भोपाल, 21 सितंबर 2026: सभ्यता, अनुशासन और उचित रणनीति के कारण अतिथि विद्वानों के आंदोलन का पहला चरण, मात्र एक सप्ताह में सफल हो गया। सरकार से उनको आश्वासन मिल गया है और उन्होंने उच्च शिक्षा विभाग के आयुक्त के शब्दों का सम्मान करते हुए अपने आंदोलन को 13 दिन के लिए स्थगित कर दिया है।
अतिथि विद्वानों के आंदोलन की पृष्ठभूमि
उल्लेखनीय है कि राहुल गांधी, कमलनाथ, जीतू पटवारी, ज्योतिरादित्य सिंधिया से लेकर शिवराज सिंह चौहान तक सभी ने अतिथि विद्वानों को आश्वासन दिया था कि यदि वह सत्ता में आते हैं तो अतिथि विद्वानों के नियमित जी कारण के लिए पॉलिसी बनाएंगे। श्री सिंधिया ने तो यहां तक कहा था कि यदि सरकार ने उनकी मांग पूरी नहीं की तो, वह अतिथि विद्वानों के साथ सड़क पर उतर आएंगे। हालांकि किसी ने भी अपने आश्वासन को पूरा नहीं किया और अतिथि विद्वान पिछले 9 सालों से एक ही मांग को लेकर लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं। खास बात यह है कि इतनी विषम स्थिति होने के बाद भी अतिथि विद्वानों ने विनम्रता और अनुशासन एवं वरिष्ठ अधिकारियों का सम्मान करना नहीं छोड़ा।
अतिथि विद्वान डॉ. राकेश कुमार सिंह ने बताया कि उच्च शिक्षा आयुक्त प्रबल सिपाहा, उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार के प्रतिनिधि के रूप में नीलम पार्क पहुंचे थे। हमने मांग रखी कि जब तक स्थायित्व की नीति नहीं बन जाती, तब तक फॉलन आउट की प्रक्रिया रोकी जाए। आयुक्त ने इसे नीतिगत विषय बताते हुए मंत्री से चर्चा कर समाधान का प्रयास करने की बात कही। डॉ. सिंह ने कहा कि नीति बनने तक वर्षों से सेवाएं दे रहे अतिथि विद्वानों को बेरोजगार नहीं किया जाए। इसी उम्मीद में आंदोलन को 3 अक्टूबर तक स्थगित किया गया है।
4 अक्टूबर से ‘विद्वान जनता पार्टी’ पर फैसला
डॉ. राकेश कुमार सिंह के अनुसार, 3 अक्टूबर तक मांगों पर समाधान नहीं हुआ तो 4 अक्टूबर से आंदोलन का अगला चरण शुरू होगा। उन्होंने बताया कि 15 सितंबर को सांकेतिक रूप से ‘विद्वान जनता पार्टी’ (वीजेपी) के गठन की घोषणा की जा चुकी है। डॉ. सिंह ने कहा कि यदि फॉलन आउट नहीं रोका गया तो मंत्री इंदर सिंह परमार के सुझाव के आधार पर अतिथि विद्वान अपनी पार्टी बनाकर चुनाव लड़ने पर निर्णय लेंगे।
बच्चे को साथ लेकर धरने पर बैठीं 10 साल से कार्यरत विद्वान
इंदौर से आईं नेट और पीएचडी योग्यताधारी डॉ. सुप्रिया अग्रवाल ने बताया कि वह करीब 10 साल से अतिथि विद्वान के तौर पर सेवाएं दे रही हैं। उनके मुताबिक, किसी कॉलेज में नई नियुक्ति या तबादला होने पर उन्हें फॉलन आउट कर दिया जाता है, जिससे रोजगार का संकट खड़ा हो जाता है। उन्होंने बताया कि घर पर बच्चे की देखभाल के लिए कोई नहीं होने के कारण वह बच्चे को साथ लेकर धरने पर बैठी हैं। उन्होंने अतिथि विद्वान महिलाओं के लिए ‘चाइल्ड केयर लीव’ (शिशु देखभाल अवकाश) की मांग की। सुप्रिया ने कहा कि कई अतिथि विद्वान 55 से 60 वर्ष की उम्र तक पहुंच चुके हैं। ऐसे में बार-बार परीक्षा या साक्षात्कार की प्रक्रिया के बजाय उनके लिए स्थायी नीति बनाई जानी चाहिए।
अतिथि विद्वानों का मुख्य विरोध फॉलन आउट व्यवस्था को लेकर है। इसके तहत किसी कॉलेज में नियमित प्राध्यापक की नियुक्ति या तबादला होने पर वहां पहले से कार्यरत अतिथि विद्वान को सेवा से बाहर कर दिया जाता है।
