पांच दिन पन्ना के जंगलों में: डर, मेहनत और कहानियों के साथ

Published on 10 अक्टू॰ 2026

पांच दिन पन्ना के जंगलों में: डर, मेहनत और कहानियों के साथ

October 10, 2026 43 बार देखा गया

खबर लहरिया की ब्यूरो चीफ़ गीता द्वारा मध्य प्रदेश के पांच अलग-अलग गांव में रिपोर्टिंग की गई है, अलग-अलग मुद्दों में। इस आर्टिकल में उनके रिपोर्टिंग के साथ उनका अपना अनुभव भी शामिल है। जो रिपोर्टिंग के दौरान यादगार बन गया। 

रिपोर्ट – गीता, लेखन – मीरा देवी 

गांव में पानी के लिए कई पहाड़ों को खुले पैर लाँगती महिलाएं (रिपोर्टिंग के दौरान की फोटो) (फोटो साभार: गीता)

जंगल को कागज पर समझना और जंगल में चलकर समझना अलग है। जंगल को दूर से देखिए तो बस पेड़, पहाड़ और हरियाली दिखाई देती है लेकिन जंगल के अंदर कुछ किलोमीटर चलिए तो समझ आता है कि यहां हर रास्ते की अपनी कहानी है। किसी रास्ते पर महिलाएं रोज लकड़ी लेने जाती हैं, किसी जंगल से कभी परिवारों की रोजी-रोटी चलती थी, तो कहीं जंगली जानवरों का डर लोगों की जिंदगी का हिस्सा है। पन्ना में फेलोज़ के साथ पांच दिन जंगलों में काम करते हुए मैंने यही महसूस किया। इन पांच दिनों में कभी पसीने से कपड़े भीग गए, कभी जंगल में बाघ के पैरों के निशान देखकर डर लगा, कभी तेंदुए से आमना-सामना होने की चिंता हुई और कभी पहाड़ी-खाई के बीच जड़ी-बूटियों की तलाश में चलना पड़ा लेकिन इन सबसे ज्यादा खास था—फेलोज़ के साथ बराबरी से चलना, उनके साथ काम करना और उनकी कहानियों को करीब से समझना।

पहला दिन: दो किलोमीटर में ही खुल गया लकड़ी का सच

चाहना का पुराना जंगल वाला अनुभव रास्ते में ही छूट गया। पन्ना जिले के मनकी गांव में महिलाओं को जंगल से लकड़ी लाने के लिए कितनी मशक्कत करनी पड़ती है, इसकी कवरेज के लिए मैं फेलोज़ चाहना के साथ जंगल की तरफ निकली।चाहना ने बताया था कि वह अपनी मां के साथ पहले जंगल से लकड़ी लाया करती थी। मुझे लगा कि उसे तो जंगल के रास्ते और वहां की मेहनत का अच्छा अनुभव होगा लेकिन गांव से करीब दो किलोमीटर अंदर जाते ही कहानी बदल गई। चाहना का पसीना छूटने लगा, सांस फूलने लगी और थकान इतनी बढ़ गई कि वह रास्ते में ही बैठ गई। मैं उसे देख रही थी और मन में यही सवाल था—अगर दो किलोमीटर में यह हाल है तो पूरी कवरेज कैसे होगी? आखिर मुझे ही आगे बढ़कर ज्यादातर कवरेज करनी पड़ी और चाहना कुछ देर बैठकर आराम करती रही। असली मेहनत तो उन महिलाओं की है लेकिन उस दिन चाहना की थकान देखकर मुझे उन महिलाओं की मेहनत का अंदाजा हुआ जो रोज इसी रास्ते पर चलती हैं। हमारे लिए जंगल में कुछ किलोमीटर चलना एक कवरेज है। उनके लिए यही रोज की जिंदगी है। कई महिलाएं 10-15 किलोमीटर तक जंगल में जाती हैं। लकड़ी तलाशती हैं, उसे काटती हैं, सिर पर उठाती हैं और फिर उसी वजन के साथ घर तक लौटती हैं। कई महिलाएं तो बिना चप्पल के ही जंगल चली जाती हैं। तब समझ आया कि जंगल से लकड़ी लाना सिर्फ लकड़ी उठाकर घर लौटने का काम नहीं है। यह मेहनत, पसीने और हिम्मत का पूरा पैकेज है। यह काम दावे से नहीं, रोज की मेहनत से समझ आता है।

दूसरा दिन: गाड़ी ने छोड़ा साथ, जंगल ने नहीं

चार किलोमीटर बाद पंचर और आगे 10-12 किलोमीटर पैदल। केन-बेतवा लिंक परियोजना से विस्थापित हुए खमरी गांव के लोग पहले जंगल से क्या-क्या उपज लेते थे, इसकी कवरेज के लिए मैं फेलोज़ कमला के साथ निकली। रामपुर से खमरी गांव करीब 15-20 किलोमीटर दूर था। हमने गाड़ी बुक कर रखी थी। सोचा था कि गाड़ी से जंगल के पास तक पहुंच जाएंगे लेकिन करीब चार-पांच किलोमीटर चलते ही गाड़ी का टायर पंचर हो गया। अब गाड़ी आगे नहीं जा सकती थी। मुझे कमला पर गुस्सा भी आ रहा था। मन में चल रहा था—काम पर जाना है, फिर इतनी देर क्यों हुई और अब ऊपर से यह मुसीबत लेकिन गुस्से को किनारे रखा और महिलाओं के साथ पैदल चल पड़ी। करीब 10-12 किलोमीटर चलने के बाद जंगल पहुंची। रास्ते में बाघ के पैरों के निशान। जैसे-जैसे हम जंगल के अंदर जा रहे थे, डर भी बढ़ता जा रहा था। महिलाएं रास्ते में बाघ के पैरों के निशान दिखा रही थीं। मैं ऊपर से इग्नोर रखने की कोशिश कर रही थी लेकिन अंदर से डर लग रहा था कि कहीं सच में कोई जंगली जानवर सामने न आ जाए फिर भी कमल के साथ काम पूरा करना था। उसे स्टोरी करना सिखाना था और खमरी के विस्थापन की कहानी दिखानी थी। यही सोचकर आगे बढ़ती रही। देर रात वापस लौटी लेकिन जब तक स्टोरी का काम पूरा नहीं हुआ, मन को चैन नहीं मिला। जंगल छूटा तो सिर्फ जमीन नहीं छूटी। खमरी पहुंचकर वहां के गिरे हुए घर देखे। महिलाएं हमें बता रही थीं कि कभी इसी जंगल से उनकी अच्छी-खासी आमदनी होती थी। आंवला इतना होता था कि एक सीजन में 10 से 15 कुंतल तक बेच देती थीं। उसी पैसे से घर का रोजमर्रा का खर्च चलता था। आज उसी जंगल में आंवले के पेड़ गिने-चुने रह गए हैं। महिलाएं आपस में बात कर रही थीं—“हम लोग जंगल से निकल आए तो जंगल के पेड़-पौधे भी रो रहे हैं।”
यह बात सुनकर मन भारी हो गया। उनका जंगल से रिश्ता सिर्फ लकड़ी या आंवला बेचने तक नहीं था। जंगल उन्हें सब्जियां देता था, रोजगार देता था, ताजी हवा देता था और उनके जीवन का हिस्सा था। विस्थापन में उनके घर ही नहीं छूटे, उनके जंगल से जुड़े रिश्ते भी पीछे छूट गए।

जंगल के रास्ते, रिपोर्टिंग के दौरान की तस्वीर

तीसरा दिन: तेंदुए की कहानी सुनते-सुनते जंगल में पहुंच गई

रामवती ने बताया अपना सामना, और मेरा डर भी जाग गया। 14 सितम्बर को मैं अजयगढ़ के धवारी गांव के जंगल पहुंची। इस बार फेलोज़ रामवती के साथ स्टोरी करनी थी। धवारी चारों तरफ पहाड़ियों से घिरा हुआ इलाका है और जंगल भी काफी घना है। रामवती अपनी कहानी बता रही थी कि एक बार जंगल में उसका सामना तेंदुए से हो गया था। वह उस घटना को याद करते हुए बता रही थी कि कैसे वह डर के मारे चिल्लाई थी। मैं उसकी कहानी सुन रही थी लेकिन मन में एक और ही सवाल चल रहा था। कहीं आज हमारा भी तेंदुए से सामना न हो जाए। डर था लेकिन सच कहूं तो जंगल में तेंदुए को देखने की उत्सुकता भी थी। रामवती को फॉलो करते हुए जब मैं जंगल में आगे बढ़ी तो समझ आया कि यहां रहने वाले लोगों के लिए जंगली जानवर कोई रोमांच की कहानी नहीं हैं। उनके लिए यह रोज का खतरा है। भालू गांव तक पहुंचता है। वहां के लोगों ने बताया कि जंगल में भालू बहुत ज्यादा हैं। पिछले साल एक भालू के हमले में एक चरवाहे की जान चली गई थी। गांव वालों के मुताबिक भालू कई बार गांव के अंदर तक आ जाता है और तालाब में पानी पीता है। सुबह और शाम लोगों के लिए ज्यादा खतरे का समय रहता है। जंगली जानवर फसल भी खराब करते हैं। कई बार पूरी फसल चौपट हो जाती है। यानी जंगल लोगों को बहुत कुछ देता है लेकिन उसके साथ खतरे भी हैं। जंगल से मिलने वाली उपज उनके लिए आमदनी का जरिया है, लेकिन जानवरों के डर के कारण कई लोग जंगल के अंदर जाने से भी डरते हैं। रामवती के साथ उस दिन काम करते हुए मुझे लगा कि उसकी कहानी सिर्फ तेंदुए से सामना होने की कहानी नहीं है। यह उस जिंदगी की कहानी है जिसमें इंसान और जंगली जानवर एक ही जगह को साझा करते हैं।

चौथा दिन: पहाड़, खाई और जड़ी-बूटियों की तलाश

गांधीग्राम का जंगल एक अलग ही दुनिया था। पन्ना के गांधीग्राम में फेलोज़ उमा के साथ जंगली जड़ी-बूटियों पर स्टोरी करनी थी। यहां जंगल का रूप बिल्कुल अलग था। घना जंगल, ऊंची-नीची पहाड़ियां, कहीं चढ़ाई तो कहीं ढलान, और कई जगह गहरी खाई। बीच में खदान और उसके आसपास बहता हुआ झरना। रास्ता थकाने वाला था, लेकिन खूबसूरत भी। उमा के साथ चलते हुए जड़ी-बूटियों के बारे में लोगों से बात की। कौन-सी जड़ी किस काम आती है, लोग उसे कैसे पहचानते हैं और जंगल उनके जीवन में कितना जरूरी है—इन सबको समझने का मौका मिला। जंगल सिर्फ पेड़ों का नाम नहीं। इन पांच दिनों में यह बात बार-बार सामने आई कि जंगल को सिर्फ पेड़, जानवर और हरियाली मान लेना काफी नहीं है। जंगल से लोगों की रोजी-रोटी जुड़ी है। किसी के लिए लकड़ी है, किसी के लिए आंवला और दूसरी उपज, किसी के लिए जड़ी-बूटी और किसी के लिए पीढ़ियों पुराना घर और जीवन। इसलिए जब जंगल से लोगों का रिश्ता टूटता है तो सिर्फ जगह नहीं बदलती, पूरी जिंदगी बदल जाती है।

पांचवां दिन: कहानियों से ज्यादा याद रह गया साथ

हर फेलो के साथ जंगल का एक नया चेहरा मिला। इन पांच दिनों में चार अलग-अलग फेलोज़ के साथ काम किया और हर बार जंगल का एक नया चेहरा सामने आया। चाहना के साथ पता चला कि लकड़ी लाने की मेहनत बाहर से जितनी आसान दिखती है, असल में उतनी है नहीं। कमला के साथ जाना हुआ तो गाड़ी ने साथ छोड़ दिया, लेकिन कहानी ने नहीं। 10-12 किलोमीटर पैदल चलना पड़ा और देर रात लौटना पड़ा। रामवती के साथ जंगल में तेंदुए और भालू का डर सामने था। उमा के साथ पहाड़ों और खाइयों के बीच जड़ी-बूटियों की कहानी तलाशनी थी। कभी मैं उन्हें स्टोरी समझा रही थी, कभी वे मुझे अपने इलाके के बारे में बता रहे थे। कभी मैं आगे चल रही थी, कभी उनके पीछे और शायद यही चीज सबसे ज्यादा अच्छी लगी। बराबरी का साथ हो तो जंगल का रास्ता भी आसान लगता है। फील्ड में काम सिर्फ कैमरा लेकर पहुंच जाने का नाम नहीं है। कभी गाड़ी रास्ते में खराब होती है, कभी रास्ता खत्म हो जाता है, कभी शरीर थक जाता है और कभी डर सामने खड़ा होता है लेकिन जब साथ चलने वाला बराबरी से काम करे तो वही मुश्किल सफर भी अच्छा लगने लगता है। इन पांच दिनों ने मुझे यह भी महसूस कराया कि फेलोज़ के साथ काम करना सिर्फ उन्हें स्टोरी करना सिखाना नहीं है। उनके साथ चलते हुए उनसे सीखना भी है। उनकी नजर से जंगल को देखना है। उनके इलाके को समझना है। और सबसे जरूरी—लोगों की जिंदगी को उनकी अपनी नजर से सुनना है।

रिपोर्टिंग के दौरान की फोटो(फोटो साभार: गीता)

जंगल से लौटकर भी जंगल साथ रहा

इन पांच दिनों के बाद जब जंगल से बाहर आई तो कई तस्वीरें और आवाजें साथ थीं। मनकी की महिलाओं का सिर पर लकड़ी उठाकर लौटना। खमरी की महिलाओं का अपने पुराने जंगल को याद करना। बाघ के पैरों के निशान देखकर मेरा अंदर ही अंदर डरना। रामवती की तेंदुए वाली कहानी। गांव में पानी पीने आता भालू। गांधीग्राम की पहाड़ी, खाई और बहता झरना और इन सबके बीच फेलोज़ के साथ बिताए वे घंटे। मुझे जंगलों पर कवरेज करना हमेशा अच्छा लगता है। शायद इसलिए कि यहां कहानी सिर्फ सामने बैठकर बात करने से नहीं मिलती। कहानी तक पहुंचने के लिए चलना पड़ता है, चढ़ना पड़ता है, कभी डरना पड़ता है और कई बार अपनी सुविधा छोड़नी पड़ती है। इन पांच दिनों ने एक बात और पक्की कर दी कि जंगल की कहानी जंगल में जाकर ही पूरी समझ आती है और अगर उस सफर में साथ चलने वाला साथी बराबरी का हो, सीखने का जज्बा हो और कहानी पूरी करने की जिद हो, तो जंगल का मुश्किल रास्ता भी यादगार बन जाता है।

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