एंटीबायोटिक बेअसर, मौत का खतरा! ड्रग-रेजिस्टेंट इंफेक्शन पर ICMR का खुलासा

Published on 1 सित॰ 2026

एंटीबायोटिक बेअसर, मौत का खतरा! ड्रग-रेजिस्टेंट इंफेक्शन पर ICMR का खुलासा

ड्रग-रेजिस्टेंट इंफेक्शन का बढ़ता खतराImage Credit source: Getty Images

शरीर में बैक्टीरियल इंफेक्शन होने पर इससे बचने के लिए एंटीबायोटिक दी जाती हैं. लेकिन अगर ये दवा ही हमारी दुश्मन बन जाए तो ये बड़ी चिंता है. मेडिकली इस कंडीशन को ड्रग रेसिस्टेंट बैक्टीरियल इंफेक्शन कहा जाता है. इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) की नई स्टडी कहती है कि ड्रग रेजिस्टेंट बैक्टीरियल इंफेक्शन की वजह से न सिर्फ मौत का खतरा बढ़ता है, बल्कि इलाज भी महंगा हो जाता है. इसमें दवा के प्रति सेंसिटिविटी इंफेक्शन की तुलना में ड्रग-रेजिस्टेंट इंफेक्शन में मृत्यु दर ज्यादा और अस्पताल में भर्ती रहने की अवधि लंबी होती है.

ये रिसर्च द लेंसेट रीजनल हेल्थ-साउथेस्ट एशिया में पब्लिश हुई है. इसके आंकड़े 2022 से 2025 के बीच के हैं जिसमें करीब 1.6 लाख हॉस्पिटल्स के मरीजों पर शोध किया गया है. इसमें करीब 26213 पेशेंट्स में चार अहम ग्राम-बैक्टीरिया पाए गए. इसमें E. coli, Klebsiella pneumoniae, Acinetobacter baumannii और Pseudomonas aeruginosa के नाम शामिल हैं. इनसे इंफेक्शन बढ़ता है.

इंफेक्शन का कार्बेपनेम-रेजिस्टेंट होना

इस स्टडी के हिसाब से इन्फेक्शन्स में 61.1 फीसदी कार्बेपनेम-रेजिस्टेंट थे. कार्बेपनेम एंटीबायोटिक्स को कुछ गंभीर संक्रमणों के इलाज में लंबे समय तक अंतिम विकल्पों में गिना जाता रहा है. दरअसल, अस्पतालों में होने वाले गंभीर संक्रमणों में ऐसे बैक्टीरिया की बड़ी भूमिका है और इनके इलाज के लिए सही एंटीबायोटिक चुनना चुनौती बनता जा रहा है.

एंटीबायोटिक का असर न होना मौत का कारण बन रहा है. डॉक्टर कहते हैं कि जब एंटीबायोटिक असर करना कम या बंद कर देती है तो इस कंडीशन को मेडिकली सुपरबग कहा जाता है.

Drug Resistant Infections

ICMR की सीनियर साइंटिस्ट और स्टडी की राइटर डॉ. कामिनी वालिया के मुताबिक एंटी माइक्रोबियल रेजिस्टेंस अब फ्यूचर का खतरा नहीं है. क्योंकि ये आज ही भारत में लोगों की जान ले रहा है. उनका कहना है कि इसका सॉल्यूशन सिर्फ केवल और ज्यादा ताकतवर एंटीबायोटिक बनाना नहीं है. इंफेक्शन को रोकना, सही टाइम पर जांच और एंटीबायोटिक का जिम्मेदारी से इस्तेमाल बेहद जरूरी है.

ड्रग-रेजिस्टेंट संक्रमण में मौत का खतरा कितना ज्यादा?

इस रिसर्च में एक ही तरह के बैक्टीरिया के दवा-रोधी और मेडिसिन-सेंटिविटी इंफेक्शन वाले पेशेंट में मृत्यु दर की तुलना हुई. आंकड़ों के हिसाब से ड्रग-रेजिस्टेंट इंफेक्शन से मौत का खतरा ज्यादा रहा. Klebsiella pneumoniae इंफेक्शन में रेजिस्टेंट मरीजों की मृत्यु दर 31.2 फीसदी थी, जबकि सेंसिटिव इंफेक्शन वाले मरीजों में यह 23.5 फीसदी थी. दूसरे इंफेक्शन की बात करें तो इसमें E. coli के ड्रग-रेजिस्टेंट इंफेक्शन में ये दर 24.4 फीसदी थी, जबकि सेंसिटिव इंफेक्शन में दर 17.3 फीसदी रही.

इलाज पर खर्चा भी दोगुना

ड्रग-रेजिस्टेंट इंफेक्शन का असर सिर्फ मरीज पर नहीं बल्कि उसकी जेब भी पड़ता है. स्टडी कहती है कि इस कंडीशन में पहुंचने वाले पेशेंट को दोगुना पैसे खर्च करने पड़ते हैं. रेजिस्टेंट संक्रमणों में एंटीबायोटिक इलाज की लागत 1.1 से 2 गुना तक ज्यादा रही।

E. coli: रेजिस्टेंट इंफेक्शन में एवरेज खर्चा 420 डॉलर, जबकि संवेदनशील संक्रमण में 211 डॉलर.

Klebsiella pneumoniae: रेजिस्टेंट इंफेक्शन में एवरेज खर्चा 587 डॉलर, संवेदनशील संक्रमण 505 डॉलर.

Acinetobacter baumannii: रेजिस्टेंट इंफेक्शन में एवरेज खर्चा 655 डॉलर, संवेदनशील संक्रमण 436 डॉलर.

Pseudomonas aeruginosa: रेजिस्टेंट इंफेक्शन में एवरेज खर्चा 702 डॉलर, संवेदनशील संक्रमण 510 डॉलर.

इसके इलावा रेजिस्टेंट इंफेक्शन की वजह से मरीजों को ज्यादा दिन अस्पताल में रहना पड़ा. इसलिए दवा, बेड और दूसरी चीजों का खर्चा भी ज्यादा लगा.

क्यों है ये बड़ी चिंता का कारण

एक्सपर्ट कहते हैं कि एंटी माइक्रोबियल रेजिस्टेंस के कारण नॉर्मन इंफेक्शन में काम आने वाली दवाओं का असर कम होता जा रहा है. ऐसे में इंफेक्शन का इलाज मुश्किल हो सकता है और पेशेंट को लंबे सयत तक ट्रीटमेंट की जरूरत पड़ सकती है. घरों में भी एंटीबायोटिक्स से जुड़ी कई गलतियां की जा रही हैं. लोग दवा को खुद से खाना शुरू कर देते हैं, कोर्स को पूरा किए बिना बंद कर देते हैं. खासतौर पर बच्चों के मामलों में ऐसा ज्यादा हो रहा है.

मनीष रायसवाल

मनीष रायसवाल

मनीष रायसवाल वर्तमान में टीवी9 डिजिटल में लाइफस्टाइल बीट पर बतौर टीम लीड काम कर रहे हैं. मनीष के करियर की शुरुआत साल 2015 से इंडिया न्यूज के डिजिटल प्लेटफार्म Inkhabar के साथ बतौर सब एडिटर हुई थी. अलग-अलग पड़ावों को पार करते हुए इन्होंने इंडिया न्यूज, अमर उजाला और एनडीटीवी जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम किया है. 2009 से 2012 के बीच जामिया मिलिया इस्लामिया से बीए ऑनर्स मास मीडिया में ग्रेजुएशन और 2012-13 के बीच देश के प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान भारतीय जनसंचार संस्थान (दिल्ली) से डिप्लोमा करने के बाद मनीष पत्रकारिता से जुड़े हैं. मनीष लाइफस्टाइल के अलावा, हेल्थ, सोशल, वुमेन और बाल विकास और ट्रैवलिंग जैसे विषयों पर लिखना पसंद करते हैं. लाइफस्टाइल से जुड़े ज्यादातर टॉपिक्स पर इन्हें नई चीजें सीखने का शौक है.

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