Kairana Assembly Caste Equations: कैराना विधानसभा के जातिगत समीकरण, 2026 में 3.01 लाख वोटर

Published on 28 जुल॰ 2026

Kairana Assembly Caste Equations पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि शामली जिले की कैराना विधानसभा सीट पर किसी एक जाति या समुदाय के आधार पर चुनावी नतीजे को समझना आसान नहीं है। मुस्लिम मतदाता इस सीट का सबसे बड़ा सामाजिक समूह माने जाते हैं, लेकिन कश्यप, गुर्जर, जाट, दलित-कोरी, सैनी और दूसरे पिछड़े वर्गों का संयुक्त वोट किसी भी चुनाव में मुकाबले की दिशा बदलने की क्षमता रखता है।

2026 की अंतिम मतदाता सूची के अनुसार कैराना विधानसभा क्षेत्र में 3,01,904 मतदाता हैं। इनमें 1,64,993 पुरुष, 1,36,899 महिला और 12 तृतीय लिंग मतदाता दर्ज हैं। कैराना शामली जिले की तीन विधानसभा सीटों में मतदाताओं की संख्या के लिहाज से सबसे बड़ी सीट है। जिले की तीनों सीटों—कैराना, थानाभवन और शामली—में कुल 8,69,007 मतदाता दर्ज हैं।

विधानसभा चुनाव में कैराना में कुल 3,22,423 मतदाता दर्ज थे। इस लिहाज से 2026 की सूची में मतदाताओं की संख्या करीब 20,519 कम, यानी लगभग 6.36 प्रतिशत नीचे है। 2022 में इस सीट पर 75 प्रतिशत से अधिक मतदान हुआ था, इसलिए मतदाता सूची में आया यह बदलाव 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक दलों के बूथ प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

विवरणजानकारी
विधानसभाकैराना
विधानसभा संख्या08
जिलाशामली
लोकसभा क्षेत्रकैराना
आरक्षणसामान्य
वर्तमान विधायकनाहिद हसन
पार्टीसमाजवादी पार्टी
2026 कुल मतदाता3,01,904
पुरुष मतदाता1,64,993
महिला मतदाता1,36,899
तृतीय लिंग मतदाता12
पोलिंग स्टेशन372
2022 विधानसभा विजेतानाहिद हसन, सपा
2022 जीत का अंतर25,887 वोट

कैराना विधानसभा की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता बड़ी मुस्लिम आबादी के साथ कई प्रभावशाली हिंदू पिछड़ी और किसान जातियों की मौजूदगी है। पुराने प्रकाशित चुनावी विश्लेषण में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या करीब 1.37 लाख, कश्यप करीब 40 हजार, गुर्जर 27 हजार से अधिक, जाट करीब 25 हजार और सैनी करीब 12 हजार बताई गई थी। अन्य समूहों में दलित, कोरी, ब्राह्मण, वैश्य, बावरिया, नाई-बढ़ई और ठाकुर मतदाता शामिल बताए गए थे। 2026 की मतदाता सूची में कुल वोटरों की संख्या घटकर 3,01,904 हो चुकी है।

महत्वपूर्ण: निर्वाचन आयोग की मतदाता सूची जाति-वार मतदाताओं की संख्या जारी नहीं करती। इसलिए नीचे दिए गए आंकड़े आधिकारिक जनगणना या निर्वाचन आयोग के जातिवार आंकड़े नहीं, बल्कि चुनावी विश्लेषण के लिए संकेतात्मक अनुमान हैं।

कैराना विधानसभा का अनुमानित जातीय समीकरण 2026

सामाजिक समूह2026 के अनुरूप अनुमानित मतदाताअनुमानित हिस्सेदारी
मुस्लिमकरीब 1,29,80043.0%
कश्यपकरीब 38,30012.7%
हिंदू गुर्जरकरीब 26,1008.6%
जाटकरीब 23,4007.8%
दलित/कोरी समूहकरीब 17,2005.7%
सैनीकरीब 11,6003.8%
नाई/बढ़ई व संबंधित समूहकरीब 9,9003.3%
ब्राह्मणकरीब 8,4002.8%
बावरियाकरीब 5,9002.0%
वैश्यकरीब 5,8001.9%
ठाकुरकरीब 4,7001.6%
अन्य समुदायकरीब 20,8006.9%
कुलकरीब 3,01,900लगभग 100%

यह तालिका बताती है कि मुस्लिम समुदाय कैराना विधानसभा का सबसे बड़ा वोटिंग ब्लॉक जरूर है, लेकिन वह अपने आप में सीट के कुल मतदाताओं का बहुमत नहीं बनाता। दूसरे शब्दों में, चुनाव जीतने के लिए मुस्लिम मतों के साथ पिछड़े वर्गों, किसानों, दलित और दूसरे सामाजिक समूहों में भी प्रभाव जरूरी हो जाता है।

मुस्लिम मतदाता कैराना की राजनीति का सबसे बड़ा केंद्र

कैराना में मुस्लिम मतदाताओं की अनुमानित हिस्सेदारी करीब 43 प्रतिशत के आसपास बैठती है। यह सीट की सबसे बड़ी सामाजिक आबादी है। इसी कारण प्रत्याशी चयन से लेकर गठबंधन और चुनाव प्रचार तक मुस्लिम वोटों की दिशा हमेशा राजनीतिक चर्चा के केंद्र में रहती है।

लेकिन कैराना का चुनाव केवल मुस्लिम बनाम गैर-मुस्लिम समीकरण से नहीं समझा जा सकता। 2012 में भाजपा के हुकुम सिंह ने जीत दर्ज की थी, जबकि 2017 और 2022 में समाजवादी पार्टी के नाहिद हसन जीते। यानी एक ही सामाजिक संरचना में अलग-अलग चुनावों में राजनीतिक परिणाम बदलते रहे हैं। मतों के भीतर भी अलग सामाजिक और स्थानीय पहचानें मौजूद हैं। नाहिद हसन के परिवार की राजनीतिक पृष्ठभूमि और क्षेत्र में लंबे समय से मौजूद संगठनात्मक नेटवर्क ने भी इस वोट के राजनीतिक व्यवहार को प्रभावित किया है।

कश्यप वोट कैराना में क्यों अहम है

कैराना में मुस्लिम मतदाताओं के बाद पुराने उपलब्ध अनुमानों में कश्यप मतदाताओं की संख्या सबसे बड़ी दिखाई देती है। 2026 की मतदाता संख्या के अनुपात में इनका अनुमान करीब 38 हजार के आसपास बैठता है।

करीब 12 से 13 प्रतिशत की हिस्सेदारी वाला कोई भी सामाजिक समूह अगर एकतरफा मतदान करता है तो वह सीट के नतीजे पर बड़ा प्रभाव डाल सकता है। यही कारण है कि भाजपा, सपा और अन्य दलों के लिए कश्यप मतदाताओं तक पहुंच चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रहती है।

कश्यप समुदाय की भूमिका उन परिस्थितियों में और बढ़ जाती है, जब बड़े राजनीतिक ध्रुवों के बीच जीत-हार का अंतर 20 से 30 हजार वोट के आसपास हो।

गुर्जर फैक्टर: कैराना की पुरानी राजनीतिक पहचान

कैराना की राजनीति में गुर्जर समुदाय का लंबे समय से प्रभाव रहा है। 2026 के अनुपातिक अनुमान में हिंदू गुर्जर मतदाताओं की संख्या करीब 26 हजार बैठती है।

वर्तमान विधायक नाहिद हसन को UttarPradesh.org के विधायक प्रोफाइल में मुस्लिम गुर्जर बताया गया है। उनके पिता मुनव्वर हसन भी क्षेत्र की राजनीति में बड़ा नाम रहे। प्रोफाइल के अनुसार नाहिद हसन पहली बार 2014 के विधानसभा उपचुनाव में चुने गए, मार्च 2017 में दूसरी और मार्च 2022 में तीसरी बार विधानसभा पहुंचे। जिक और पारिवारिक पृष्ठभूमि कैराना के गुर्जर समीकरण को केवल धार्मिक पहचान तक सीमित नहीं रहने देती। क्षेत्र में हिंदू और मुस्लिम गुर्जर मतदाताओं के बीच स्थानीय, किसान और बिरादरी से जुड़े मुद्दे भी चुनावी व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं।

जाट मतदाता और पश्चिमी यूपी का किसान समीकरण

कैराना विधानसभा में जाट मतदाताओं की अनुमानित संख्या 23 से 24 हजार के बीच मानी जा सकती है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में जाट वोट केवल संख्या के कारण नहीं, बल्कि किसान संगठनों, ग्रामीण नेटवर्क और आसपास की सीटों पर प्रभाव के कारण भी महत्वपूर्ण रहता है।

जाट मतदाता यदि किसी बड़े सामाजिक गठबंधन का हिस्सा बनते हैं तो चुनावी असर उनकी प्रत्यक्ष संख्या से अधिक दिखाई दे सकता है। 2022 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सपा और राष्ट्रीय लोकदल गठबंधन ने इसी किसान-पिछड़ा-मुस्लिम सामाजिक समीकरण के जरिए कई सीटों पर भाजपा को चुनौती दी थी।

हालांकि 2027 में गठबंधन और प्रत्याशियों का स्वरूप क्या होगा, इसे लेकर अंतिम स्थिति चुनाव करीब आने पर ही साफ होगी। इसलिए किसी जाति के वोट को पहले से किसी दल के खाते में जोड़ना उचित नहीं होगा।

दलित और कोरी मतदाताओं का वोट भी निर्णायक

पुराने उपलब्ध आंकड़ों में दलित और कोरी मतदाताओं को अलग-अलग श्रेणी में दिखाया गया था। इन्हें जोड़कर देखें तो 2026 के अनुपात में इनकी संयुक्त संख्या करीब 17 हजार के आसपास बैठती है।

दलित वोट का महत्व तब और बढ़ जाता है, जब प्रमुख दलों का चुनावी आधार दो बड़े खेमों में बंटा हो। बसपा की मौजूदगी, उसके प्रत्याशी का सामाजिक आधार और चुनावी सक्रियता यह तय कर सकती है कि इस वर्ग का कितना वोट स्वतंत्र रूप से बसपा के पास रहेगा और कितना अन्य दलों के बीच जाएगा।

इसी वजह से कैराना में बहुकोणीय चुनाव और सीधे भाजपा-सपा मुकाबले का परिणाम अलग-अलग हो सकता है।

सैनी, ब्राह्मण, वैश्य और ठाकुर मतदाता

कैराना विधानसभा में सैनी मतदाताओं का अनुमान करीब 11 से 12 हजार है। ब्राह्मण करीब आठ हजार, वैश्य करीब छह हजार और ठाकुर करीब पांच हजार के आसपास माने जा सकते हैं।

संख्या के लिहाज से ये समुदाय मुस्लिम, कश्यप, गुर्जर या जाटों से छोटे जरूर हैं, लेकिन चुनावी अंतर कम होने की स्थिति में इनका संयुक्त वोट निर्णायक हो सकता है।

वैश्य मतदाताओं का प्रभाव विशेष रूप से कस्बाई और कारोबारी इलाकों में, जबकि ठाकुर और ब्राह्मण मतदाताओं की राजनीतिक भूमिका ग्रामीण और परंपरागत पार्टी नेटवर्क से जुड़ी दिखाई देती रही है।

कैराना विधानसभा मतदाता सूची 2026 में क्या बदला?

2022 विधानसभा चुनाव के समय कुल मतदाता 3,22,423 थे। 2026 की अंतिम सूची में यह संख्या घटकर 3,01,904 रह गई है। यानी 20,519 मतदाताओं की कमी हुई है।

वर्षकुल मतदाताबदलाव
20173,00,659
20223,22,423+21,764
20263,01,904-20,519 बनाम 2022

2017 से 2022 के बीच कैराना में मतदाता संख्या बढ़ी थी, लेकिन 2026 के पुनरीक्षण के बाद यह फिर करीब 3.02 लाख पर आ गई। 2026 सूची में पुरुष मतदाता 1,64,993 और महिला मतदाता 1,36,899 हैं। ें 372 पोलिंग स्टेशन दर्ज हैं और प्रति पोलिंग स्टेशन औसतन करीब 812 मतदाता आते हैं। शामली जिले की तीनों विधानसभा सीटों में यह औसत सबसे अधिक है। ा विधानसभा का राजनीतिक इतिहास

कैराना उत्तर प्रदेश की उन विधानसभा सीटों में शामिल है जहां लंबे समय तक कुछ प्रमुख राजनीतिक परिवारों का असर दिखाई देता रहा है।

1980 के चुनाव में हुकुम सिंह जनता पार्टी सेक्युलर से विधायक बने। 1985 में उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर जीत हासिल की। 1989 में निर्दलीय प्रत्याशी राजेश्वर बंसल जीते। इसके बाद 1991 और 1993 में मुनव्वर हसन जनता दल से विधायक चुने गए।

हुकुम सिंह 1996 में भाजपा के टिकट पर विधानसभा पहुंचे और बाद के वर्षों में भी उन्होंने कैराना में अपनी राजनीतिक पकड़ बनाए रखी। 2002, 2007 और 2012 के विधानसभा चुनावों में भी उन्हें सफलता मिली। 2014 में लोकसभा चुनाव लड़ने के बाद विधानसभा सीट खाली हुई और उपचुनाव में नाहिद हसन पहली बार विधायक बने। 2022 के विधानसभा चुनाव में भी नाहिद हसन ने जीत दर्ज की। इस तरह पिछले एक दशक में कैराना की विधानसभा राजनीति में हसन परिवार की पकड़ मजबूत हुई है।

2007 से 2022 तक कैसे बदलता गया कैराना का चुनाव

चुनावविजेतापार्टीमुख्य प्रतिद्वंद्वीजीत का अंतर
2007हुकुम सिंहभाजपाअरशद हसन, रालोद8,500
2012हुकुम सिंहभाजपाअनवर हसन, बसपा19,543
2017नाहिद हसनसपामृगांका सिंह, भाजपा21,162
2022नाहिद हसनसपामृगांका सिंह, भाजपा25,887

2007 में भाजपा के हुकुम सिंह को 53,483 वोट मिले थे। 2012 में उनके वोट बढ़कर 80,293 हो गए। इसके बाद 2017 में सपा के नाहिद हसन ने 98,830 वोट हासिल किए और भाजपा की मृगांका सिंह को 21,162 वोट से हराया। नाहिद हसन ने अपनी बढ़त और मजबूत करते हुए 1,31,035 वोट हासिल किए। भाजपा की मृगांका सिंह को 1,05,148 वोट मिले और नाहिद हसन 25,887 वोट से विजयी रहे। में कैराना का चुनाव परिणाम

प्रत्याशीपार्टीवोट
नाहिद हसनसमाजवादी पार्टी1,31,035
मृगांका सिंहभारतीय जनता पार्टी1,05,148
अखलाककांग्रेस1,522

2022 में नाहिद हसन ने करीब 54 प्रतिशत वोट हासिल किए, जबकि भाजपा प्रत्याशी मृगांका सिंह को करीब 43 प्रतिशत वोट मिले। दोनों के बीच 25,887 वोट का अंतर रहा। ें मतदान प्रतिशत भी लगातार बढ़ा है। 2007 में करीब 51 प्रतिशत मतदान हुआ था, जो 2012 में 66.03 प्रतिशत, 2017 में 69.57 प्रतिशत और 2022 में 75.18 प्रतिशत तक पहुंच गया। हसन का राजनीतिक सफर

नाहिद हसन कैराना विधानसभा से समाजवादी पार्टी के वर्तमान विधायक हैं। उनका जन्म 27 जून 1987 को हुआ। उनके पिता मुनव्वर हसन लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा सदस्य रह चुके थे। उनकी मां तबस्सुम हसन भी राजनीति में सक्रिय रही हैं। न पहली बार 2014 के उपचुनाव में कैराना से विधायक बने। 2017 में वह दूसरी बार और 2022 में तीसरी बार विधानसभा पहुंचे। उत्तर प्रदेश के विधायकों के राजनीतिक सफर वाले डेटाबेस में भी नाहिद हसन को कैराना से समाजवादी पार्टी का विधायक दर्ज किया गया है। ारिक राजनीतिक आधार का प्रभाव कैराना के जातीय समीकरण पर भी पड़ता है। मुस्लिम वोटों के साथ गुर्जर पहचान और पुराने स्थानीय राजनीतिक नेटवर्क उनकी चुनावी ताकत का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं।

2024 लोकसभा चुनाव ने भी दिए संकेत

कैराना विधानसभा जिस कैराना लोकसभा सीट का हिस्सा है, वहां 2024 के आम चुनाव में समाजवादी पार्टी की इकरा चौधरी ने जीत दर्ज की। उन्हें 5,28,013 वोट मिले, जबकि भाजपा के प्रदीप कुमार को 4,58,897 वोट मिले। जीत का अंतर 69,116 वोट रहा। लोकसभा और विधानसभा चुनाव का मतदान व्यवहार हमेशा समान नहीं होता, फिर भी 2024 के नतीजे यह संकेत देते हैं कि कैराना क्षेत्र में समाजवादी पार्टी का संगठन और हसन परिवार का राजनीतिक प्रभाव बना हुआ है।

2027 विधानसभा चुनाव तक भाजपा अपनी सामाजिक रणनीति में कश्यप, गुर्जर, जाट, सैनी, दलित और परंपरागत समर्थक समूहों के बीच कितना विस्तार करती है और सपा अपने वर्तमान सामाजिक आधार को कितना कायम रखती है, यह कैराना की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक कहानी हो सकती है।

कैराना में जीत का फॉर्मूला केवल मुस्लिम वोट नहीं

करीब 1.30 लाख का अनुमानित मुस्लिम मतदाता आधार किसी भी राजनीतिक दल के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, लेकिन 3.01 लाख मतदाताओं वाली सीट में केवल इस वोट पर निर्भर रहकर चुनावी परिणाम तय नहीं किया जा सकता।

कश्यप, गुर्जर और जाट मतदाताओं को ही जोड़ दें तो इनकी अनुमानित संख्या करीब 88 हजार बैठती है। इनके साथ सैनी, दलित-कोरी, ब्राह्मण, वैश्य और दूसरे सामाजिक समूह चुनावी संतुलन को बदल सकते हैं।

यही वजह है कि कैराना में चुनावी लड़ाई का असली सवाल यह नहीं होता कि सबसे बड़ा समुदाय कौन है, बल्कि यह होता है कि सबसे बड़े समुदाय के साथ दूसरा और तीसरा सामाजिक समूह किस राजनीतिक गठजोड़ में जुड़ रहा है।

2027 में किन समीकरणों पर रहेगी नजर

2027 विधानसभा चुनाव का कार्यक्रम अभी घोषित नहीं हुआ है। इसलिए उम्मीदवारों या गठबंधनों को लेकर अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। फिर भी पिछले चुनाव परिणाम और 2026 मतदाता सूची कुछ महत्वपूर्ण संकेत देते हैं।

कैराना में मुस्लिम वोट सबसे बड़ा आधार है, लेकिन गैर-मुस्लिम पिछड़े वर्गों का संयुक्त वोट उससे कम प्रभावशाली नहीं है। भाजपा के लिए कश्यप, हिंदू गुर्जर, सैनी, जाट और अन्य हिंदू सामाजिक समूहों में मजबूत समर्थन मुकाबले को कड़ा कर सकता है।

वहीं समाजवादी पार्टी के लिए चुनौती मुस्लिम वोटों की मजबूत हिस्सेदारी को बनाए रखते हुए जाट, गुर्जर, दलित और अन्य पिछड़े समूहों में पर्याप्त समर्थन हासिल करने की होगी।

अगर बसपा मजबूत प्रत्याशी उतारती है तो दलित और कुछ मुस्लिम या पिछड़े वोटों में विभाजन मुख्य मुकाबले को प्रभावित कर सकता है। इसी तरह किसी प्रभावशाली स्थानीय प्रत्याशी की मौजूदगी जातीय समीकरण को पार्टी लाइन से अलग दिशा दे सकती है।

कैराना विधानसभा जातीय समीकरण का सबसे बड़ा संदेश

कैराना विधानसभा जातीय समीकरण में मुस्लिम मतदाता सबसे बड़ा समूह हैं, लेकिन सीट का परिणाम बहुस्तरीय सामाजिक गठजोड़ से तय होता रहा है। 2026 में कुल वोटर 3.01 लाख के करीब हैं। इनमें अनुमानित 1.30 लाख मुस्लिम मतदाताओं के अलावा कश्यप, गुर्जर और जाट समुदाय मिलकर एक बड़ा चुनावी ब्लॉक बनाते हैं।

2012 में भाजपा की जीत और 2017 तथा 2022 में समाजवादी पार्टी की जीत बताती है कि कैराना किसी एक स्थायी राजनीतिक फॉर्मूले पर नहीं चलती। प्रत्याशी, स्थानीय नेटवर्क, गठबंधन, मतदान प्रतिशत और अलग-अलग सामाजिक समूहों का मेल चुनाव परिणाम का अंतिम स्वरूप तय करता है।

  • समाचार संपादन, ब्रेकिंग अलर्ट और फैक्ट-चेक पर फ़ोकस। ज़मीनी रिपोर्टों को डेटा के साथ जोड़ना पसंद। कॉफ़ी, डेडलाइन और सत्य , तीनों से समझौता नहीं।

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