ग्वालियर, 3 सितम्बर 2026: चंबल क्षेत्र, जिसकी पहचान कभी डकैतों और बीहड़ों से होती थी, आज पूरी तरह बदल चुका है। राज्य सरकार के रिकॉर्ड के अनुसार, वर्तमान में मध्य प्रदेश में कोई भी सूचीबद्ध डकैत गिरोह सक्रिय नहीं है। इसके बावजूद, करीब 45 साल पुराना 'मध्यप्रदेश डकैती और व्यपहरण प्रभावित क्षेत्र अधिनियम, 1981' आज भी लागू है। इस कानून की प्रासंगिकता और संवैधानिक वैधता को अब ग्वालियर हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) के जरिए चुनौती दी गई है।
यह याचिका लहार के पूर्व विधायक, पूर्व नेता प्रतिपक्ष और वरिष्ठ कांग्रेस नेता डॉ. गोविंद सिंह द्वारा दायर की गई है। याचिका में मुख्य रूप से यह सवाल उठाया गया है कि जब प्रदेश सरकार खुद विधानसभा में यह स्वीकार कर चुकी है कि राज्य में कोई सूचीबद्ध डकैत गिरोह सक्रिय नहीं है, तो डकैत प्रभावित क्षेत्रों के लिए बना यह विशेष कानून अब भी क्यों लागू रखा गया है?
समानता और स्वतंत्रता के अधिकार का हनन: याचिकाकर्ता की दलीलें
डॉ. गोविंद सिंह का कहना है कि वर्ष 1981 में जब यह कानून बनाया गया था, तब की परिस्थितियां और थीं, लेकिन अब चंबल समेत जिन क्षेत्रों को कभी डकैत प्रभावित माना जाता था, वहां पहले जैसी दस्यु गतिविधियां नहीं बची हैं। याचिका में विशेष रूप से कानून की धारा 11 और 13 के इस्तेमाल पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि सामान्य आपराधिक मामलों में भी इन कठोर धाराओं का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिससे आम नागरिकों को अत्यधिक कड़े कानूनी प्रावधानों का सामना करना पड़ता है।
याचिकाकर्ता के अनुसार, यह स्थिति संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) को सीधे तौर पर प्रभावित करती है। इसलिए, इस कानून के मौजूदा औचित्य की संवैधानिक जांच की जानी बेहद जरूरी है।
सरकार का तर्क: सीमावर्ती क्षेत्रों में खतरा अब भी बरकरार
दूसरी ओर, राज्य सरकार ने इस कानून को बनाए रखने के पीछे अपने तर्क दिए हैं। विधानसभा में सरकार का पक्ष था कि भले ही प्रदेश में सूचीबद्ध डकैत गिरोह सक्रिय नहीं हैं, लेकिन सीमावर्ती क्षेत्रों में दूसरे राज्यों से आने वाले या असूचीबद्ध दस्यु गिरोहों की संभावित गतिविधियों को देखते हुए इस कानून को बनाए रखना आवश्यक है। चंबल और अन्य सीमावर्ती क्षेत्रों की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए सरकार इस कानून को पूरी तरह खत्म करना उचित नहीं मानती है।
क्या है 1981 का डकैती कानून और इसके कड़े प्रावधान?
भिंड बार एसोसिएशन के पूर्व सचिव एवं एडवोकेट हिमांशु शर्मा के अनुसार, यह विशेष कानून करीब 45 साल पहले ग्वालियर-चंबल संभाग में डकैती की गंभीर समस्या से निपटने के लिए राष्ट्रपति के अनुमोदन के बाद लागू किया गया था। इसके तहत 6 अक्टूबर 1981 को विशेष न्यायालय का गठन किया गया था।
यह कानून डकैती प्रभावित क्षेत्रों में डकैती, अपहरण और लूट के मामलों के साथ-साथ डकैतों को संरक्षण देने या उनकी मदद करने वालों पर भी लागू होता है। इसमें दोषी पाए जाने पर न्यूनतम 3 साल से लेकर आजीवन कारावास तक की कड़ी सजा का प्रावधान है।
इस अधिनियम के तहत दर्ज मामलों में अग्रिम जमानत का कोई प्रावधान नहीं है और जमानत के लिए आरोपियों को सीधे हाईकोर्ट जाना पड़ता है।
अब इस जनहित याचिका पर होने वाली सुनवाई से ही तय होगा कि बदल चुके हालातों में 1981 के इस विशेष कानून का क्या भविष्य होगा और क्या इसे आगे भी आम नागरिकों पर लागू रखा जा सकता है या नहीं।
