भूले-बिसरे पितरों के तर्पण का अंतिम मौका कब? सर्वपितृ अमावस्या की सही तिथि और दान के नियम यहां देखें
Published: Thursday, October 1, 2026, 17:55 [IST]
Sarva Pitru Amavasya 2026: पितृपक्ष के दिनों में लोग अपने पूर्वजों को याद कर श्राद्ध, तर्पण और दान करते हैं। हर तिथि पर उस दिन मृत्यु को प्राप्त हुए परिवार के सदस्य का श्राद्ध करने की परंपरा है। लेकिन कई बार पूर्वज की मृत्यु की सही तिथि याद नहीं रहती या किसी कारण उस दिन श्राद्ध नहीं हो पाता। ऐसे में पितृपक्ष का आखिरी दिन खास माना जाता है।
इस साल पितृपक्ष का समापन 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ होगा। धार्मिक मान्यता है कि पितृपक्ष में अपने परिवार के पास आने वाले पितर इस दिन विदा होते हैं। इसलिए उनकी विदाई के समय तर्पण और दान करने की परंपरा है। खास बात यह है कि इस दिन भूले-बिसरे पूर्वजों के लिए भी श्राद्ध किया जा सकता है।
10 अक्टूबर को पितरों की विदाई
सर्वपितृ अमावस्या पितृपक्ष का अंतिम दिन होता है। मान्यता है कि पितृपक्ष में पितर अपने परिवार के पास आते हैं और अमावस्या के दिन वापस लौटते हैं। इसी वजह से इस दिन तर्पण करने का खास महत्व बताया गया है। जिन लोगों को अपने पूर्वज की मृत्यु की सही तिथि याद नहीं है, वे सर्वपितृ अमावस्या पर उनका श्राद्ध कर सकते हैं। अगर किसी कारण निर्धारित तिथि पर श्राद्ध छूट गया है तो उनके लिए भी इस दिन तर्पण और दान किया जा सकता है।
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किन पितरों का होता है तर्पण?
धार्मिक परंपराओं के अनुसार श्राद्ध और तर्पण में परिवार की पिछली पीढ़ियों को याद किया जाता है। पिता पक्ष में पिता, पितामह और प्रपितामह सहित तीन पीढ़ियों के लिए तर्पण करने की परंपरा है। इसी तरह माता पक्ष की पिछली पीढ़ियों को भी याद किया जाता है। सर्वपितृ अमावस्या पर ऐसे पूर्वजों के लिए भी तर्पण किया जा सकता है, जिनका श्राद्ध किसी वजह से पहले नहीं हो पाया हो।
अमावस्या पर क्या करें दान?
सर्वपितृ अमावस्या पर पूर्वजों के नाम से दान करने की भी परंपरा है। मान्यता है कि इससे पितर तृप्त होते हैं और परिवार को आशीर्वाद देते हैं। इस दिन अन्न और काले तिल का दान करना अच्छा माना जाता है। इसके अलावा जरूरतमंद लोगों को पानी, पंखा, छाता, जूते-चप्पल और कपड़े दिए जा सकते हैं। अगर कोई व्यक्ति बड़ा दान या विधि-विधान से श्राद्ध करने में सक्षम नहीं है तो गाय को हरा चारा खिला सकता है। कुत्ते और कौवों को भोजन देने की भी परंपरा है, जिसे पंचबलि कर्म से जोड़कर देखा जाता है।
1 अक्टूबर को पंचमी और षष्ठी का श्राद्ध
पितृपक्ष में पंचमी और षष्ठी तिथि के श्राद्ध को लेकर भी लोगों के बीच सवाल हैं। पंचमी और षष्ठी से जुड़े श्राद्ध 1 अक्टूबर को किए जाने की बात कही गई है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्राद्ध के लिए दोपहर या उसके बाद मिलने वाली तिथि को खास महत्व दिया जाता है। षष्ठी तिथि 1 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 35 मिनट से शुरू होकर 2 अक्टूबर की सुबह 10 बजकर 15 मिनट तक रहेगी।
2 अक्टूबर को सप्तमी का श्राद्ध
कुछ स्थानों पर स्थानीय पंचांग और परंपरा के अनुसार षष्ठी के श्राद्ध को लेकर अंतर हो सकता है। सप्तमी तिथि का श्राद्ध 2 अक्टूबर को सुबह 10 बजकर 15 मिनट के बाद किया जाएगा। श्राद्ध की तिथि और समय शहर तथा स्थानीय पंचांग के अनुसार थोड़ा अलग हो सकता है। इसलिए कोई भी धार्मिक कार्य करने से पहले अपने क्षेत्र के पंचांग से सही समय की पुष्टि करना बेहतर रहेगा।
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डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं, परंपराओं और उपलब्ध पंचांग संबंधी जानकारी पर आधारित है। अलग-अलग स्थानों पर तिथि, समय और पूजा की विधि में अंतर हो सकता है। सही जानकारी के लिए स्थानीय पंचांग या जानकार पंडित से सलाह लें।