कभी दोस्ती, कभी तनातनी... पाकिस्तान और ईरान के रिश्ते इतने उलझे क्यों रहे हैं?

Published on 24 अग॰ 2026

कभी दोस्ती, कभी तनातनी... पाकिस्तान और ईरान के रिश्ते इतने उलझे क्यों रहे हैं?

दोनों के बीच लगभग 900 किलोमीटर लंबी सीमा लगती है.

पाकिस्तान के फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ईरान के दौरे पर हैं. उनका इरादा अफसरों, जिम्मेदार लोगों से मुलाकात कर दोनों देशों के बीच शांति कायम करना है. कहा जा रहा है कि वे अमेरिका और ईरान के बीच रुकी हुई बातचीत फिर से शुरू करवाने का इरादा भी रखते हैं. उनके दौरे का क्या परिणाम निकलेगा, यह समय बताएगा. अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी. इन दोनों पड़ोसी देशों के रिश्तों की कहानी पर नजर डालेंगे तो पाएंगे कि कभी दोस्ती दिखाई देती है तो कभी तनातनी.

पाकिस्तान और ईरान पड़ोसी देश हैं. दोनों के बीच लगभग 900 किलोमीटर लंबी सीमा लगती है. दोनों इस्लामी देश हैं और इनका सांस्कृतिक इतिहास काफी पुराना है. इसके बावजूद इन दोनों देशों के रिश्ते कभी बहुत मधुर रहे, तो कभी गंभीर तनाव के दौर से गुजरे हैं.

पाकिस्तान और ईरान कैसे बने दोस्त?

साल 1947 में जब पाकिस्तान बना, तब ईरान उसे एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता देने वाला दुनिया का पहला मुल्क था. उस दौर में ईरान में शाह का शासन था. शीत युद्ध के समय दोनों देश अमेरिका के करीबी खेमे में शामिल थे. दोनों ने मिलकर बगदाद पैक्ट पर हस्ताक्षर किए थे. 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान ईरान ने पाकिस्तान को कूटनीतिक, आर्थिक और सैन्य स्तर पर काफी मदद दी थी. उस समय दोनों देशों के बीच बेहद मजबूत और दोस्ताना संबंध थे.

Pak Iran Relations

पाकिस्तान-ईरान सम्बंध.

इस्लामी क्रांति के बाद रिश्तों में पहला बड़ा बदलाव

साल 1979 में ईरान में इस्लामी क्रांति हुई. शाह का तख्तापलट हुआ और अयातुल्लाह खुमैनी के नेतृत्व में शिया इस्लामी गणराज्य की स्थापना हुई. उसी दौर में पाकिस्तान में जनरल जिया-उल-हक ने सत्ता संभाली और देश में सुन्नी इस्लामीकरण की नीतियां लागू कीं. इसके बाद दोनों देशों के वैचारिक दृष्टिकोण में अंतर आने लगा. पाकिस्तान सऊदी अरब और अमेरिका के करीब होता गया, जबकि ईरान ने अमेरिका और खाड़ी के राजतंत्रों के खिलाफ सख्त रुख अपनाया. इस भू-राजनीतिक बदलाव ने दोनों देशों के बीच अविश्वास की पहली दीवार खड़ी की.

Ayatollah Khomeini

अयातुल्लाह खोमैनी.

अफगान संकट और परोक्ष जंग ने भी रिश्तों पर डाला असर

1980 के दशक में सोवियत संघ के अफगानिस्तान में आने के बाद हालात और जटिल हो गए. पाकिस्तान ने सोवियत सेना के खिलाफ अफगान मुजाहिदीन का खुला समर्थन किया. 1990 के दशक में जब अफगानिस्तान में तालिबान का उभार हुआ, तब पाकिस्तान ने तालिबान सरकार को मान्यता दी. दूसरी तरफ ईरान ने तालिबान के विरोधी नॉर्दर्न अलायंस को समर्थन दिया. इस दौर में अफगानिस्तान दोनों देशों के बीच प्रभाव जमाने का अखाड़ा बन गया. इससे दोनों के द्विपक्षीय संबंधों में भारी खटास आई.

बलूचिस्तान सीमा और सुरक्षा की चुनौतियां भी कम नहीं

पाकिस्तान-ईरान सीमा का इलाका बेहद संवेदनशील है. यह इलाका दोनों देशों के बलूचिस्तान क्षेत्र से जुड़ा हुआ है. ईरान का आरोप रहा है कि जैश अल-अदल जैसे सुन्नी उग्रवादी संगठन पाकिस्तानी सीमा के अंदर से ईरान पर हमले करते हैं. वहीं पाकिस्तान का दावा रहा है कि बलूच अलगाववादी समूह ईरान की जमीन का इस्तेमाल करके पाकिस्तान के सुरक्षाबलों को निशाना बनाते हैं. सीमा पर होने वाले आतंकी हमलों, अपहरण और तस्करी ने दोनों देशों के बीच सुरक्षा अविश्वास को लगातार बढ़ाया है.

Asim Munir

आसिम मुनीर

जनवरी 2024 के हवाई हमले और तनाव चरम पर पहुंचा

जनवरी 2024 में दोनों देशों के रिश्ते अपने सबसे नाजुक दौर में पहुंच गए. ईरान ने पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में जैश अल-अदल के ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए. इसके जवाब में पाकिस्तान ने भी ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में सक्रिय बलूच उग्रवादियों के ठिकानों पर हवाई हमले कर दिए. कुछ दिनों तक युद्ध जैसा माहौल बन गया और दोनों ने अपने राजदूत वापस बुला लिए. हालांकि, दोनों देशों ने परिपक्वता दिखाई और बातचीत के जरिए कुछ ही हफ्तों में राजनयिक संबंधों को दोबारा बहाल कर लिया.

आर्थिक सहयोग और ऊर्जा पाइपलाइन का सपना भी देख रहे

राजनीतिक मतभेदों के बावजूद दोनों देश व्यापार और ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग के इच्छुक रहे हैं. ईरान-पाकिस्तान गैस पाइपलाइन परियोजना इसका बड़ा उदाहरण है. ईरान ने अपने हिस्से की पाइपलाइन का निर्माण काफी पहले पूरा कर लिया था. लेकिन पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय और अमेरिकी प्रतिबंधों के डर से अपने हिस्से का काम समय पर पूरा नहीं कर सका. इसके अलावा दोनों देशों के बीच सालाना सीमा व्यापार भी होता है. हालांकि, बैंकिंग प्रतिबंधों और डॉलर की कमी के कारण यह व्यापार अपनी पूरी क्षमता तक नहीं पहुंच पाया है.

Pakistan’s Chief of Army Staff, Field Marshal Asim Munir, has arrived in Tehran

Pakistan is making efforts to resume peace talks between the United States and Iran, which reached an impasse after a memorandum of understanding was signed in June through Islamabad’s mediation. pic.twitter.com/F0cLYuQol4

— Sputnik (@SputnikInt) August 24, 2026

भारत, चीन और सऊदी अरब का प्रभाव इनके रिश्तों पर

ईरान और पाकिस्तान के रिश्तों पर अन्य देशों की प्राथमिकताओं का भी असर पड़ता है. ईरान ने भारत के साथ मिलकर चाबहार बंदरगाह का विकास किया. पाकिस्तान ने चीन के सहयोग से ग्वादर बंदरगाह का निर्माण किया. ये दोनों बंदरगाह एक-दूसरे से ज्यादा दूर नहीं हैं और क्षेत्रीय व्यापार में एक-दूसरे के प्रतिस्पर्धी माने जाते हैं. इसके साथ ही पाकिस्तान के सऊदी अरब के साथ ऐतिहासिक और आर्थिक रिश्ते बहुत गहरे हैं, जिससे ईरान हमेशा सतर्क रहता है. हालांकि, चीन के प्रभाव के कारण अब दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संतुलन बनाने के नए प्रयास हो रहे हैं.

वर्तमान स्थिति और आगे की संभावनाएं

आज के समय में पाकिस्तान और ईरान के रिश्ते न तो पूरी तरह दुश्मनी के हैं और न ही बेहद करीबी दोस्ती के. दोनों देश एक व्यावहारिक और संतुलित नीति अपना रहे हैं. वे जानते हैं कि लंबा सीमा विवाद किसी के हित में नहीं है. दोनों पक्ष सीमा प्रबंधन को बेहतर करने, खुफिया जानकारी साझा करने और स्थानीय व्यापार को बढ़ावा देने पर जोर दे रहे हैं. पाकिस्तान और ईरान के रिश्ते इतिहास, धर्म, सुरक्षा चिंताओं और वैश्विक राजनीति के जटिल ताने-बाने से जुड़े हैं. सीमा पार आतंकवाद पर प्रभावी रोक और आर्थिक सहयोग ही इन दोनों पड़ोसियों के रिश्ते को स्थायी मजबूती दे सकता है.

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दिनेश पाठक

दिनेश पाठक

मूलतः पाठक. पेशे से लेखक. कबीर की धरती पर जन्म. मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की धरती अयोध्या में लालन-पालन, पढ़ाई-लिखाई. करियर की शुरुआत आदि गंगा के तट लखनऊ से. संगम तीरे प्रयागराज, मोहब्बत की निशानी ताजमहल के साये से लेकर देवभूमि उत्तराखंड, उद्योगनगरी के रूप में मशहूर रहे कानपुर और बाबा गोरखनाथ की धरती पर काम करते हुए विद्वतजन से कुछ न कुछ सीखा, करंट अफ़ेयर्स, यूथ, पैरेंटिंग, राजनीति, प्रशासन, गाँव, खेत-किसान पसंदीदा टॉपिक. स्कूल, कॉलेज युनिवर्सिटी में यूथ से गपशप करना एनर्जी का अतिरिक्त स्रोत. साल 1992 में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से शुरू हुई इस पाठक की लेखन यात्रा कलम, डेस्कटॉप, लैपटॉप के की-बोर्ड से होते हुए स्मार्ट फोन तक पहुंच गयी. ज्यों-ज्यों उम्र बढ़ रही है, सीखने, पढ़ने, लिखने की भूख भी बढ़ रही है. हिंदुस्तान अखबार में पांच केंद्रों पर एडिटर रहे. यूथ, पैरेंटिंग पर पाँच किताबें. एक किताब 'बस थोड़ा सा' पर दूरदर्शन ने धारावाहिक बनाया.

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