Masik Karthigai Vrat Katha In Hindi: मासिक कार्तिगाई के व्रत की कथा क्या है, मासिक कार्तिगाई कथा हिंदी में, कार्तिकेय जी के व्रत से जुड़ी कहानी

Published on 7 अग॰ 2026

अध्यात्म

  • Authored by: निधि जैन
  • Updated Aug 7, 2026, 10:11 AM IST

Masik Karthigai Ke Vrat Ki Katha:​​ क्या आप भी हर महीने मासिक कार्तिगाई का व्रत रखते हैं? अगर हां, तो उपवास के दौरान भगवान कार्तिकेय से जुड़ी कथा जरूर पढ़ें। यहां पर मासिक कार्तिगाई के दिन पढ़ी जाने वाली 2 कथाएं दी गई हैं।

Image

मासिक कार्तिगाई के दिन जरूर करें इस कथा का पाठ

Masik Karthigai Katha In Hindi: हर महीने मासिक कार्तिगाई का पर्व मनाया जाता है। ज्योतिष गणना के अनुसार, जिस दिन आसमान में चंद्रमा कृत्तिका नक्षत्र में होता है, उसी दिन मासिक कार्तिगाई मनाई जाती है। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र कार्तिकेय जी की विशेष रूप से पूजा की जाती है। दीपदान किया जाता है। साथ ही कुछ लोग व्रत रखते हैं। मान्यता है कि मासिक कार्तिगाई के दिन पूजा करने से नकारात्मक ऊर्जा, भय, घर में अशांति, खराब सेहत और शत्रु आदि से छुटकारा मिलता है।

जो लोग मासिक कार्तिगाई के दिन भगवान कार्तिकेय जी को खुश करने के लिए उपवास रखते हैं, उन्हें व्रत की कथा भी पढ़नी चाहिए। इसके बिना व्रत को अधूरा माना जाता है। चलिए अब जानें मासिक कार्तिगाई व्रत की कथा के बारे में।

मासिक कार्तिगाई व्रत की कथा

बता दें कि मासिक कार्तिगाई के दिन से जुड़ी कई कथाओं का वर्णन पौराणिक शास्त्रों में किया गया है, जिसमें से दो सबसे प्रचलित कथाएं यहां दी गई हैं।

पहली कथा-

भगवान कार्तिकेय को 6 कृतिका नक्षत्रों की देवियों ने 6 अलग-अलग शिशुओं के रूप में पाला था। इन 6 रूपों को माता पार्वती ने एक सुंदर बालक के रूप में बदला, जिसे मुरुगन नाम दिया गया। मुरुगन देव को शक्ति और विजय का देवता माना जाता है, जिनका एक नाम भगवान कार्तिकेय भी है। जिस दिन ये विशेष घटना घटी थी, उस दिन वैकासी विशाखम का पर्व मनाया जाता है। वहीं, छह कृतिका माताओं के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए हर महीने कृतिका नक्षत्र के दिन मासिक कार्तिगाई का व्रत रखा जाता है।

दूसरी कथा-

पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की थी। सृष्टि की रचना के कुछ समय बाद ही ब्रह्मा जी और जगत के पालनहार विष्णु जी के बीच अपनी-अपनी श्रेष्ठता को लेकर विवाद छिड़ गया। दोनों के बीच का विवाद खत्म ही नहीं हो रहा था, जिसके कारण अन्य देवतागण भी परेशान थे। विवाद को खत्म करने के लिए भगवान शिव अनंत ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए और आकाशवाणी हुई कि 'आप दोनों में से जो भी इस ज्योतिर्लिंग का आदि या अंत ढूंढ लेगा, वही सर्वश्रेष्ठ कहलाएगा।

इसके बाद विष्णु जी ने वराह अवतार लिया और पाताल लोक जाकर ज्योतिर्लिंग का आदि-अंत ढूंढने का प्रयास किया। वहीं, दूसरी तरफ ब्रह्मा जी हंस रूप में आकाश की ऊंचाइयों में उड़ते गए। कहा जाता है कि ब्रह्मा जी और विष्णु जी ने कई युगों तक प्रयास किया, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली।

आखिर में विष्णु जी ने अपनी हार स्वीकार कर ली, लेकिन ब्रह्मा जी ने केतकी के फूल से झूठी गवाही दिलाई कि उन्हें अंत मिल गया है। शिव जी को पता था कि ब्रह्मा जी झूठ बोल रहे हैं। जब ब्रह्मा जी ने सच नहीं बताया तो वो बहुत क्रोधित हुए और प्रचंड रूप धारण कर लिया, जिससे पूरी धरती में हाहाकार मच गया।

इसके बाद सभी देवताओं ने शिव जी से क्षमा याचना की, जिसके बाद उनकी ज्योति तिरुमल्लई पर्वत पर अरुणाचलेश्वर लिंग के रूप में स्थापित हुई। बता दें कि इस कथा से कार्तिगाई दीपम दीपों का महत्व जुड़ा है, जिसे शिव जी की अनंत ज्योति का प्रतीक माना जाता है।

Nidhi Jain

निधि जैनauthor

निधि जैन Times Now नवभारत डिजिटल में सीनियर कॉपी एडिटर के तौर पर जुड़ी हैं। इन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 4 साल से ज्यादा का अनुभव है। पढ़ने और लिखने के प्रति इनकी रुचि ही इन्हें जर्नलिज्म की ओर लेकर आई। निधि अब तक हेल्थ, लाइफस्टाइल, धर्म और आध्यात्मिक विषयों पर 4,000 से अधिक आर्टिकल लिख चुकी हैं।

और पढ़ें

  • Hindi News
  • Spirituality

End of Article