मरुस्थलीकरण का बढ़ता संकट: वैश्विक कार्रवाई की दरकार
मरुस्थलीकरण यानि उपजाऊ भूमि का बंजर और रेगिस्तान जैसी भूमि में बदल जाना. बढ़ते तापमान, सूखे और वनों की कटाई के कारण यह समस्या दुनिया भर में तेज़ी से बढ़ रही है.
गहराता ख़तरा
मरुस्थलीकरण से निपटने के लिए इस सप्ताह मंगोलिया में आयोजित संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन COP17 से पहले यूएन की वरिष्ठ अधिकारी यासमीन फ़ौआद ने कहा, “भूमि हमारा सबसे अहम बुनियादी संसाधन है - खाद्य सुरक्षा, पानी, आजीविका और स्थिरता इसी पर निर्भर हैं.”
गोबी रेगिस्तान और अर्ध-शुष्क घास के मैदानों से घिरे मंगोलिया में भूमि क्षरण लोगों की आजीविका के लिए बड़ा ख़तरा बनता जा रहा है.
मंगोलिया की लगभग एक-तिहाई आबादी पशुपालन पर निर्भर है, जबकि रूस और चीन के बीच स्थित इस देश की लगभग 77 प्रतिशत भूमि क्षरण का शिकार हो चुकी है.
2023 और 2024 में भीषण सूखे के बाद आई बेहद कठोर ‘ज़ुद’ सर्दियों के कारण मंगोलिया में 70 लाख से अधिक पशुओं की मौत हो गई.
सम्मेलन की शुरुआत पर मंगोलिया की विदेश मंत्री बत्सेत्सेग बातमुंख ने कहा, “मंगोलिया के लिए हमारी भूमि, हमारे लोगों, उनकी आजीविका और हमारे भविष्य से गहराई से जुड़ी है. भूमि की सेहत का लोगों के जीवन पर सीधा असर पड़ता है.”
3.2 अरब लोगों की आजीविका पर ख़तरा
यह संकट केवल मंगोलिया तक सीमित नहीं है. दुनिया की लगभग 40 प्रतिशत भूमि क्षरण और सूखे से प्रभावित है, जिससे 3.2 अरब लोगों की आजीविका ख़तरे में है.
चरागाहों की स्थिति विशेष रूप से चिन्ताजनक है. ये ऐसे विशाल प्राकृतिक क्षेत्र हैं, जहाँ आम तौर पर फ़सलें नहीं उगाई जातीं, लेकिन दुनिया के लगभग 70 प्रतिशत पशुधन के लिए चारा यहीं से मिलता है.
हालाँकि चरागाहों पर अक्सर चर्चा नहीं होती, लेकिन क़रीब दो अरब लोग भोजन व आजीविका के लिए इन पर निर्भर हैं, और भूमि क्षरण व सूखे का इन पर गम्भीर असर पड़ रहा है.
यासमीन फ़ौआद ने कहा, “ये समस्याएँ अब भविष्य की पर्यावरणीय चिन्ताएँ नहीं हैं.”
उन्होंने कहा, “हमारे भोजन, पानी, अर्थव्यवस्थाओं और समुदायों के सुरक्षित भविष्य पर इनका असर अभी से दिखाई दे रहा है.”
इस संकट की आर्थिक क़ीमत भी बहुत बड़ी है. भूमि क्षरण और सूखे से वैश्विक अर्थव्यवस्था को हर साल क़रीब 900 अरब डॉलर का नुक़सान हो रहा है. वर्ष 2000 के बाद सूखे की घटनाएँ लगभग एक-तिहाई बढ़ी हैं और उनसे हर साल लगभग 300 अरब डॉलर का नुक़सान होने का अनुमान है.
ठोस कार्रवाई की ज़रूरत
मंगोलिया की राजधानी उलानबटार में सोमवार को दो सप्ताह तक चलने वाले COP17 सम्मेलन की शुरुआत हुई.
रियाद में आयोजित COP16 में हुई प्रगति को आगे बढ़ाते हुए, सम्मेलन में भाग लेने वाले देश सूखे से निपटने की क्षमता बढ़ाने, टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देने और मिट्टी की रक्षा के उपायों पर चर्चा करेंगे.
इनमें पूर्व चेतावनी प्रणालियाँ, जोखिम और संवेदनशीलता का आकलन तथा अन्तरराष्ट्रीय सहयोग जैसे उपाय शामिल हैं.
इस अवसर पर मंगोलिया के प्रधानमंत्री न्याम-ओसोरिन उचरल ने कहा, “COP17 से हम सबसे बड़ा बदलाव यह देखना चाहते हैं कि बातचीत अब कार्रवाई में बदले, लक्ष्यों पर अमल हो और प्रतिबद्धताओं के ठोस, मापने योग्य नतीजे सामने आएँ.”
वित्तीय सहायता की कमी
सम्मेलन की प्रमुख प्राथमिकताओं में से एक, भूमि पुनर्बहाली और सूखे से निपटने की क्षमता बढ़ाने के लिए निजी क्षेत्र से अधिक निवेश जुटाना है.
फ़िलहाल इस क्षेत्र में 278 अरब डॉलर की सहायता धनराशि की कमी है. भूमि पुनर्बहाली और सहनसक्षमता बढ़ाने के लिए हर साल लगभग 355 अरब डॉलर की ज़रूरत है, जबकि मौजूदा निवेश केवल 77 अरब डॉलर है.
केवल सार्वजनिक धन से इस कमी को पूरा करना सम्भव नहीं है. भूमि और जल संसाधनों पर अत्यधिक निर्भर होने के बावजूद, निजी क्षेत्र वैश्विक स्तर पर भूमि पुनर्बहाली एवं सूखे से निपटने के लिए उपलब्ध कुल वित्तीय सहायता में केवल छह प्रतिशत योगदान देता है.
COP17 के आयोजकों को उम्मीद है कि Business4Land Forum जैसी पहलों के ज़रिए सरकारों, विकास बैंकों, व्यवसायों और निवेशकों के बीच सहयोग बढ़ाया जा सकेगा.
मंगोलिया के पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री और COP17 के अध्यक्ष सन्दाग-ओचिर त्सेंद ने कहा, “मुझे विश्वास है कि COP17 अन्तरराष्ट्रीय सहयोग मज़बूत करने और वैश्विक कार्रवाई में तेज़ी लाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण क़दम साबित होगा.”