पश्चिम में वीजा पर कड़ा पहरा! अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा से बोरिया-बिस्तर बांध भारत लौट रहे NRI, क्या शुरू हुआ 'रिवर्स ब्रेन ड्रेन'?

Published on 13 सित॰ 2026

पश्चिमी देशों में वर्क वीजा, पोस्ट-स्टडी परमिट और नागरिकता के नियमों में जारी अभूतपूर्व कड़ाई ने वैश्विक प्रतिभा प्रवाह का रुख मोड़ दिया है, जिससे अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा से कुशल भारतीय पेशेवरों और छात्रों की बड़े पैमाने पर स्वदेश वापसी शुरू हो गई है. रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका में H-1B वीजा पर अनिश्चितता, ब्रिटेन में Graduate Route वीजा पर पाबंदियां, और कनाडा द्वारा स्टडी परमिट व परमानेंट रेजिडेंसी (PR) कोटा में की गई भारी कटौती के कारण पश्चिमी सपनों पर पानी फिरता दिख रहा है.

बीते दशकों में जहां ‘ब्रेन ड्रेन’ भारत की सबसे बड़ी चिंता थी, वहीं अब पश्चिमी देशों में बढ़ती छंटनी, जीवन-यापन की लागत (Cost of Living Crisis), और इमिग्रेशन विरोधी पॉलिसीज के चलते यह ट्रेंड ‘रिवर्स ब्रेन ड्रेन’ में बदल चुका है. हजारों टेक प्रोफेशनल्स, रिसर्चर्स और मैनेजमेंट स्नातक अब स्वदेश लौटकर भारत की तेज आर्थिक वृद्धि का हिस्सा बन रहे हैं.

यह रणनीतिक बदलाव भारतीय इकोनॉमी और कॉर्पोरेट जगत के लिए एक बड़ा अवसर बनकर उभरा है. एक तरफ जहां पश्चिमी अर्थव्यवस्थाएं मंदी और नीतिगत अनिश्चितता से जूझ रही हैं, वहीं भारत में स्थापित हो रहे नए ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स, सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम, और स्टार्टअप्स इन वैश्विक अनुभव वाले पेशेवरों को आकर्षित कर रहे हैं.

भारत में प्रतिस्पर्धी सैलरी पैकेज, बेहतर जीवन स्तर, और तेजी से बढ़ते डोमेस्टिक मार्केट ने एनआरआई (NRI) और अंतर्राष्ट्रीय छात्रों के लिए स्वदेश वापसी को एक मजबूर फैसला नहीं, बल्कि एक आकर्षक करियर विकल्प बना दिया है. आइए इसे विस्तार से समझने की कोशिश करते हैं…

ये हैं कुछ अहम उदाहरण

25 साल की अवनी पटेल का भारत लौटने का कोई प्लान नहीं था. उन्होंने 2024 में यूनाइटेड किंगडम में कम्युनिकेशन और मीडिया का कोर्स पूरा किया था और उनके पास वहां नौकरी खोजने के लिए लगभग दो साल का समय था. लेकिन उन्हें एक ऐसी समस्या का सामना करना पड़ा जिसका उनकी काबिलियत से कोई लेना-देना नहीं था: वीजा स्पॉन्सरशिप की बढ़ती कॉस्ट.

कम से कम दो कंपनियों ने उनसे कहा कि वे उनके वीजा को स्पॉन्सर नहीं कर सकतीं. पटेल ने कहा कि उन्होंने कहा कि आप बहुत अच्छी हैं, लेकिन हम आपको नहीं रख सकते. क्योंकि दो साल बाद, हम आपको स्पॉन्सर नहीं कर पाएंगे. पिछले दो सालों में, UK ने अपने वर्क वीजा नियमों को कम से कम दो बार कड़ा किया है: स्किल्ड वर्कर वीजा के लिए योग्य नौकरियों के लिए न्यूनतम सैलरी की सीमा 2024 में लगभग 35,409 डॉलर से बढ़कर अप्रैल तक लगभग 52,303 डॉलर और फिर जुलाई 2025 तक लगभग 56,358 डॉलर हो गई. इस दबाव के कारण भारतीय एम्प्लॉयर्स की विदेशी टैलेंट के बारे में सोच बदलने लगी है.

बेंगलुरु की एक कंपनी ने हाल ही में ‘रिवर्स ब्रेन ड्रेन’ (विदेश गए टैलेंट की वापसी) को कैचफ्रेज़ बनाकर AI/ML इंजीनियर की पोस्ट निकाली. ईटी की रिपोर्ट के अनुसार रिलायंस इंडस्ट्रीज, महिंद्रा ऑटोमोटिव और एक्सिस बैंक जैसी कंपनियों ने भी भारत लौटने वाले लोगों के लिए नौकरियां निकाली हैं. वीजा खत्म होने के बाद पटेल इस साल की शुरुआत में भारत आ गईं. वह अकेली नहीं हैं.

25 साल के अरुंदव एस भारत में ऐसी नौकरियां ढूंढ रहे हैं जिनसे उन्हें सालाना कम से कम 9 लाख रुपए मिल सकें. उन्होंने कहा कि UK में मैं जो भी कमाता हूं, वह मेरे खर्चों में ही चला जाता है, जो पिछले कुछ सालों में बहुत बढ़ गए हैं. लेकिन अरुंदव तब तक लौटने को तैयार नहीं हैं जब तक उन्हें ऐसी नौकरी न मिल जाए जिससे वे अपना लोन चुका सकें. यह बदलाव जॉब मार्केट में भी दिख रहा है. UK-बेस्ड करियर प्लेटफॉर्म ‘स्टूडेंट सर्कस’ छात्रों को UK और दूसरे देशों में नौकरियां खोजने में मदद करता है.

मेट्रो शहरों में नौकरियों की मांग

इसने भारत में भी नौकरियां लिस्ट करना शुरू कर दिया है, और उन रोल्स में लोगों की दिलचस्पी बढ़ रही है. इस प्लेटफॉर्म पर भारत में नौकरियों से जुड़े व्यूज 2023 में 8,052 से बढ़कर जुलाई 2026 तक लगभग तीन गुना होकर 22,312 हो गए. ‘स्टूडेंट सर्कस’ की को-फाउंडर तृप्ति माहेश्वरी ने कहा कि इंटरनेशनल स्टूडेंट्स के लिए पहली नौकरी मिलना पूरी बात का सिर्फ एक हिस्सा है. स्पॉन्सरशिप पाना, लंबे समय का करियर बनाना और देश में बने रहना – ये बातें अब ज्यादा मायने रखती हैं कि वे अपना करियर कहां शुरू करना चाहते हैं. ‘स्टूडेंट सर्कस’ लीड्स, ब्रिस्टल और इंपीरियल कॉलेज लंदन जैसे विश्वविद्यालयों के साथ मिलकर काम करता है. इस प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करने वाले ज्यादातर ग्रेजुएट बेंगलुरु, मुंबई, गुरुग्राम और हैदराबाद जैसे मेट्रो शहरों में नौकरी ढूंढ रहे हैं.

वीजा तय करते हैं करियर के फैसले

26 साल की दिव्या एस ने लंदन में सोशल वर्क ऑफिसर के तौर पर काम किया. जब उनका वीजा खत्म होने वाला था, तो उन्होंने भी वापस लौटने के बारे में सोचना शुरू कर दिया. उनके एम्प्लॉयर ने वीजा स्पॉन्सर नहीं किया, और इसी बीच UK ने अपने वीजा नियम भी कड़े कर दिए. उन्होंने कहा कि आखिरी समय में, यानी वहां मेरे आखिरी छह महीनों के दौरान, उन्होंने वीजा के नियम और कड़े कर दिए थे.

पिछले साल अक्टूबर तक, दिव्या ने सिर्फ भारत में नौकरियों के लिए अप्लाई करना शुरू कर दिया था. आखिरकार उन्हें इस साल अप्रैल में नौकरी मिल गई, लेकिन उन्होंने बताया कि उसी समय वापस लौटे कई दोस्त अभी भी बेरोजगार हैं. उन्होंने कहा कि मैं सात-आठ ऐसे लोगों को जानती हूं जो अभी सचमुच बेरोजगार हैं और उन्हें नौकरी नहीं मिल रही है.

यह बदलाव ऐसे समय में आया है जब UK छोड़ने वाले लोगों की संख्या बढ़ रही है. ऑफिस फॉर नेशनल स्टैटिस्टिक्स’ के अनुसार, 2025 में खत्म हुए साल में अनुमानित 278,000 नॉन-यूरोपीय यूनियन के नागरिकों ने लंबे समय के लिए UK छोड़ दिया. इस ग्रुप में भारतीयों की संख्या सबसे ज्यादा थी, उसके बाद चीनी नागरिक थे.

ब्रिटिश द्वीपों से आगे

यह ट्रेंड सिर्फ UK तक सीमित नहीं है. विदेशों में रहने वाले ज्यादातर भारतीयों को लग रहा है कि इमिग्रेशन नियम और वीजा को लेकर अनिश्चितता उनके करियर प्लान पर असर डाल रही है. अमेरिका में भी ऐसा ही ट्रेंड देखने को मिल रहा है, जहां कुछ भारतीय प्रोफेशनल वीजा को लेकर अनिश्चितता के कारण भारत लौट रहे हैं. क्वेस कॉर्प में IT स्टाफ़िंग के चीफ़ एग्जिक्यूटिव कपिल जोशी ने कहा वापस आने वालों की संख्या हर साल बढ़ी है, और बाहर जाने वाले और वापस आने वाले टैलेंट के बीच का अंतर कम होता जा रहा है. H-1B पॉलिसी भी एक वजह है; नई पिटीशन फीस और ग्रीन कार्ड के बदलते नियमों की वजह से कई सालों की योजना बनाना और उसके लिए फंडिंग का इंतजाम करना मुश्किल हो गया है.

घर वापसी की एक कीमत है

लेकिन घर लौटने का मतलब हमेशा ज्यादा नौकरियां या ज्यादा सैलरी नहीं होता. नौकरी चाहने वालों के लिए बने गुमनाम कम्युनिटी ऐप ‘ब्लाइंड’ के हालिया सर्वे में पाया गया कि वापस आने वाले कई लोग उन्हीं मल्टीनेशनल कंपनियों के भारतीय ऑफिस में शामिल हो रहे हैं जिनके लिए वे पहले अमेरिका में काम करते थे, लेकिन उन्हें काफी कम सैलरी मिल रही है. भारत में 1,276 वेरिफाइड प्रोफेशनल्स के सर्वे में पाया गया कि 53 फीसदी लोगों ने वीजा से जुड़ी दिक्कतों के कारण लोगों को अमेरिका से वापस आते देखा है. इनमें से 36 फीसदी ने कहा कि उनके साथी या नौकरी के उम्मीदवार पहले ही वापस आ चुके हैं, जबकि 17 फीसदी ऐसे लोगों को जानते थे जो वापस आने की योजना बना रहे हैं. वीजा की सख्ती का असर छात्रों पर भी पड़ रहा है. UK में इंटरनेशनल छात्रों के लिए पढ़ाई के बाद रुकने की अवधि कम की जा रही है. अगले साल जनवरी से किए जाने वाले आवेदनों के लिए ग्रेजुएट वीजा की अवधि दो साल से घटाकर 18 महीने की जा रही है.

सौरभ शर्मा

सौरभ शर्मा

2008 से शेयर मार्केट, इकोनॉमी और कमोडिटी कवर कर रहे हैं. टीवी9 के साथ जुड़ने से पहले डीएनए, ए​शियानेट, जनसत्ता, दैनिक जागरण और राजस्थान पत्रिका जैसे कई बड़े संस्थानों के साथ भी जुड़े रहे.

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