तनाव के बावजूद यूएस आर्मी का प्लेन रूस में लैंड:इस पर क्या है या कौन सवार अभी रहस्य, मुख्य मिलिट्री बेस से उड़ान भरी थी
मॉस्को19 मिनट पहले
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अमेरिका और रूस के बीच तनाव के बीच अमेरिकी वायुसेना का एक बड़ा मिलिट्री प्लेन मंगलवार को मॉस्को में उतरा। C-17A ग्लोबमास्टर III की इस लैंडिंग ने इसलिए ध्यान खींचा, क्योंकि रूस की राजधानी में किसी अमेरिकी सैन्य प्लेन का पहुंचना बेहद असामान्य है। अब सवाल उठ रहा है कि आखिर इस प्लेन को रूस क्यों भेजा गया?
फ्लाइट-ट्रैकिंग मॉनिटर के मुताबिक, प्लेन ने मॉस्को के समय के अनुसार सुबह करीब 8:50 बजे लातविया की राजधानी रीगा से उड़ान भरी और लगभग 74 मिनट बाद मॉस्को पहुंचा।
इस उड़ान की एक और खास बात यह रही कि प्लेन रूस के हवाई क्षेत्र से होकर मॉस्को पहुंचा। किसी अमेरिकी सैन्य प्लेन को इस रास्ते से उड़ान भरने के लिए रूसी अधिकारियों की मंजूरी जरूरी होती है।
प्लेन के मिशन पर अब भी सस्पेंस
रिकॉर्ड के मुताबिक, यही प्लेन 23 अगस्त को वॉशिंगटन डीसी के पास जॉइंट बेस एंड्रयूज से रीगा पहुंचा था। यह वही अमेरिकी सैन्य अड्डा है जहां राष्ट्रपति के विमानों का बेड़ा रहता है, जिसमें एयर फोर्स वन भी शामिल है।
अमेरिका और रूस दोनों ने अब तक यह नहीं बताया कि प्लेन को मॉस्को क्यों भेजा गया था। प्लेन में कौन था और क्या सामान था, इसकी जानकारी भी सामने नहीं आई है।
मॉस्को में अमेरिकी सैन्य प्लेन की असामान्य लैंडिंग के बाद प्लेन पर नजर रखने वाले लोगों और सोशल मीडिया यूजर्स के बीच कई कयास लगाए जाने लगे। कुछ लोगों ने इसे कैदियों की अदला-बदली, यूक्रेन युद्ध को लेकर किसी गुप्त बातचीत या अमेरिकी दूतावास से जुड़े काम से जोड़कर देखा।
हालांकि, इनमें से किसी भी दावे की पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर अमेरिकी C-17 को मॉस्को भेजने के पीछे वजह क्या थी?
प्लेन में क्या था, अभी पता नहीं
मॉस्को जाने वाला यह प्लेन RCH4555 नाम से उड़ रहा था। प्लेन में कौन था और उसके अंदर क्या सामान था, इसकी जानकारी सामने नहीं आई है।
यही वजह है कि रूस और अमेरिका के बीच तनाव के इस दौर में इस उड़ान ने इतना ध्यान खींचा है।
फिलहाल कैदियों की अदला-बदली, रूस-अमेरिका के बीच किसी खास बातचीत या अमेरिकी दूतावास से जुड़े काम जैसी बातें सिर्फ अंदाजे हैं। इनमें से किसी की भी पुष्टि नहीं हुई है।
जब तक अमेरिका या रूस की तरफ से कोई जानकारी नहीं आती, तब तक यह साफ नहीं होगा कि अमेरिकी C-17 प्लेन को अचानक मॉस्को भेजने की असली वजह क्या थी।
C-17 ग्लोबमास्टर- टैंक से सैनिकों तक ले जाने में सक्षम
C-17A ग्लोबमास्टर III अमेरिकी वायुसेना का बहुत बड़ा सामान ढोने वाला सैन्य प्लेन है। इसका इस्तेमाल सैनिकों, सैन्य गाड़ियों और भारी सामान को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए किया जाता है।
इस प्लेन को बोइंग ने बनाया है। इसकी उड़ने की सामान्य रफ्तार करीब 834 किमी प्रति घंटा है। इतना बड़ा प्लेन होने के बावजूद C-17 करीब 3,500 फीट लंबी रनवे से भी उड़ान भर सकता है और उतर सकता है। इसकी एक खासियत यह भी है कि यह अपनी ताकत से पीछे की ओर भी चल सकता है।

अमेरिकी वायुसेना इसका इस्तेमाल कहां करती है?
C-17 का काम सिर्फ सैनिकों और हथियारों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाना नहीं है। अमेरिकी वायुसेना इसका इस्तेमाल सैनिकों और सामान को पहुंचाने, हवा से सामान गिराने, घायल लोगों को बाहर निकालने और जरूरत के समय मदद पहुंचाने के लिए भी करती है।
यह कोई लड़ाकू प्लेन या बम गिराने वाला प्लेन नहीं है। इसका मुख्य काम भारी सामान और सैन्य उपकरणों को जल्दी एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाना है।
भारत के पास 11 C-17 ग्लोबमास्टर
भारत ने 2011 में अमेरिका से 10 C-17 ग्लोबमास्टर III खरीदने का करीब 4.1 अरब डॉलर का सौदा किया था। पहला विमान जून 2013 में भारत पहुंचा और बाकी 10 विमानों की डिलीवरी 2014 तक पूरी हो गई।
भारत का C-17 सिर्फ भारी सामान ढोने वाला विमान नहीं है। युद्ध के मैदान से लेकर लोगों को बचाने तक, भारतीय वायुसेना ने इसका कई मुश्किल अभियानों में इस्तेमाल किया है।
इसके बाद भारत को 2019 में 11वां C-17 मिला। दिलचस्प बात यह है कि यह विमान पहले से बना हुआ था और बोइंग के पास बिना किसी खरीदार के रखा था। भारत ने इसे अपनी जरूरत के मुताबिक तैयार करवाकर हासिल किया।
भारत के सभी 11 C-17 ग्लोबमास्टर भारतीय वायुसेना की 81 स्क्वाड्रन ‘स्काई लॉर्ड्स’ का हिस्सा हैं। इस यूनिट का बेस हिंडन एयरबेस में है।
यमन से लेकर लद्धाख तक इस्तेमाल
यमन, 2015: युद्ध के बीच C-17 ने 2,096 लोगों को भारत पहुंचाने में मदद की।
सूडान, 2023: गृहयुद्ध के बीच करीब 24 घंटे चले रेस्क्यू मिशन में इसका इस्तेमाल हुआ। एक मिशन में 192 लोगों को निकाला गया।
चीन सीमा के पास: 2018 में C-17 ने अरुणाचल प्रदेश की टूटिंग एयरस्ट्रिप पर लैंड किया। यह जगह चीन की सीमा से सिर्फ करीब 30 किमी दूर है। विमान वहां करीब 18 टन सामान लेकर पहुंचा था।
लद्दाख में भी तैनाती: ऊंचाई वाले इलाकों में सैनिकों और भारी सैन्य सामान को तेजी से पहुंचाने में C-17 अहम भूमिका निभाता है।
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