Updated: Thursday, September 24, 2026, 20:31 [IST]
OI Explainer Gyanesh Kumar Resignation Demand: स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन(SIR) को लेकर चुनाव आयोग पर राजनीतिक घमासान बढ़ता ही जा रहा है। इस बीच, विपक्षी दलों के निशाने पर मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार आ चुके हैं। यह पहली बार है कि विपक्षी दलों ने पूरे आयोग को मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार से अलग कर दिया।
विपक्ष के विरोध के सुर की शुरुआत, मार्च 2024 में ज्ञानेश कुमार के चुनाव आयुक्त बनने के बाद से ही उनकी नियुक्ति और चयन प्रक्रिया को लेकर उठी। फरवरी 2025 में CEC बनने के बाद बिहार और पश्चिम बंगाल के SIR से लेकर वोटर लिस्ट, चुनावी डेटा और कथित 'वोट चोरी' तक के मुद्दों पर विपक्ष ने उन पर सीधे निशाना साधा।
अब सितंबर 2026 में चुनाव आयोग के भीतर दो चुनाव आयुक्तों की लिखित आपत्तियों की रिपोर्ट सामने आने के बाद विवाद एक बार फिर तेज है। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के फैसलों और प्रक्रियाओं पर आपत्ति दर्ज की। इनमें नए मतदाताओं के Form 6 में बदलाव, SIR में नाम हटाने-बहाल करने और मतदाता डेटा तक पहुंच जैसे मुद्दे शामिल हैं। इसके बाद राहुल गांधी समेत कई विपक्षी नेताओं ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग दोहराई है। हालांकि, चुनाव आयोग इन आरोपों को खारिज करता रहा है। आइए विस्तार से पूरी टाइमलाइन में जानते हैं...
Who Is Gyanesh Kumar: पहले जानिए- कौन हैं ज्ञानेश कुमार?

ज्ञानेश कुमार 1988 बैच के केरल कैडर के IAS अधिकारी रहे हैं। उन्होंने IIT कानपुर से सिविल इंजीनियरिंग में B.Tech किया। इसके अलावा ICFAI से बिजनेस फाइनेंस और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से एनवायरनमेंटल इकोनॉमिक्स की पढ़ाई की। वे केरल में एर्नाकुलम के जिला कलेक्टर और कोच्चि नगर निगम के कमिश्नर समेत कई पदों पर रहे। केंद्र में उन्होंने रक्षा मंत्रालय और गृह मंत्रालय में काम किया। गृह मंत्रालय में जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर से जुड़े मामलों में भी उनकी जिम्मेदारी रही। इसके बाद वे संसदीय कार्य मंत्रालय और सहकारिता मंत्रालय के सचिव रहे। ज्ञानेश कुमार 31 जनवरी 2024 को सरकारी सेवा से रिटायर हुए और 15 मार्च 2024 को चुनाव आयुक्त नियुक्त किए गए। 19 फरवरी 2025 को उन्होंने देश के 26वें मुख्य चुनाव आयुक्त के तौर पर पद संभाला।
कब-कब उठा ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे का मुद्दा?
मार्च 2024: चुनाव आयुक्त बनते ही नियुक्ति पर सवाल
ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू को मार्च 2024 में चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया था। दोनों की नियुक्ति प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली चयन समिति की सिफारिश के बाद हुई। उस समय समिति में विपक्ष के सदस्य अधीर रंजन चौधरी ने चयन प्रक्रिया पर असहमति जताई। उनका आरोप था कि शॉर्टलिस्ट किए गए नाम बैठक से कुछ ही समय पहले उन्हें बताए गए। यह विवाद ज्ञानेश कुमार के चुनाव आयोग में आने के साथ ही शुरू हो गया था।
फरवरी 2025: CEC बनते ही राहुल गांधी का विरोध
19 फरवरी 2025 को ज्ञानेश कुमार ने देश के 26वें CEC का पद संभाला। वे इस पद पर पहुंचने वाले पहले CEC थे, जिनकी नियुक्ति 2023 के नए कानून के तहत हुई। उनकी नियुक्ति से पहले राहुल गांधी ने चयन प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए असहमति दर्ज की थी। विपक्ष का कहना था कि CEC की नियुक्ति में सरकार का प्रभाव ज्यादा है। यहीं से ज्ञानेश कुमार के खिलाफ राजनीतिक विरोध और तेज हो गया।
अगस्त 2025: बिहार SIR और 'वोट चोरी' विवाद
2025 में बिहार की SIR प्रक्रिया के दौरान विपक्ष और चुनाव आयोग के बीच टकराव बढ़ा। राहुल गांधी ने चुनाव आयोग पर मतदाता सूची में गड़बड़ी और 'वोट चोरी' के आरोप लगाए। चुनाव आयोग ने इन आरोपों को खारिज करते हुए राहुल गांधी से अपने आरोपों को हलफनामे के जरिए साबित करने को कहा था। यानी इस दौर में पहली बार SIR और 'वोट चोरी' का मुद्दा सीधे CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष के राजनीतिक अभियान का अहम हिस्सा बना।
19 अगस्त 2025: आगरा में 'ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दो' के नारे
अगस्त 2025 में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने आगरा में ज्ञानेश कुमार के आवास की ओर मार्च किया। प्रदर्शनकारियों ने उनके इस्तीफे और उनके खिलाफ हटाने की प्रक्रिया शुरू करने की मांग की। प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने आवास से करीब 100 मीटर पहले रोक दिया था। कांग्रेस के स्थानीय नेताओं ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग और भाजपा की कथित मिलीभगत से वोट चोरी की जा रही है। ये आरोप प्रदर्शनकारियों के थे, जिनकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई थी।
19 सितंबर 2025: राहुल गांधी ने फिर लगाए 'वोट चोरों को बचाने' के आरोप
सितंबर 2025 में राहुल गांधी ने कर्नाटक के आलंद और महाराष्ट्र के एक विधानसभा क्षेत्र के मतदाता आंकड़ों का हवाला देते हुए चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए। राहुल ने आरोप लगाया कि मतदाता सूची से नाम हटाने और जोड़ने के लिए सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया गया और CEC ज्ञानेश कुमार कथित 'वोट चोरों' को बचा रहे हैं। चुनाव आयोग ने इन आरोपों को खारिज किया। आयोग के मुताबिक, आलंद में जिन हजारों आवेदन का हवाला दिया गया, उनकी जांच में केवल 24 आवेदन सही पाए गए और 5,994 आवेदन गलत पाए गए। आयोग ने कहा कि किसी मतदाता का नाम गलत तरीके से हटाया नहीं गया।
फरवरी 2026: ममता बनर्जी और ज्ञानेश कुमार आमने-सामने
फरवरी 2026 में पश्चिम बंगाल की SIR प्रक्रिया को लेकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और चुनाव आयोग के बीच टकराव बढ़ गया। ममता बनर्जी ने ज्ञानेश कुमार पर SIR के जरिए मतदाताओं को प्रभावित करने का आरोप लगाया और उनके खिलाफ हटाने की प्रक्रिया का समर्थन करने की बात कही। इसी दौरान पश्चिम बंगाल SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने भी हस्तक्षेप किया और दावों-आपत्तियों की सुनवाई के लिए न्यायिक अधिकारियों की मदद लेने का निर्देश दिया। कोर्ट ने राज्य सरकार और चुनाव आयोग के बीच 'ट्रस्ट डेफिसिट' का भी जिक्र किया।
मार्च 2026: संसद में पहली बार हटाने का प्रस्ताव
12 मार्च 2026 को विपक्षी सांसदों ने ज्ञानेश कुमार को CEC पद से हटाने की मांग वाला प्रस्ताव दोनों सदनों में दिया। राज्यसभा में 63 और लोकसभा में 130 सांसदों ने नोटिस पर हस्ताक्षर किए थे। इसमें कथित पक्षपातपूर्ण आचरण, चुनावी धोखाधड़ी की जांच में बाधा और SIR के जरिए बड़े पैमाने पर मताधिकार प्रभावित करने जैसे आरोप लगाए गए थे। यह CEC को पद से हटाने की दिशा में संसद में विपक्ष की पहली ऐसी औपचारिक कोशिश थी।
6 अप्रैल 2026: दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारियों ने नोटिस स्वीकार नहीं किया
लोकसभा स्पीकर ओम बिरला और राज्यसभा के सभापति सी.पी. राधाकृष्णन ने मार्च में दिए गए नोटिस स्वीकार करने से इनकार कर दिया। राज्यसभा सचिवालय के मुताबिक, सभापति ने संबंधित संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों के तहत नोटिस पर विचार करने के बाद उसे स्वीकार नहीं किया। लोकसभा में भी स्पीकर ने नोटिस खारिज कर दिया। इससे उस प्रस्ताव पर आगे की संसदीय प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।
24 अप्रैल 2026: 73 सांसद फिर लाए हटाने का नोटिस
पहले प्रयास के बाद विपक्ष ने अप्रैल 2026 में राज्यसभा में नया नोटिस दिया। इस बार 73 विपक्षी सांसदों ने ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग का समर्थन किया। नोटिस में 9 आरोप लगाए गए। इनमें आदर्श आचार संहिता लागू करने में कथित पक्षपात, राजनीतिक दल के खिलाफ कथित सार्वजनिक टिप्पणी, SIR से जुड़े फैसले और संवैधानिक पद की गरिमा के खिलाफ आचरण जैसे आरोप शामिल थे।
सितंबर 2026: आयोग के अंदर से उठी आपत्तियों ने बढ़ाया विवाद
सितंबर 2026 में विवाद ने नया मोड़ लिया। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के फैसलों पर लिखित आपत्ति जताई। रिपोर्ट में कहा गया कि आपत्तियां तीन बड़े क्षेत्रों से जुड़ी थीं...
- नए मतदाताओं के लिए Form 6 में बदलाव
- SIR के दौरान मतदाताओं के नाम हटाना और बहाल करना
- मतदाता डेटाबेस और चुनावी सॉफ्टवेयर तक पहुंच और नियंत्रण
दोनों आयुक्तों ने कुछ फैसलों को 'अनधिकृत' और 'अवैध' बताया। एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक, Form 6 में SIR से जुड़ा नया सवाल जोड़ने पर दोनों आयुक्तों ने आपत्ति दर्ज की थी। हालांकि, चुनाव आयोग ने इन आपत्तियों के अस्तित्व से इनकार नहीं किया, लेकिन कहा कि ये सुझाव थे और आयोग के सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।
आखिर 'वोट चोरी' का आरोप है क्या?
विपक्ष का मुख्य आरोप है कि मतदाता सूची में नाम हटाने, जोड़ने और डेटा के प्रबंधन में ऐसी प्रक्रियागत गड़बड़ियां हुईं, जिनसे योग्य मतदाता प्रभावित हो सकते हैं। राहुल गांधी ने 2025 में कर्नाटक के आलंद सहित कुछ मामलों का उदाहरण देकर आरोप लगाया था कि मतदाता सूची में छेड़छाड़ की गई। चुनाव आयोग ने इन आरोपों को खारिज किया और कहा कि मतदाता का नाम हटाने के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है। 2026 में SIR को लेकर यह बहस और बढ़ती जा रही है।
सितंबर 2026 में सबसे बड़ा सवाल क्या उठा?
अब बहस सिर्फ विपक्ष बनाम चुनाव आयोग तक सीमित नहीं है। चुनाव आयोग के ही दो आयुक्तों की ओर से दर्ज आपत्तियों ने आंतरिक निर्णय प्रक्रिया, मतदाता डेटाबेस के नियंत्रण और SIR के दौरान नाम जोड़ने-हटाने की व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों आयुक्तों ने यह भी सवाल उठाया कि चुनावी डेटाबेस पर नियंत्रण और बदलाव का अधिकार किन अधिकारियों के पास होना चाहिए। यही वजह है कि सितंबर 2026 में राहुल गांधी और कई विपक्षी दलों ने फिर ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग तेज कर दी है।