
लंगर परंपराImage Credit source: PTI
Gurudwara Langar Tradition: गुरुद्वारे में जब लोग एक साथ जमीन पर बैठकर भोजन करते हैं, तो वहां किसी की जाति, धर्म, अमीरी या गरीबी नहीं देखी जाती. सभी लोग एक ही पंगत यानी एक साथ लाइन में बैठकर एक जैसा भोजन ग्रहण करते हैं. सिख धर्म की यह परंपरा पूरी दुनिया में सेवा, समानता और भाईचारे का संदेश देती है. इसे लंगर कहा जाता है. लंगर सिर्फ भोजन कराने की परंपरा नहीं है, बल्कि इसके पीछे समानता और इंसानियत की गहरी भावना जुड़ी हुई है. माना जाता है कि इस परंपरा को सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी ने आगे बढ़ाया. उन्होंने लोगों को जात-पात और ऊंच-नीच से ऊपर उठकर एक-दूसरे की सेवा करने का संदेश दिया. आइए जानते हैं सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी के जीवन की वो घटना जिसने लंगर पंरपरा की शुरूआत की.
क्या है लंगर की परंपरा?
गुरुद्वारों में श्रद्धालुओं के लिए सामूहिक भोजन की व्यवस्था की जाती है, जिसे लंगर कहा जाता है. यहां कोई भी व्यक्ति भोजन कर सकता है. भोजन के दौरान लोग एक साथ पंगत में बैठते हैं और सभी को समान रूप से खाना परोसा जाता है. इस व्यवस्था की सबसे बड़ी खासियत यही है कि भोजन करने वाले व्यक्ति की पहचान उसकी हैसियत से नहीं होती. चाहे कोई अमीर हो या गरीब, छोटा हो या बड़ा, सभी एक ही लाइन में बैठकर भोजन करते हैं.
गुरु नानक देव जी के बचपन से जुड़ी है कहानी
लंगर की शुरुआत से जुड़ी एक प्रसिद्ध साखी गुरु नानक देव जी के बचपन से जुड़ी बताई जाती है. सिख मान्यता के अनुसार, उनके पिता मेहता कालू ने उन्हें व्यापार करने के लिए कुछ पैसे दिए थे और कहा था कि इन पैसों से कोई अच्छा सौदा करके लौटें. गुरु नानक देव जी रास्ते में कुछ साधुओं और जरूरतमंद लोगों से मिले. उन्होंने देखा कि वे लोग भूखे थे. गुरु नानक देव जी ने व्यापार करने के बजाय उन पैसों से भोजन खरीदा और भूखे लोगों को खाना खिलाया. इसी घटना को सच्चा सौदा की साखी के रूप में याद किया जाता है. गुरु नानक देव जी के लिए भूखे व्यक्ति को भोजन कराना ही सबसे सच्चा और बड़ा सौदा था.
वंड छको का क्या मतलब है?
गुरु नानक देव जी ने जीवन को बेहतर बनाने के लिए तीन प्रमुख सिद्धांतों पर जोर दिया था, नाम जपो, कीरत करो और वंड छको. नाम जपो का मतलब है ईश्वर का याद करना. कीरत करो यानी ईमानदारी से मेहनत करके अपनी आजीविका कमाना. वहीं वंड छको का मतलब है अपनी कमाई और भोजन को जरूरतमंदों के साथ बांटकर खाना. लंगर की परंपरा में वंड छको की भावना साफ दिखाई देती है. व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार योगदान देता है और फिर सभी के साथ मिलकर भोजन करता है.
पंगत में क्यों बैठते हैं सभी लोग?
लंगर में सभी लोगों को एक साथ पंगत में बैठाने के पीछे समानता का संदेश माना जाता है. पुराने समय में समाज में जाति और सामाजिक हैसियत के आधार पर लोगों के बीच काफी अंतर किया जाता था. ऐसे माहौल में एक ही लाइन में बैठकर भोजन करना अपने आप में बराबरी का मजबूत संदेश था. पंगत में बैठकर भोजन करने से यह भाव सामने आता है कि इंसान की कीमत उसकी जाति, धन या पद से नहीं, बल्कि उसके इंसान होने से है. यही वजह है कि लंगर में भोजन करने वाला व्यक्ति और भोजन परोसने वाला व्यक्ति दोनों ही इस सेवा का हिस्सा बनते हैं.
लंगर में सेवा का भी है खास महत्व
गुरुद्वारे के लंगर की एक खास बात यह है कि भोजन तैयार करने से लेकर उसे परोसने और बाद में बर्तन साफ करने तक श्रद्धालु अपनी इच्छा से सेवा करते हैं. इसे सेवा या सेवाभाव से जोड़ा जाता है. यहां बड़े पद पर बैठा व्यक्ति भी आम श्रद्धालु की तरह सेवा कर सकता है. कोई सब्जी काटता है तो कोई फर्श साफ करता है. कई जगह लोग मिलकर बड़ी संख्या में रोटियां तैयार करते हैं.
लंगर सिर्फ सिखों के लिए नहीं
गुरुद्वारे के लंगर की सबसे खूबसूरत बात यह है कि इसे किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं रखा जाता. अलग-अलग धर्म और समुदाय के लोग गुरुद्वारे में आकर लंगर ग्रहण कर सकते हैं. लंगर का दरवाजा सभी के लिए खुला रहता है. यही वजह है कि आज दुनिया के अलग-अलग देशों में मौजूद गुरुद्वारों में भी लंगर की परंपरा जारी है.

स्वर्ण मंदिर, अमृतसर
भारत में सबसे बड़ा लंगर कहां चलता है?
भारत में सबसे बड़े लंगरों में से एक अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में चलता है. यहां हर दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु लंगर खाते हैं. आम दिनों में करीब 50 हजार से 1 लाख लोग यहां लंगर छकते हैं. वहीं खास मौकों, रविवार और बड़े त्योहारों पर श्रद्धालुओं की संख्या और बढ़ जाती है. ऐसे समय में करीब डेढ़ से 2 लाख लोग तक लंगर का प्रसाद ग्रहण करते हैं.
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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और सामान्य जानकारियों पर आधारित है. टीवी9 भारतवर्ष इसकी पुष्टि नहीं करता है.

वरुण चौहान
इलेक्ट्रानिक और डिजिटल मीडिया में करीब एक दशक से ज्यादा का अनुभव. 2008 में एशियन एकेडमी ऑफ फिल्म एंड टेलीविजन (AAFT) नोएडा से पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद कुछ अलग और नया करने की सोच के साथ मीडिया में अपने सफर की शुरुआत की. शुरुआत से ही मेरी रुचि उन विषयों को आम लोगों तक पहुंचाने में रही है, जो भारतीय संस्कृति, धार्मिक परंपराओं से जुड़े हैं. अपने करियर के दौरान Channel One News, Sahara Samay, A2Z News, News Express, National Voice और पंजाब केसरी डिजिटल जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला. इन संस्थानों में काम करते हुए समाचार लेखन, फील्ड रिपोर्टिंग,और डिजिटल कंटेंट को सीखने का अनुभव मिला. फिलहाल देश के सबसे बड़े न्यूज नेटवर्क TV9 भारतवर्ष में धर्म और आस्था से जुड़ी खबरों, धार्मिक आयोजनों, ज्योतिष, वास्तु, पौराणिक कथाओं, मंदिरों की परंपराओं और व्रत-त्योहारों से जुड़े विषयों को सरल, सहज और तथ्यपूर्ण भाषा में पाठकों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी निभा रहा हूं. महाकुंभ 2025 की कवरेज मेरे करियर के महत्वपूर्ण अनुभवों में शामिल है, जहां करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था, अखाड़ों की परंपराओं, संत समाज की गतिविधियों और कुंभ से जुड़े धार्मिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर विस्तार से लिखने का अवसर मिला. इसके अलावा चारधाम यात्रा, सावन, नवरात्रि, दीपावली, होली, छठ पूजा, अमरनाथ यात्रा, रमज़ान और अन्य प्रमुख धार्मिक आयोजनों पर भी लगातार लेखन किया है. भारतीय संस्कृति, धर्म-दर्शन, ज्योतिष, अंक ज्योतिष, वास्तु शास्त्र, पुराणों और लोक आस्थाओं के अध्ययन में विशेष रुचि रखता हूं. मेरा प्रयास हमेशा यही रहता है कि धार्मिक और आध्यात्मिक विषयों को सरल भाषा के माध्यम से पाठकों तक पहुंचाया जाए, ताकि वे अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को बेहतर ढंग से समझ सकें.
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