Debit Card Blocked: क्या आपका बैंक भी बिना बताए कार्ड ब्लॉक कर सकता है? कोर्ट ने ग्राहक के हक में दिया अहम फैसला

Published on 7 अग॰ 2026

बिना बताए ग्राहक का डेबिट कार्ड ब्लॉक करने पर उपभोक्ता कोर्ट ने फेडरल बैंक पर 1.25 लाख का जुर्माना लगाया। कोर्ट ने इसे सेवा में कोताही माना, जिससे ग्राहक को विदेश यात्रा के दौरान वित्तीय परेशानी का सामना करना पड़ा।

कोच्चि: एक ग्राहक को बिना बताए उसका इंटरनेशनल डेबिट कार्ड ब्लॉक करना फेडरल बैंक को महंगा पड़ गया। एर्नाकुलम जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (कंज्यूमर कोर्ट) ने बैंक को आदेश दिया है कि वह ग्राहक को 1.25 लाख रुपये का मुआवजा दे। कोर्ट ने साफ कहा कि बैंक सुरक्षा के नाम पर कार्ड तो ब्लॉक कर सकता है, लेकिन ग्राहक को इसकी सूचना दिए बिना ऐसा करना सेवा में कोताही माना जाएगा।

यह मामला 2015 से फेडरल बैंक के ग्राहक रहे एक व्यक्ति से जुड़ा है। सितंबर 2021 में जब वह कुवैत से कोच्चि आ रहे थे, तब उन्हें इस मुश्किल का सामना करना पड़ा। कुवैत इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर न तो वह अपने कार्ड से लाउंज में एंट्री कर पाए और न ही कुछ खरीद सके। कोच्चि पहुंचने के बाद भी ड्यूटी-फ्री शॉप और एटीएम पर उनका कार्ड नहीं चला। अकाउंट में पैसे होने के बावजूद वह उन्हें इस्तेमाल नहीं कर पा रहे थे।

शिकायतकर्ता ने आयोग को बताया कि कार्ड ब्लॉक होने के बारे में उन्हें या उनके परिवार को कोई भी सूचना नहीं दी गई थी। उन्होंने अपनी शिकायत में कहा कि वह यात्रा के खर्चों के लिए मुख्य रूप से इसी कार्ड पर निर्भर थे, जिस वजह से उनके परिवार को गंभीर मानसिक तनाव और वित्तीय परेशानी झेलनी पड़ी।

इस पर बैंक ने अपनी दलील दी। बैंक ने कहा कि मास्टर कार्ड से एक सिक्योरिटी अलर्ट मिला था कि कार्ड की जानकारी लीक हो सकती है, इसलिए कार्ड ब्लॉक किया गया। बैंक ने यह भी दावा किया कि ग्राहक के लिए एक नया कार्ड तैयार कर लिया गया था और SMS के जरिए इसकी जानकारी देने की कोशिश की गई, लेकिन तकनीकी खराबी के कारण मैसेज डिलीवर नहीं हुआ।

हालांकि, आयोग ने बैंक की इन दलीलों को नहीं माना। आयोग ने पाया कि कार्ड ब्लॉक करने के समय और नया कार्ड तैयार करने के समय से जुड़े दस्तावेजों में गड़बड़ियां थीं। कोर्ट ने इस बात पर भी गौर किया कि जब ग्राहक विदेश में परेशान हो रहा था, तब बैंक ने नया कार्ड अपनी ब्रांच में ही रखा हुआ था और उसे ग्राहक तक पहुंचाने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया।

अदालत ने इसे सेवा में कोताही और अनुचित व्यापार प्रथा मानते हुए बैंक को मानसिक पीड़ा के लिए 1 लाख रुपये और कानूनी खर्च के लिए 25,000 रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया। कुल 1.25 लाख रुपये की यह रकम 45 दिनों के भीतर चुकानी होगी। ऐसा न करने पर सालाना 9% की दर से ब्याज भी देना होगा।

आयोग ने यह भी कहा कि बैंक 'तकनीकी खराबी' का बहाना बनाकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते। अगर SMS नहीं पहुंचा, तो ग्राहक को फोन कॉल या ई-मेल जैसे दूसरे तरीकों से सूचित करना बैंक का कर्तव्य था। इस फैसले ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि सुरक्षा उपायों और ग्राहक अधिकारों, दोनों को एक साथ सुरक्षित रखना कितना जरूरी है।