Lagatar Desk
बिहार की राजधानी पटना के बांकीपुर सीट से जनसुराज पार्टी के अध्यक्ष प्रशांत किशोर की जीत पर हर तरफ चर्चा है. सभी अपने-अपने तर्क दे रहे हैं. अपनी-अपनी टिप्पणी दे रहे हैं. ऐसे में देश के दो वरिष्ठ पत्रकार Sanjaya Kumar Singh और Prashant Tandon की टिप्पणी को समझना दिलचस्प है.
पीके जीत गए क्योंकि भाजपा ने जीतने दिया
Sanjaya Kumar Singh
पहले तो उम्मीदवार ही टक्कर का नहीं था. जो अदल-बदल हुआ सो अलग. भाजपा को जीतना/लड़ना होता है तो सांसद को भी विधानसभा लड़वाती रही है. राज्यसभा के मनोनीत सदस्य को लड़ा चुकी है. हार गए तो फिर मनोनीत करवा दिया. अब बंगाल में मंत्री हैं. ऐसे में प्रशांत किशोर के टक्कर का उम्मीदवार नहीं देकर भाजपा ने पहले ही जीत का रास्ता साफ कर दिया था या हार मान ली थी.
सोनम वांगचुक को भाजपाई कहने वाले लोग प्रशांत किशोर की जीत पर खुश हैं तो यही है भाजपा की राजनीति. इस हार से यह 'साफ' हो गया है कि चुनाव ठीक हो रहे हैं. कोई अनिल मसीह नहीं है. चुनाव आयोग लेवल प्लेइंग फील्ड सुनिश्चित कर रहा है. सांप्रदायिक आधार पर वोट नहीं मांगे जाते हैं या मांगे गए हों तो किसी को एतराज नहीं रहा या भाजपा को इसका फायदा नहीं मिलता है.
फिर भी जीत तो जीत ही है. संभव है वह अपनी घटिया और फूहड़ राजनीति के कारण हारी हो. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वह कमजोर हो गई और उत्तर प्रदेश भी हार जाएगी या 2029 में भी लोकसभा में यही होगा. हारने से एसआईआर पर ध्यान नहीं जाएगा. लोग नहीं कहेंगे कि भाजपा ने हमारे वोटर हटवा दिए आदि. आगे की कहानी ईडी की कार्रवाई शुरू होने या नहीं शुरू होने से भी समझ में आएगी.
वैसे, जीत कर जब कोई भी दल बदल कर सकता है, दलों का विलय हो सकता है तो भाजपा के हारने का क्या मतलब? यही सही है कि भाजपा लड़ने और जीतने की हर कोशिश करती दिखी पर यह उसकी रणनीति का भाग हो सकता है और उम्मीदवारों के विवाद के बाद भाजपा का उम्मीदवार नहीं भी हो सकता था. लेकिन तब हारने का लाभ नहीं उठाया जा सकता था. अब कहा जा सकता है कि चुनाव में बेईमानी होती तो भाजपा हारती? प्रशांत किशोरों के लिए दिल्ली अभी दूर है.
जातिवादी हिंदुओं के लिए बड़ी जीत है
Prashant Tandon
जातिवादी हिंदुओं में एक खास बात होती है कि वो अपने बंदे को बड़ी दूर से पहचान लेते हैं. ऐसे समय जब सामाजिक न्याय का विमर्श बड़ा हो रहा है, जाति वार जनगणना से लेकर आरक्षण की सीमा बढ़ाने की बात हो रही है. वंचित समाज का मिडिल क्लास आ चुका है तब उन्हें प्रशांत किशोर की सबसे ज्यादा जरूरत है.
भले एक विधायक के तौर पर वो कुछ न कर पायें लेकिन जातिवादियों के लिये मनोवैज्ञानिक मरहम का काम तो करेंगे. सवर्ण मीडिया में आज खुशी की लहर होगी. उनके घर का लड़का विधायक बना है, मामूली बात है!
कल के इंडियन एक्सप्रेस के फ्रंट पेज से लेकर गोदी मीडिया के स्टूडियो में आज यही चर्चा होगी मानो प्रशांत किशोर 160 एमपी लेकर लोकसभा पहुंचे हों. कल तक बड़े बड़े एंकर इंटरव्यू ले डालेंगे. बहुत ऐतिहासिक घटना है, इसे कम करके आंकने की गलती न करें. प्रशांत किशोर देश के सबसे बड़े विधायक हैं.