हथियार छोड़ने वालों के लिए पुनर्वास का रास्ता, केस वापसी में कानून की कसौटी

Published on 6 सित॰ 2026

हथियार छोड़ने वालों के लिए पुनर्वास का रास्ता, केस वापसी में कानून की कसौटी

यह लेख नक्सली समूहों से आत्मसमर्पण करने वाले व्यक्तियों के लिए छत्तीसगढ़ की 2025 की पुनर्वास नीति की व्याख्या करता है, जिसमें शुरुआती जिला समीक्षा, आत्मसमर्पण के बाद आचरण जैसे मुख्य मानदंड, पुलिस और कैबिनेट उप-समिति की भूमिका, और BNSS 2023 के तहत अदालत की आवश्यक सहमति का विवरण दिया गया है। यह स्पष्ट करता है कि केवल आत्मसमर्पण से आपराधिक कार्यवाही समाप्त नहीं होती है।

By Oneindia Staff

Time Published: Sunday, September 6, 2026, 16:01 [IST]

छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद छोड़कर मुख्यधारा में लौटने वाले लोगों के पुनर्वास के साथ उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों की समीक्षा के लिए भी व्यवस्था की गई है। छत्तीसगढ़ नक्सलवादी आत्मसमर्पण/पीड़ित राहत एवं पुनर्वास नीति-2025 में अच्छे आचरण, नक्सल गतिविधियों से पूरी तरह दूरी और समाज में वास्तविक पुनर्वास जैसे पहलुओं को ध्यान में रखते हुए मामलों की समीक्षा का प्रावधान है।

Chhattisgarh Naxal Surrender Rehabilitation Policy

हालांकि, किसी व्यक्ति के आत्मसमर्पण करने मात्र से उसके खिलाफ दर्ज आपराधिक मामला स्वतः समाप्त नहीं हो जाता। राज्य सरकार की पुनर्वास नीति किसी आरोपी को स्वतः बरी करने या मुकदमा खत्म करने का अधिकार नहीं देती। आपराधिक अभियोजन से वापसी की प्रक्रिया संबंधित कानून के तहत ही पूरी की जा सकती है और अंतिम निर्णय न्यायालय की कानूनी प्रक्रिया के अधीन रहता है।

जिला समिति करेगी मामलों की प्रारंभिक समीक्षा

मामलों की समीक्षा के लिए सबसे पहले जिला स्तर पर गठित समिति संबंधित व्यक्ति के खिलाफ दर्ज मामलों की जानकारी, अपराध की प्रकृति और गंभीरता तथा आत्मसमर्पण के बाद उसके आचरण जैसे पहलुओं की जांच करेगी।

इसके बाद समिति की अनुशंसा को पुलिस मुख्यालय और गृह विभाग के स्तर पर परीक्षण के बाद मंत्रिमंडलीय उप-समिति के समक्ष रखा जा सकता है। दिसंबर 2025 में राज्य मंत्रिमंडल ने इस प्रक्रिया के लिए जिला समिति और मंत्रिमंडलीय उप-समिति की व्यवस्था को मंजूरी दी थी।

न्यायालय की सहमति जरूरी

कानूनी तौर पर अभियोजन वापस लेने की प्रक्रिया भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 360 के तहत आती है। यह प्रावधान पहले CrPC की धारा 321 के तहत था।

इस प्रक्रिया में लोक अभियोजक द्वारा अभियोजन से वापसी के लिए संबंधित न्यायालय की सहमति आवश्यक होती है। न्यायालय यह देखता है कि अभियोजन वापस लेने का प्रस्ताव कानून, न्याय और सार्वजनिक हित के अनुरूप है या नहीं। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाता है कि इस प्रक्रिया का इस्तेमाल न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए न हो। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अप्रैल 2026 में दिए एक आदेश में भी अभियोजन वापसी से जुड़े इसी कानूनी सिद्धांत को दोहराया है।

केंद्रीय कानून वाले मामलों में अलग प्रक्रिया

यदि किसी मामले में केंद्रीय कानून लागू है या उसमें केंद्र सरकार की अनुमति आवश्यक है, तो निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अनुसार भारत सरकार की सहमति भी ली जाएगी। इस तरह छत्तीसगढ़ की पुनर्वास नीति आत्मसमर्पण करने वालों को मुख्यधारा में लौटने और पुनर्वास का अवसर देती है, लेकिन आपराधिक मामलों में राहत का रास्ता निर्धारित कानूनी प्रक्रिया और न्यायालय की भूमिका से होकर ही गुजरता है।

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