खनिजों की खुदाई पर राज्य क्यों नहीं ले पाएंगे टैक्स, सुप्रीम कोर्ट के फैसले से कितना अलग है नया कानून?

Published on 14 अग॰ 2026

खनिजों की खुदाई पर राज्य क्यों नहीं ले पाएंगे टैक्स, सुप्रीम कोर्ट के फैसले से कितना अलग है नया कानून?

खान एवं खनिज संशोधन विधेयक दोनों सदनों से पास हो गया है. (Photo- RMIS)

खान एंव खनिज संशोधन विधेयक लोकसभा और राज्यसभा से पास हो गया है. राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद यह विधेयक कानून में तब्दील हो जाएगा. केंद्र सरकार ने खनिज उत्पादन पर राज्यों के टैक्स के अधिकार को खत्म करने के लिए यह कानून लाया है. 2024 में लंबी सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच ने राज्यों को टैक्स लेने का अधिकार दिया था. तब से राज्य खनिज उत्पादन पर टैक्स वसूल रहे थे.

वहीं अब इस कानून के आने से झारखंड और केरल जैसे खनिज बाहुल्य राज्यों ने केंद्र के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. इन राज्यों का कहना है कि उनके अधिकार को केंद्र ने संसद में बिल लाकर जब्त कर लिया है. इससे राज्य के लोगों को नुकसान का सामना करना पड़ेगा. झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने इसके लिए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को पत्र भी लिखा है.

वहीं केंद्रीय खान एवं खनन मामलों के मंत्री जी किशन रेड्डी का कहना है कि इस विधेयक का उद्देश्य प्रमुख खनिजों का उत्पादन बढ़ाना है. रेड्डी ने कहा कि खान क्षेत्र से राज्यों के राजस्व का हिस्सा 65 प्रतिशत से बढ़कर 85 प्रतिशत हो गया है. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नेतृत्व वाली सरकार द्वारा लाए गए सुधारों के कारण खनिजों से राज्यों के राजस्व में 23 प्रतिशत की वृद्धि हुई है.

विपक्ष के विरोध और केंद्र के दावे के बीच इस पूरे मामले को विस्तार से समझिए…

केंद्र ने जो नया बिल पास किया है, उसमें क्या है?

13 अगस्त को राज्यसभा से खनिज विधेयक पेश किया गया है. लोकसभा से यह विधेयक पहले पेश हो चुका है. विधेयक की 5 मुख्य बातें हैं-

1. संशोधित विधेयक में नया Section 9D जोड़न का प्रावधान है. इसके तहत राज्य खनिज अधिकारों या खनिज-युक्त भूमि पर किसी भी नाम से टैक्स, सेस या अन्य लेवी तभी लगा सकेंगी, जब वह केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित शर्तों और प्रतिबंधों के अनुरूप हो. यानी केंद्र के फैसले पर यह निर्भर करेगा. राज्य खुद टैक्स नहीं लगा सकेगा.

2. विधेयक में यह कहा गया है किसे पहले यदि ऐसा कोई टैक्स, सेस या लेवी राज्य सरकार ने वसूल या प्राप्त नहीं किया है, तो उसे प्रारंभ से ही अमान्य (Void) माना जाएगा. यानी राज्यों को पुराना बकाया कंपनी नहीं दे सकती है. हालांकि, जो राशि पहले ही राज्य सरकार को जमा हो चुकी है या वसूल की जा चुकी है, उसकी वापसी की जिम्मेदारी नहीं होगी.

3. इस नए बिल में Mines and Minerals (Development and Regulation) Act, 1957 की धारा 13 में भी संशोधन का प्रस्ताव है. इसके जरिए केंद्र सरकार को यह तय करने के लिए नियम बनाने की शक्ति मिलेगी कि राज्य सरकारें खनिज अधिकारों या खनिज-युक्त भूमि पर टैक्स, सेस अथवा अन्य लेवी किन शर्तों और सीमाओं के अधीन लगा सकती हैं.

4. सरकार के अनुसार, खनिज संसाधन सीमित हैं और देश के कुछ ही राज्यों में इनकी उपलब्धता अधिक है. ऐसे में राज्यों के बीच टैक्स और लेवी की दरों में भारी अंतर खनन क्षेत्र में असमान वित्तीय बोझ पैदा करता है. सरकार का तर्क है कि खनन शुरू होने के बाद नए करों की अप्रत्याशित घोषणा, उत्पादन या डिस्पैच पर अतिरिक्त लेवी और पिछली तारीख से टैक्स लगाने जैसी व्यवस्थाएं उद्योग में कानूनी एवं वित्तीय अनिश्चितता बढ़ाती हैं.

5. विधेयक को लेकर सरकार का तर्क है कि खनिजों पर अतिरिक्त टैक्स और लेवी से उत्पादन तथा परिवहन लागत बढ़ सकती है. इसका असर आगे चलकर खनिज आधारित वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों पर पड़ सकता है और अंततः इसका बोझ आम उपभोक्ता पर भी आ सकता है.

विधेयक ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया है?

आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने बहस के दौरान कहा कि केंद्र ने राज्यों के आर्थिक अधिकार ले लिए हैं. अब पूरे देश के खनिज संसाधनों पर केंद्र का कब्जा होगा. केंद्र अपने हिसाब से फैसला करेगा. यह सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने जैसा है, जिसमें 9 जजों की बेंच ने कहा था कि खनिज संसाधन पर राज्यों का भी अधिकार है.

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा है. हेमंत सोरेन के मुताबिक यह संशोधन विधेयक केवल राजस्व का विषय नहीं, बल्कि राज्यों की विधायी एवं वित्तीय स्वायत्तता, संघीय ढांचे, आदिवासी समुदायों और खनन प्रभावित क्षेत्रों के अधिकारों से जुड़ा प्रश्न है.

हेमंत सोरेन का कहना है कि झारखंड के राजस्व का 84 प्रतिशत पैसा खनन से प्राप्त होता है. अगर इसे छीन लिया गया तो हम कोई भी योजनाएं नहीं चला पाएंगे.

सुप्रीम कोर्ट में 9 जजों की बेंच ने क्या कहा था?

2024 में तत्कालीन चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता में 9 जजों की संवैधानिक बेंच ने इस मुद्दे पर सुनवाई की कि राज्य सरकार खनिज पर टैक्स ले सकती है या नहीं. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि राज्य को टैक्स लेने का अधिकार है. कोर्ट ने इसका आधार भी बताया. कोर्ट ने टैक्स और रॉयल्टी का अंतर भी स्पष्ट किया.

कोर्ट ने कहा कि जो रॉयल्टी है, वो एक तरह की डील है. कंपनी रॉयल्टी का पैसा केंद्र को देती है. रॉयल्टी को टैक्स नहीं माना जा सकता है. यानी कंपनी यह नहीं कह सकती है कि एक ही मामले के लिए हम दो टैक्स दे रहे हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में आगे कहा कि खनिज राज्य का मामला है और राज्य इसके लिए पैसा ले सकता है. क्योंकि, खनिज के उत्पादन में जो नुकसान होता है, उसे राज्य को ही झेलना होता है. अतएव टैक्स के पैसे से राज्य उसे ठीक कर सकता है.

फैसले के मुताबिक संविधान की सातवीं अनुसूची राज्य सूची (List II) की प्रविष्टि 50 राज्यों को खनिज अधिकारों पर कर लगाने का अधिकार देती है.अपने फैसले में कोर्ट ने यह साफ किया कि संसद कानून के जरिए टैक्स पर लिमिटेशन लगा सकती है, लेकिन रॉयल्टी को आधार मानकर इसे खत्म नहीं कर सकती है.

हालांकि, कोर्ट का यह फैसला बहुमत का था. जस्टिस बीवी नागरत्ना ने इसका विरोध किया. जस्टिस नागरत्ना का कहना था कि इससे कंपनियों पर दबाव बढ़ेगा. नागरत्ना का कहना था कि जब आप रॉयल्टी ले रहे हैं, तब टैक्स का कोई मतलब नहीं है.

फैसले के बाद राज्यों ने टैक्स लेना शुरू किया

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राज्यों ने टैक्स वसूलना शुरू कर दिया. अकेले झारखंड ने 2025-26 में 2,490 करोड़ रुपए वसूले. झारखंड सरकार का अनुमान था कि आने वाले समय में खनिज पर टैक्स के जरिए राज्य को 11 हजार करोड़ रुपए मिल सकेगा.

तमिलनाडु, कर्नाटक, छत्तीसगढ़, ओडिशा जैसे राज्यों को भी बड़े पैमाने पर पैसे मिलने की उम्मीद थी. इतना ही नहीं, इन राज्यों का कंपनियों पर 1.5 लाख करोड़ रुपए का पुराना बकाया है. ये पैसे 12 साल तक किस्तों में मिलेंगे. यानी सुप्रीम कोर्ट के फैसले से राज्यों को खनिज टैक्स के रूप में बड़े पैमाने पर पैसे मिलने की उम्मीद थी.

अविनीश कुमार मिश्रा

अविनीश कुमार मिश्रा

भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद वर्ष 2019 से पत्रकारिता के पेशे में सक्रिय. राजनीतिक, सुप्रीम कोर्ट और विदेश मामलों की खबरों को कहानी के रूप में पेश करने में विशेषज्ञता. खबरें कहीं भी हों, उन्हें खोज निकालने में माहिर. टीवी9 भारतवर्ष से पहले एबीपी न्यूज़, दैनिक भास्कर और प्रभात खबर में काम किया. इस दौरान देश के दो आम चुनावों के साथ-साथ बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और झारखंड के विधानसभा चुनाव कवर किए. बिहार के मधुबनी जिले का रहने वाला हूं.

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