सुप्रीम कोर्ट ने जताई चिंता: रिटायरमेंट के बाद जजों को अलग-अलग सुविधाएं क्यों? केंद्र सरकार को दिया ये सुझाव

Published on 23 सित॰ 2026

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा है कि हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीशों और जजों को रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली सुविधाओं के लिए पूरे देश में एक समान नीति बनाई जाए। अदालत ने खास तौर पर सुझाव दिया कि इस नीति को तैयार करने वाली समिति की अध्यक्षता किसी पूर्व हाईकोर्ट मुख्य न्यायाधीश को दी जाए। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी मोहना की पीठ के सामने केंद्र ने बताया कि समिति बनाने का फैसला हो चुका है।



समिति को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने क्या बदलाव सुझाया?


केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने बताया कि समिति के प्रमुख के तौर पर पूर्व सचिव स्तर के अधिकारी को नियुक्त किया गया है। इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि उनकी राय में किसी पूर्व हाईकोर्ट मुख्य न्यायाधीश को समिति की अध्यक्षता करनी चाहिए। सॉलिसिटर जनरल ने इस सुझाव पर सहमति जताई और कहा कि सरकार 28 सितंबर को इस मामले में अदालत के सामने अपना जवाब देगी।

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आखिर रिटायर्ड जजों की सुविधाओं को लेकर विवाद क्या?


मामला यह है कि सेवानिवृत्त हाईकोर्ट जजों को मिलने वाली सुविधाएं अलग-अलग राज्यों में अलग हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि घरेलू मदद, ड्राइवर, टेलीफोन, मेडिकल खर्च और सरकारी आवास में ठहरने जैसी बुनियादी सुविधाओं के नियम राज्यों में काफी अलग-अलग हैं।

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सुप्रीम कोर्ट के सामने उठे प्रमुख सवाल क्या?

  • ड्राइवर और सुरक्षा: कुछ राज्यों में रिटायर्ड जजों को ड्राइवर और सुरक्षा कर्मियों के लिए आर्थिक सहायता दी जाती है, लेकिन इसकी राशि और व्यवस्था एक जैसी नहीं है।
  • सरकारी आवास: यात्रा के दौरान सरकारी आवास में ठहरने की सुविधा भी अलग-अलग राज्यों में अलग नियमों के तहत मिलती है।
  • दूसरी बुनियादी सुविधाएं: घरेलू मदद, टेलीफोन और मेडिकल खर्च की सुविधा को लेकर भी राज्यों के बीच एकरूपता नहीं है।

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सुप्रीम कोर्ट ने आर्थिक सहायता पर क्या कहा?


सुनवाई के दौरान सीजेआई ने कुछ राज्यों की ओर से सुरक्षा कर्मियों और ड्राइवर के लिए दी जाने वाली आर्थिक सहायता की पर्याप्तता पर सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि क्या 45 से 50 हजार रुपये में ड्राइवर और सुरक्षा अधिकारी मिलना संभव है। इससे पहले 20 जुलाई को अदालत ने केंद्र को दो सप्ताह के भीतर समिति गठित करने और इस मुद्दे पर तीन महीने में रिपोर्ट देने को कहा था। 20 अगस्त को केंद्र को समिति बनाने के लिए एक सप्ताह और दिया गया था।

  • 20 जुलाई का आदेश: केंद्र को दो सप्ताह के भीतर समिति गठित करने का निर्देश दिया गया था।
  • तीन महीने की समयसीमा: समिति को अपनी रिपोर्ट तीन महीने के भीतर देने को कहा गया था।
  • 20 अगस्त को अतिरिक्त समय: केंद्र को समिति बनाने के लिए एक सप्ताह का और समय दिया गया था।
  • 28 सितंबर को जवाब: अब केंद्र सरकार 28 सितंबर को समिति की अध्यक्षता को लेकर अपना रुख बताएगी।

यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक कैसे पहुंचा?


यह मामला सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जजों के संगठन के अध्यक्ष जस्टिस वीएस डेव की ओर से दायर अवमानना याचिका के जरिए अदालत पहुंचा। याचिका में रिटायर्ड जजों की सुरक्षा और दूसरी सुविधाओं का मुद्दा उठाया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में केंद्र एक महत्वपूर्ण पक्ष है, क्योंकि प्रस्तावित व्यवस्था में राज्यों के साथ वित्तीय बोझ साझा करने का ढांचा भी शामिल हो सकता है। अब केंद्र के जवाब के बाद समिति की संरचना और एक समान राष्ट्रीय नीति की दिशा में आगे की प्रक्रिया तय होगी।