Published: Sunday, July 26, 2026, 19:12 [IST]
Ajay Alok Jantar Mantar Protest: 36 दिनों तक जंतर-मंतर पर बैठे छात्रों ने आखिरकार सरकार को झुकने पर मजबूर कर दिया। शिक्षा मंत्री का इस्तीफा हुआ और आंदोलन से जुड़ी बड़ी मांगें भी माननी पड़ीं। इस दौरान छात्र संसद तक पहुंच गए और वहां भी जोरदार प्रदर्शन हुआ। आंदोलन खत्म हो चुका है, लेकिन सत्ताधारी दल के भीतर इस प्रदर्शन की गूंज अब भी सुनाई दे रही है।
इसका ताजा उदाहरण बीजेपी प्रवक्ता अजय आलोक का बयान है। उन्होंने अपनी ही सरकार से मांग की है कि जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए और इसके लिए संसद से दूर कोई स्थायी जगह तय की जानी चाहिए।
36 दिन के आंदोलन के बाद बदले सुर
कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में चला छात्र आंदोलन लगातार 36 दिनों तक जंतर-मंतर पर डटा रहा। शुरुआत में सरकार आंदोलन को ज्यादा तवज्जो देती नजर नहीं आई, लेकिन जैसे-जैसे आंदोलन तेज हुआ, उसका असर संसद तक दिखाई दिया। आखिरकार शिक्षा मंत्री के इस्तीफे और कई मांगें मानने के बाद आंदोलन समाप्त हुआ। अब आंदोलन खत्म होने के बाद प्रदर्शन स्थल को लेकर नई बहस शुरू हो गई है, जिसने राजनीतिक गलियारों में भी चर्चा छेड़ दी है।
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अजय आलोक ने सरकार के सामने रखी मांग
बीजेपी प्रवक्ता अजय आलोक ने सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए कहा कि संसद और सांसदों की सुरक्षा तथा गरिमा को देखते हुए जंतर-मंतर अब धरना-प्रदर्शन के लिए उपयुक्त जगह नहीं है। उन्होंने मांग की कि संसद से करीब तीन किलोमीटर के दायरे में निषेधाज्ञा लागू की जाए और विरोध-प्रदर्शनों के लिए राजधानी में कोई दूसरा स्थायी स्थान तय किया जाए, ताकि सुरक्षा व्यवस्था पर किसी तरह का दबाव न पड़े।
1993 के फैसले का भी किया जिक्र
अपने तर्क को मजबूत करने के लिए अजय आलोक ने 1993 का उदाहरण भी दिया। उन्होंने कहा कि उस समय कांग्रेस सरकार ने भी सुरक्षा कारणों का हवाला देकर बोट क्लब पर धरना-प्रदर्शनों पर रोक लगाई थी। उनके मुताबिक तब भी संसद और वीआईपी इलाकों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी गई थी और आज भी वही परिस्थिति है। उन्होंने उम्मीद जताई कि इस मुद्दे पर सभी राजनीतिक दल एकमत होंगे।
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'प्रदर्शन स्थल दूर हुआ तो आवाज भी दूर हो जाएगी'
अजय आलोक की इस मांग पर सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कई यूजर्स का कहना है कि जंतर-मंतर जैसे प्रदर्शन स्थल की सबसे बड़ी अहमियत यही है कि यह सत्ता के केंद्र के करीब है। इससे प्रदर्शनकारियों की आवाज सीधे सरकार, सांसदों और मंत्रालयों तक पहुंचती है। लोगों का तर्क है कि अगर धरना-प्रदर्शन की जगह संसद और मंत्रालयों से दूर कर दी गई, तो विरोध सिर्फ औपचारिकता बनकर रह जाएगा और सरकार पर जनदबाव भी कम हो जाएगा। ऐसे में लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात प्रभावी ढंग से रखने का अधिकार कमजोर पड़ सकता है।