मानसून सत्र में NDA बनाम INDIA गठबंधन: किसके पास कितनी ताकत?

Published on 20 जुल॰ 2026

मानसून सत्र का पहला दिन काफी हंगामेदार साबित हुआ. इस दिन राम मंदिर में चढ़ावे चोरी का मामला, नीटे मामले समेत कई मुद्दों पर जमकर हंगामा हुआ. लोकसभा में सदन को स्थगित करना पड़ा. आपको बता दें कि इस सत्र में कई नए विधेयक पेश करने और कुछ पुराने लंबित विधेयकों को पारित कराने की कोशिश होगी. इनमें कर व्यवस्था, न्यायपालिका, छोटे उद्योगों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं से जुड़े प्रस्ताव शामिल किए गए हैं. ऐसे में सरकार को संख्याबल की जरूरत होगी. 

लोकसभा की तस्वीर 

NDA के पास पहले से बहुमत है. हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों (जैसे कुछ दलों में टूट और नए समर्थन) के बाद उसकी स्थिति और मजबूत मानी जा रही है. कुछ रिपोर्ट की मानें तो सभी संभावित समर्थन जुड़ते हैं तो NDA का आंकड़ा करीब 319 सांसदों तक पहुंच जाता है. INDIA गठबंधन अभी भी सबसे बड़ा विपक्षी मोर्चा बनकर उभरा है. मगर उसके भीतर कई सहयोगी दलों के अलग-अलग रुख और आंतरिक चुनौतियां उसकी एकजुटता पर सवाल खड़े कर सकती है. 

राज्यसभा में तस्वीर

राज्यसभा में भी NDA हाल के महीनों में बेहतर हुई है. उसे कई मुद्दों पर बढ़त मिलती दिखाई दे रही है. हालांकि, संविधान संशोधन जैसे विधेयकों के लिए केवल साधारण बहुमत पर्याप्त नहीं होता. यहां पर खास बहुमत की जरूरत होती है. इसमें जोड़तोड़ की भी कोशिश हो सकती है. 

सरकार की प्राथमिकताओं में कई अहम बिल शामिल है. इनमें परिसीमन (Delimitation) से जुड़े प्रस्तावों पर चर्चा संभव है. वहीं विपक्ष NEET, अन्य राजनीतिक विवादों और जनहित के मुद्दों पर सरकार को घेरने की कोशिश है. 

इस सत्र में क्या होगा अहम?

सरकार जिन प्रमुख विधेयकों पर आगे बढ़ाने की कोशिश में है उनमें आयकर संशोधन, सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने, जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण व्यवस्था में बदलाव, राष्ट्रीय सम्मान से जुड़े कानून में संशोधन और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME) क्षेत्र से जुड़े संशोधन खास माने गए हैं. सरकार के अनुसार, इन कानूनों से प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने और विकास से जुड़े निर्णयों को तेजी मिलने में मदद मिलेगी. 

पुराने लंबित विधेयकों पर भी रहेगी नजर

नए विधेयकों के अलावा सरकार कुछ ऐसे कानूनों को भी आगे बढ़ाना चाहती है जो बीते सत्रों में लंबित हैं. इनमें विदेशी अंशदान नियमन (FCRA) से जुड़े संशोधन, शिक्षा से  संबंधित प्रस्ताव और कुछ अध्यादेशों को कानून का रूप देने की प्रक्रिया हो सकती है. सरकार के लिए इन बिलों को पारित करना कठिन होगा. इसकी वजह है कि कई मामलों  में विपक्ष की सहमति या पर्याप्त संख्या बल की जरूरत होती है. 

परिसीमन पर राजनीतिक विवाद

इस सत्र में सबसे अधिक नजर परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़ा है. इसमें संभावित संविधान संशोधन पर रहने वाला है. हालांकि यह शुरुआती कार्यसूची का भाग नहीं है. मगर  राजनीतिक गलियारों में इसकी चर्चा तेज है. अगर इस विषय पर विधेयक लाया जाता है, तो इसका उद्देश्य भविष्य में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को लेकर एक-तिहाई सीटें आरक्षित करना होगा. इसके साथ सीटों के नए परिसीमन का मुद्दा भी जुड़ा हुआ है.

संसद के मानसून सत्र में सरकार और विपक्ष के बीच मुकाबला मात्र मुद्दों का नहीं है. यह संख्याबल (numbers game) का भी है. इस बार कई राजनीतिक घटनाक्रमों के बाद दोनों खेमों की ताकत पहले जैसी नहीं रही है.

संख्या बल का क्या असर पड़ेगा?

 हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों और कुछ विपक्षी नेताओं के दलबदल के बाद सत्ता पक्ष अपने संसदीय समर्थन को मजबूत मान रहा है. वहीं विपक्ष भी अपने सहयोगी दलों के संग मिलकर सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति को तैयार करने में लगा है. अगर सदन में किसी मुद्दे पर मतदान की नौबत आती है तो हर दल की संख्या अहम साबित हो सकती है.

स्पीकर के फैसलों पर नजर

इस सत्र के दौरान लोकसभा अध्यक्ष के कुछ संभावित फैसलों पर भी राजनीतिक दलों की नजर टिकी है. कुछ सांसदों से जुड़े लंबित मामलों पर अगर फैसला आता है तो इसका असर सदन के संख्या संतुलन पर पड़ेगा.ऐसे फैसले यह तय करते हैं कि किसी दल की संसदीय ताकत में इजाफा होगा या घटेगी. ऐसे में सभी राजनीतिक दल संसदीय प्रक्रिया के हर कदम पर नजर बनाए हुए हैं.

क्या होता है मानसून सत्र?

मानसून सत्र भारतीय संसद के तीन नियमित सत्रों में एक है. यह आमतौर पर जुलाई से अगस्त या सितंबर के बीच में किया जाता है. इस दौरान लोकसभा और राज्यसभा की  बैठकें होती हैं. इसमें सरकार नए विधेयक (बिल) पेश करती है. लंबित विधेयकों पर चर्चा होती है और उन्हें पारित करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाती है.

मानसून सत्र के दौरान सांसद सरकार की नीतियों और फैसलों पर सवाल उठाते हैं. विभिन्न राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मुद्दों पर चर्चा करते हैं तथा जनता से जुड़े विषयों को सदन में रखते हैं. विपक्ष सरकार से जवाब मांगता है. वहीं सरकार अपने विधायी और नीतिगत एजेंडे को आगे बढ़ाने का प्रयास करती है. भारतीय संविधान संसद के सत्रों की संख्या तय नहीं करता, लेकिन यह अनिवार्य है कि संसद की दो बैठकों के बीच छह माह से अधिक का अंतर न हो. इसी व्यवस्था के तहत हर वर्ष बजट सत्र, मानसून सत्र और शीतकालीन सत्र आयोजित किए जाते हैं.

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मानसून सत्र से जुड़े FAQ

Q1. संसद का मानसून सत्र क्या होता है?
मानसून सत्र भारतीय संसद के तीन नियमित सत्रों में से एक होता है. यह आमतौर पर जुलाई से अगस्त या सितंबर के बीच आयोजित किया जाता है. इसमें सरकार नए विधेयक पेश करती है, लंबित बिलों पर चर्चा होती है और विभिन्न राष्ट्रीय मुद्दों पर बहस की जाती है.

Q2. इस मानसून सत्र में सरकार किन प्रमुख विधेयकों को पेश कर सकती है?
सरकार आयकर संशोधन, सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने,जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण व्यवस्था में बदलाव, राष्ट्रीय सम्मान कानून में संशोधन और MSME से जुड़े विधेयकों को आगे बढ़ाने की तैयारी में है.

Q3. क्या पुराने लंबित विधेयकों पर भी चर्चा होगी?
हां, सरकार विदेशी अंशदान नियमन (FCRA) संशोधन, शिक्षा से जुड़े प्रस्तावों और कुछ अध्यादेशों को कानून का रूप देने वाले लंबित विधेयकों को भी आगे बढ़ाने का प्रयास कर सकती है.

Q4. लोकसभा में NDA की स्थिति कितनी मजबूत है?
लोकसभा में NDA के पास पहले से बहुमत है. हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों और नए समर्थन के बाद उसका आंकड़ा लगभग 319 सांसदों तक पहुंचने का दावा किया जा रहा है. इससे सरकार की स्थिति और मजबूत मानी जा रही है.

Q5. राज्यसभा में सरकार के लिए क्या चुनौती है?
राज्यसभा में NDA के हालात पहले से बेहतर है, लेकिन संविधान संशोधन जैसे विधेयकों को पारित कराने के लिए खास बहुमत की आवश्यकता है. ऐसे मामलों में सरकार को अन्य  दलों का समर्थन जुटाना पड़ सकता है.

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