नेपाल बाढ़ में क्यों फेल हुआ 'स्पेस का सबसे महंगा पहरेदार'? NISAR को क्यों नहीं लगी तबाही की भनक

Published on 1 सित॰ 2026

Nepal Flood: नेपाल बाढ़ में 11,000 करोड़ का NISAR सैटेलाइट सवालों में है। हिमालयी आपदाओं को ट्रैक करने के लिए बना एडवांस्ड सिस्टम वक्त पर अलर्ट देने में क्यों चूका? जानिए पूरा मामला।

NISAR Nepal Glacier Monitoring: नेपाल के रसुवा में ग्लेशियर टूटने और मलबे के सैलाब ने भयानक तबाही मचाई। जान-माल का भारी नुकसान हुआ और पूरा इलाका दहल उठा। इस त्रासदी के बाद अब अंतरिक्ष विज्ञान (Space Science) को लेकर भी एक सवाल उठ रहा है कि जब हिमालय में इतनी बड़ी हलचल हो रही थी, तब दुनिया का सबसे ताकतवर रडार सैटेलाइट NISAR क्या कर रहा था? करीब 1.3 बिलियन डॉलर (करीब ₹11,000 करोड़) की लागत से तैयार NASA और ISRO का यह जाइंट प्रोजेक्ट हिमालयी खतरों को ट्रैक करने के लिए ही बना था। दावा था कि यह जमीन की 1-1 मिलीमीटर की हलचल पकड़ लेगा। लेकिन नेपाल संकट के दौरान इसका कोई डेटा या अलर्ट सामने क्यों नहीं आया?

NISAR: क्यों माना जाता है स्पेस की 'तीसरी आंख'?

NISAR (NASA-ISRO Synthetic Aperture Radar) कोई साधारण सैटेलाइट नहीं है। इसके पास पृथ्वी की निचली कक्षा में तैनात अब तक का सबसे बड़ा 12 मीटर का एंटीना है। इसका डुअल रडार तकनीक घने बादलों, बारिश और अंधेरे के पार भी जमीन की सटीक तस्वीरें ले सकता है। इसमें मिलीमीटर लेवल ट्रैकिंग सिस्टम है। पहाड़ का थोड़ा-सा भी खिसकना, ग्लेशियर की गति या जमीन का धंसना, ये सब इसके रडार पर साफ दिखने का दावा था। पूरी दुनिया की सतह को हर 12 दिन में स्कैन करना इसका मेन रूटीन है।

नेपाल त्रासदी पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?

पब्लिक डोमेन से डेटा गायब

नेपाल में जो हुआ ग्लेशियर फटना, भारी लैंडस्लाइड और अचानक आई बाढ़, ये ठीक वही प्राकृतिक आपदा थी, जिसके लिए NISAR को डिजाइन किया गया था। ISRO के अन्य सैटेलाइट्स (Cartosat और Resourcesat) और प्राइवेट कंपनियों ने तस्वीरें जारी कीं, लेकिन NISAR की तरफ से कोई शुरुआती वैज्ञानिक रिपोर्ट या अलर्ट पब्लिक के सामने नहीं आया।

वेनेजुएला में एक्टिव, नेपाल में खामोश?

जून 2026 में जब वेनेजुएला में 7.2 तीव्रता का भूकंप आया था, तब NISAR ने कुछ ही दिनों में ग्राउंड शिफ्टिंग का पूरा मैप बनाकर दे दिया था। फिर हिमालय की इस तबाही पर चुप्पी क्यों?

क्या वाकई फेल हुआ NISAR सैटेलाइट?

डेटा कलेक्टर बनाम अलार्म सिस्टम

नासा के प्रोजेक्ट साइंटिस्ट्स के मुताबिक, सैटेलाइट तकनीकी रूप से फेल नहीं हुआ है। असल पेंच सिस्टम और डेटा एनालिसिस में है। NISAR कोई ऑटोमैटिक सायरन नहीं है, जो खतरा देखते ही खुद बज उठे। यह सिर्फ कच्चा (Raw) डेटा इकट्ठा करता है, जिसका विश्लेषण वैज्ञानिकों और कंप्यूटर टूल्स को करना होता है।

हिमालय का मुश्किल भूगोल

हिमालयी क्षेत्र में डेटा के बेसलाइन ट्रेंड को समझने में समय लगता है। वैज्ञानिकों की टीम अभी ऐसे ऑटोमेटेड टूल्स बना रही है, जो असामान्य हलचलों को तुरंत पहचान सकें।

डेटा प्रोसेसिंग में देरी

अंतरिक्ष से डेटा आने और उसका वैज्ञानिक निष्कर्ष निकालने के बीच एक टाइम-गैप होता है, जिस वजह से तुरंत अलर्ट जारी नहीं हो सका।