सनातन धर्म के 18 महापुराणों में से एक 'गरुड़ पुराण' (Garuda Purana) में जन्म, मृत्यु, आत्मा के सफर और परलोक का अत्यंत विस्तृत व गूढ़ वर्णन मिलता है। गरुड़ पुराण के अनुसार, मृत्यु एक अटल सत्य है और जब किसी व्यक्ति का इस पृथ्वी लोक पर निर्धारित समय पूरा होने लगता है, तो शरीर और आत्मा के अलग होने की प्रक्रिया अंतिम समय में तेज हो जाती है। जब प्राण त्यागने का समय करीब आता है, यानी मृत्यु से लगभग 24 घंटे पहले, व्यक्ति की ज्ञानेंद्रियों, शरीर के तापमान और मानसिक चेतना में कुछ स्पष्ट और अलौकिक संकेत दिखाई देने लगते हैं। आइए जानते हैं गरुड़ पुराण में वर्णित उन 5 अचूक संकेतों के बारे में जो अंतिम समय के आगमन की ओर इशारा करते हैं।
पानी, तेल या दर्पण में अपनी परछाई न देख पाना
गरुड़ पुराण के अनुसार, जब व्यक्ति के प्राण छूटने का समय अत्यंत निकट आ जाता है, तो उसकी दृष्टि और ऊर्जा क्षेत्र (Aura) में गहरा बदलाव आता है। ऐसे समय में व्यक्ति को पानी, तेल, शीशे (दर्पण) या घी में अपनी वास्तविक परछाई साफ दिखाई नहीं देती। कई बार परछाई धड़-विहीन या कटी हुई महसूस होती है, या फिर बिल्कुल भी नजर नहीं आती। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यह इस बात का संकेत होता है कि शरीर से प्राणिक ऊर्जा धीरे-धीरे सिमटकर बाहर निकलने की तैयारी कर रही है।
हाथ-पैरों का ठंडा पड़ना और नाभि से प्राणों का खिंचाव
मृत्यु से कुछ घंटे पूर्व शरीर की जैविक और आंतरिक क्रियाएं शिथिल होने लगती हैं। गरुड़ पुराण और आयुर्वेद दोनों में इस बात का उल्लेख है कि सबसे पहले पैरों के तलवे और हाथों की हथेलियां पूरी तरह ठंडी और सुन्न होने लगती हैं। शरीर की ऊष्मा (अग्नि तत्व) धीरे-धीरे सिमटकर नाभि चक्र (मणिपुर चक्र) और फिर हृदय की ओर खिंचने लगती है। व्यक्ति के होंठ और तालू सूखने लगते हैं और बोलने की शक्ति धीरे-धीरे क्षीण होने लगती है।
यमदूतों और पूर्वजों की उपस्थिति का आभास होना
गरुड़ पुराण के प्रेत कल्प में वर्णित है कि अंतिम समय में व्यक्ति की भौतिक दृष्टि कमजोर हो जाती है और उसकी सूक्ष्म दृष्टि सक्रिय हो जाती है। ऐसे समय में व्यक्ति को अपने आसपास अपने दिवंगत पितरों, पूर्वजों या अलौकिक आकृतियों (यमदूतों) के साये दिखने लगते हैं। कई बार व्यक्ति शून्य में देखकर बातें करने की कोशिश करता है या डर और घबराहट में अपने परिजनों का हाथ कसकर पकड़ लेता है। यह संकेत बताता है कि आत्मा अब भौतिक जगत से परे सूक्ष्म जगत के संपर्क में आ रही है।
नाक का अग्रभाग न देख पाना और दृष्टि का स्थिर होना
गरुड़ पुराण में शारीरिक दृष्टि से जुड़े एक अत्यंत विशिष्ट संकेत का वर्णन किया गया है। जब मृत्यु करीब होती है, तो व्यक्ति अपनी दोनों आंखों से अपनी नाक के अग्रभाग (टिप) को देखने में असमर्थ हो जाता है। आंखों की पुतलियां ऊपर की ओर खिंचने लगती हैं या एक ही जगह स्थिर हो जाती हैं। इसके साथ ही आसपास की रोशनी धुंधली लगने लगती है और व्यक्ति को दिन के उजाले में भी अंधेरा या चारों ओर पीलापन महसूस होने लगता है।
जीवन भर के कर्मों का एक साथ फ्लैशबैक (चलचित्र की तरह दिखना)
अंतिम 24 घंटों के दौरान व्यक्ति का दिमाग सांसारिक मोह-माया से परे जाकर अपने पूरे जीवन का पुनरावलोकन करता है। गरुड़ पुराण के अनुसार, जन्म से लेकर उस क्षण तक किए गए सभी अच्छे और बुरे कर्म (पुण्य और पाप) व्यक्ति के अंतःकरण में एक दृश्य चित्रपट की तरह तेजी से घूमने लगते हैं। इस दौरान व्यक्ति अपने पाप कर्मों को याद करके पश्चाताप करता है और उसके मुंह से अनायास ही ईश्वर या परिजनों के नाम निकलने लगते हैं।