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आंचल द्विवेदी। गोरखपुर32 मिनट पहले
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गोरखपुर में IAS की तैयारी करने वाली 3 बहनें चाय बेच रही हैं। उन्होंने DDU गेट के सामने चाय की दुकान खोली है। नाम रखा- बिलीवर बिस्ट्रो। जिसका अर्थ है आस्थावानों का कैफे। तीनों बहनें सुबह 7 बजे से शाम 7 बजे तक स्टॉल लगाती हैं। फिर घर के कामों में हाथ बंटाती हैं।
इसके बाद रात करीब 12 बजे IAS की तैयारी के लिए यूट्यूब से पढ़ाई करती हैं। करीब 3 घंटे तक पढ़ने के बाद सो जाती हैं। बड़ी बहन वर्तिका (22) BSc पूरी कर चुकी हैं। वंदिता (21) और सबसे छोटी बहन अवंतिका (19) DDU से BA फर्स्ट ईयर की पढ़ाई कर रही हैं। उनका कहना है कि जब तक अफसर नहीं बन जाती हैं, तब तक स्टॉल लगाती रहेंगी।

12 घंटे तक दोनों बहनें चाय की दुकान चला रही हैं।
ट्यूशन पढ़ाया, नौकरी भी की लेकिन खर्च नहीं निकला
महराजगंज की रहने वाली वंदिता उपाध्याय ने बताया कि मैं परिवार के साथ बरगदवां में किराए के मकान में रहती हूं। मेरे पिता रामसकल उपाध्याय पहले महराजगंज में रिलायंस लाइफ एंड इंश्योरेंस कंपनी में ब्रांच मैनेजर थे। परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक थी।
2017 में पिता पैरालाइज हो गए। इसके बाद उनकी नौकरी छूट गई। परिवार की आर्थिक स्थिति खराब होने लगी। मां माधुरी हाउसवाइफ हैं। घर में कमाई का कोई दूसरा स्थायी जरिया नहीं था।
वंदिता ने बताया कि पिता की दवाइयों और घर के खर्च के साथ हम तीनों बहनों के भविष्य की चिंता भी थी। मैंने छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया। इसके अलावा छोटी-मोटी नौकरी भी की। लेकिन इससे परिवार का खर्च पूरा नहीं हो पा रहा था।
करीब 4 साल पहले हम तीनों बहनों ने चाय की दुकान खोलने की प्लानिंग की। सोचा कि कम बजट में चाय का स्टॉल शुरू करना आसान है। मगर मां ने मना कर दिया। बोलीं- हमारे रिश्तेदार संपन्न हैं। वह ऐसे देखेंगे तो क्या सोचेंगे? हमारा मजाक बनाएंगे।

बिलीवर बिस्ट्रो पर छात्र ही नहीं वहां से गुजरने वाले लोग भी चाय पीने आ रहे हैं।
8 हजार जमा किए, फिर चाय की दुकान खोली
इसके बाद चाय की दुकान खोलने का आइडिया स्किप कर दिया। लेकिन घर की हालत धीरे-धीरे खराब होने लगी। परिवार में आर्थिक तंगी का असर बड़े भाई की पढ़ाई पर भी पड़ा। 26 वर्षीय शिवम उपाध्याय ने 12वीं तक पढ़ाई की है। इसके बाद उनकी पढ़ाई छूट गई। फिलहाल वे घर से ही एक कंपनी के लिए टेलीकॉलर का काम करते हैं।
3 महीने पहले हम तीनों बहनों ने फिर से पुराने आइडिया पर काम किया और 8 हजार रुपए से DDU के गेट के सामने चाय का स्टॉल शुरू कर दिया। हमने अपने स्टॉल का नाम रखा- बिलीवर बिस्ट्रो।
शुरुआती दिनों में कुछ अजीब लगा, क्योंकि हम लोग वहीं पढ़ते थे। मगर धीरे-धीरे सबकुछ सामान्य हो गया। लोग आने लगे, लोगों को हमारी चाय का स्वाद पंसद आया। जब बिक्री से कुछ मुनाफा होने लगा तो मैंने चाय के साथ मैगी भी मेन्यू में शामिल कर ली।

वंदिता ने बताया कि हम चाय बेचने के साथ पढ़ भी रहे हैं।
वंदिता ने बताया कि लोगों का रिस्पॉन्स अच्छा मिल रहा है। मुझे उम्मीद है कि आगे बिजनेस और बढ़ेगा। दुकान पर मैं और छोटी बहन अवंतिका रहती है। बड़ी बहन IAS की तैयारी में लगी हुई है।
बड़ी बहन वर्तिका ने बताया कि फिलहाल उसका फोकस अपने पढ़ाई पर सबसे ज्यादा है। सुबह 4 बजे उठकर 6 बजे तक अलग- अलग सब्जेक्ट का नोट्स पढ़ती हूं। फिर 6 बजे से नाश्ता बनाकर बहनों को दुकान भेजती। उनके चले जाने के बाद पापा को नाश्ता कराकर दवाई दे देती।
फिर 8 बजे यूट्यब से ऑनलाइन क्लास लेती हूं। उसके बाद मम्मी के साथ मिलकर कुछ घर का काम करवा देती और दोपहर में हल्की नींद ले लेती। उसके बाद 2 बजे से शाम 5 बजे तक पढ़ती हूं। उसके बाद घर के थोड़े बहुत काम करके फिर रात 12 बजे से पढ़ने बैठ जाती। कुल मिलाकर एक दिन में 5 से 6 घंटे तक पढ़ाई करती हूं।

मां माधुरी ने कहा कि मुझे अपनी बेटियों पर गर्व है।
हर तरह से बहनों को करती गाइड
वर्तिका ने बताया कि दोनों छोटी बहनें भी यूपीएससी की तैयारी करती हैं। उन्हें हर समय मैं गाइड करती हूं। एक घंटा उनके सभी डाउट्स दूर करती हूं। साथ ही यूट्यब पर जो भी अच्छे क्लास होते हैं उन्हें सजेस्ट करती हूं। उन्होंने बताया कि आगे चलकर DM बनना है।
वहीं वंदिता और अवंतिका अभी भी कॉलेज में है। साथ ही दिन भर चाय की दुकान संभालती है तो तैयारी के लिए कम समय दे पाती। लेकिन रात में 12 से 2 बजे तक जरूर पढ़ती हैं। वंदिता को IPS बनकर पुलिस विभाग में जाना है, जबकि अवंतिका IAS बनना चाहती हैं।

वर्तिका ने कहा कि मैं सेल्फ स्टडी कर रही हूं।
मां बोली- बेटियां मेरी हिम्मत
मां माधुरी का कहना है कि हमारे बुरे वक्त में भी मेरी बेटियां हिम्मत बनी हैं। पहले मैं लोग क्या सोचेंगे इससे डर कर कर स्टॉल लगाने से मना करती थी लेकिन अब मुझे खुशी है कि वो अपना काम कर रही हैं। उनका सपना जरुर पूरा होगा।
वहीं पिता रामसकल का कहना है कि मुझे बेटियों पर गर्व है। पिछले कुछ सालों में बिना किसी के सपोर्ट के जैसे उन्होंने पूरा परिवार संभाला है, वह छोटी बात नहीं है। मुझे खुशी है कि जो मैं उनके लिए नहीं कर पाया वो खुद अपने लिए कर रही हैं। हिम्मत नहीं हारी।
अभी तक 3 से 4 लाख तक इलाज में लगा
वंदिता ने बताया कि पिता अब तक कम से कम 3 से 4 लाख रुपए खर्च लग चुका है। आगे लग ही रहा है। महीने में 5 से 6 हजार उनकी दवा में लग जाता है। इलाज के लिए नेपाल भी ले जाया गया था। इस दौरान जो कुछ भी सेविंग था सब खत्म हो गया। गांव में कुछ डिसमिल खेत पड़ें हुए हैं। जिसको अगल-बगल के लोग देखते हैं।
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