भोपाल, 18 सितंबर 2026: पश्चिम मध्य रेलवे के भोपाल मंडल में सिग्नलिंग और टेलीकम्युनिकेशन (एसएंडटी) व्यवस्था के फेल होने से रेल यातायात प्रभावित हुआ। हजारों यात्री लेट हुए और अपनी यात्रा के लिए रेलवे का चयन करने के बदले में उनका जुर्माना भी लग गया। मालवा एक्सप्रेस तो 3 घंटे लेट हो गई थी लेकिन यात्रियों को फ्री में पीने का पानी तक नहीं दिया। वह भी उनको खुद खरीद कर पीना पड़ा।
घटना 17-18 सितंबर 2026 की है। मालवा एक्सप्रेस डॉ. अंबेडकर नगर (इंदौर क्षेत्र) से श्री माता वैष्णो देवी कटरा जा रही थी। झांसी से पानीपत तक सफर कर रहे यात्री कौशलेंद्र तिवारी ने सोशल मीडिया पर शिकायत की कि ट्रेन करीब तीन घंटे 40 मिनट लेट चल रही थी और बीच-बीच में बेतरतीब ठहराव भी हो रहे थे। पानीपत के पास समालखा तक देरी करीब 3 घंटे 39 मिनट (लगभग 4 घंटे) दर्ज हुई। निर्धारित समय सुबह 5:40 बजे के मुकाबले ट्रेन करीब 9:20 बजे पानीपत पहुंची।
खुद मंडल ने माना, खराबी भोपाल में हुई
भोपाल मंडल के आधिकारिक हैंडल @BhopalDivision ने देरी स्वीकार करते हुए लिखा कि भोपाल में एसएंडटी फेलियर के कारण ट्रैक ड्रॉप हुआ। साथ ही सेक्शन में ट्रेनों की अधिकता और परिचालन कारणों से भी विलंब बढ़ा। मंडल ने खेद जताया और कहा कि देरी घटाने के प्रयास किए जा रहे हैं। यही बात जिम्मेदारी तय करती है। एसएंडटी प्रणाली उसी मंडल की देखरेख में चलती है, जिसका प्रमुख डीआरएम भोपाल होता है। सिग्नल फेल होना महज “तकनीकी खराबी” कहकर टालने लायक मामला नहीं है। इससे पूरे सेक्शन का संचालन ठप या धीमा पड़ जाता है और आगे के मंडलों तक देरी पहुंच जाती है।
मुआवजा तो दूर की बात, रेल मदद से मदद नहीं मिली
यात्रियों की सबसे बड़ी शिकायत यह रही कि घंटों की देरी के बावजूद कोई मुआवजा नहीं मिला। मौजूदा रेलवे नियमों में तीन घंटे से अधिक देरी पर पूरा किराया लौटाने का प्रावधान मुख्य रूप से तभी है, जब यात्री यात्रा करे ही नहीं और ट्रेन के वास्तविक प्रस्थान से पहले टीडीआर दाखिल कर दे। जो यात्री ट्रेन में बैठ चुके थे, उन्हें इस देरी का स्वतः मुआवजा नहीं दिया गया।
रेल मदद ऐप पर शिकायत दर्ज कराने में भी दिक्कत आई। यात्री ने पीएनआर 8253083163 डालकर शिकायत करने की कोशिश की, तो ऐप ने “वैध पीएनआर/यूटीएस नंबर डालें” का संदेश दिया। बाद में एक शिकायत बंद करते हुए रेलवे ने लिखा कि ट्रेन पिछली डिवीजन से 78 मिनट लेट मिली थी। यात्रियों का कहना है कि असल नुकसान आगे चलकर और बढ़ा, लेकिन जवाबदेही बिखर गई।
पानी और खाना भी अपनी जेब से खरीदना पड़ा
यदि रेलवे के कारण देरी हुई है तो इस अवधि में यात्रियों को कम से कम ड्रिंकिंग वॉटर और फूड तो दिया ही जाना चाहिए, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं किया गया। यात्रियों को स्टेशन या पैंट्री से खुद खरीदना पड़ा। गर्मी, थकान और अनिश्चित ठहराव के बीच यह अतिरिक्त बोझ बढ़ा।
यात्री तिवारी ने मांग की कि तीन घंटे से अधिक देरी पर स्वतः टीडीआर की व्यवस्था हो और बार-बार लेट चलने वाली ट्रेन की विश्वसनीयता पर पुनर्विचार किया जाए।
सवाल डीआरएम कार्यालय पर
भोपाल मंडल ने स्वयं माना कि खराबी उसके क्षेत्र में हुई। ऐसे में केवल खेद प्रकट करना काफी नहीं है। सवाल यह है कि एसएंडटी उपकरण का रखरखाव कितना नियमित था, ट्रैक सर्किट/सिग्नल फेलियर कितनी देर चला, और प्रभावित ट्रेनों के यात्रियों के लिए तत्काल राहत (पानी, सूचना और शिकायत निवारण) क्यों नहीं जुटाई गई।
रेलवे बार-बार पंक्चुअलिटी और डिजिटल शिकायत प्रणाली का दावा करता है। इस मामले में दोनों कमजोर दिखे। यदि कोई यात्री टिकट कैंसिल करने में लेट हो जाए तो उसको पैसे नहीं मिलते या फिर उसके रिफंड में भारी कटौती की जाती है। तो फिर जब ट्रेन लेट हो जाती है तब यात्री को उसके किराए में रिफंड क्यों नहीं दिया जाता है। मुआवजा क्यों नहीं दिया जाता है। मुफ्त खान और पानी क्यों नहीं दिया जाता? जब तक भोपाल मंडल और उसके प्रमुख डीआरएम इस खराबी की जांच, जिम्मेदार कर्मियों की जवाबदेही और यात्री राहत का स्पष्ट ब्योरा नहीं देते, यात्रियों का यह आरोप बना रहेगा कि तकनीकी विफलता की कीमत आम यात्री चुका रहे हैं, प्रबंधन नहीं।
