते फिल्म बिखर जाती है। किरदार और कहानी दोनों भटकते हुए नजर आते हैं।

कहानी खिंची हुई लगने लगती है। मेघना गुलजार का अप्रोच तो रियलिस्टिक लगता है, लेकिन फिल्म की पेसिंग और सबसे कमजोर कड़ी, इसका खराब एक्जीक्यूशन, फिल्म को पूरी तरह से डुबो देता है। ना तो कानून पर सही सवाल खड़े होते हैं और ना ही एनकाउंटर की कड़ी समझ आती है। ऐसा लगता है कि मेघना खुद इस गुत्थी में उलझकर रह गईं और दर्शकों के सामने एक मत नहीं परोस पाईं।
'तलवार' जैसी इन्वेस्टिगेटिव और 'राजी' जैसी स्पाई थ्रिलर देखने के बाद अगली फिल्म से ये उम्मीद और भी बढ़ जाती है, लेकिन कहानी का दायरा मेघना शायद सिर्फ सोच तक ही सीमित रख पाती हैं और पर्दे पर नहीं उतार पातीं और इसीलिए 'दायरा' आपको सिर्फ निराश ही करती है।
क्या है कमियां और खूबियां?
दायरा की कहानी अच्छी है, लेकिन इस कहानी को कहने का तरीका बिल्कुल फैला हुआ है। यश केसवानी , सीमा अग्रवाल और मेघना गुलजार ने मिलकर कहानी को गढ़ा लेकिन स्क्रीनप्ले इतना वीक है कि शायद आप फिल्म के बीच में सो भी जाएं। एक अच्छा आइडिया तभी काम करता है जब उसकी कहानी आखिरी तक बांधे रखने का काम करे, पर दायरा की कहानी पेपर वर्क तक ही रह जाती है। इसके अलावा सुकुमारन और करीना के सीन अलग-अलग दिखाने की जद्दोजहद में बीच-बीच में कहानी का रिदम टूटता है और फिर असली मुद्दे से ध्यान भटक जाता है।

पहला दोषियों को पकड़ने, जांच और परिवार की गुहार के बीच ही निकल जाता है और दूसरे हाफ में अंत तक ये समझ आ जाता है कि शायद कहानी सिर्फ एनकाउंटर को सही-गलत ठहराने पर ही टिकी हुई है। कुछ सीन्स तो बेमतलब के खिंचे हुए लगते हैं। कहानी में स्लो वॉक जैसे सीन्स समझ से परेय हैं। सौरभ गोस्वामी के क्लोज-अप शॉट्स और चारु श्री रॉय की एडिटिंग उतनी इम्पेक्टफुल नहीं लगती है। एडिटिंग में एक दम से कट ऐसे लगते हैं जैसे बिना सोचे समझे इसे बनाया गया है।

अमित त्रिवेदी का टाइटल ट्रैक खास याद रखने लायक नहीं है, लेकिन केतन सोधा का बैकग्राउंड स्कोर प्रभावी है और बी-प्राक की आवाज में जो गाना इस्तेमाल किया गया वो फिल्म के बीच-बीच में भावनात्मक सीन्स को बेहतर बना सकता था। फिल्म का क्लाईमैक्स बेहद खाली लगता है। करीना-पृथ्वी के बीच की प्रोफेशनल जंग और बेहतर किया जा सकता था और दोनों के बीच के ड्रामे को क्लाईमैक्स शामिल किया जा सकता था। फिल्म की खूबियों में सितारों काम है, फिल्म का कॉन्सेप्ट है।
देखें या नहीं देखें?
अगर आप मेघना गुलजार की फिल्मों को पसंद करते हैं और उनकी पहली फिल्में आपने देखी हैं, तो शायद दायरा आपको निराश कर सकती है। सस्पेंस और ड्रामे के बीच उलझी हुई कहानी से शायद आप बोर हो सकते हैं, लेकिन फिर भी सवाल खड़े करने वाली कहानी और करीना-पृथ्वी की एक्टिंग देखने के लिए इसका हिस्सा आप बनना चाहते हैं तो आप दायरा जाकर देख सकते हैं।