Updated On: Jul 13, 2026 | 01:35 PM IST
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सार
Jagannath Rath Yatra: पुरी में रथ यात्रा से पहले भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा के नेत्रोत्सव और नवयौवन दर्शन जैसे विशेष अनुष्ठान संपन्न होते हैं। जानिए इन दोनों धार्मिक परंपराओं के बारे में।

प्रभु जगन्नाथ (फोटो.सोशल मीडिया)
विस्तार
Puri Jagannath Rath Yatra 2026: पुरी की विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथ यात्रा केवल नगर भ्रमण तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इस महापर्व से पहले और बाद में कई ऐसे अनुष्ठान किए जाते हैं, जो सदियों से चली आ रही इस परंपरा का हिस्सा है।
इस महापर्व से पहले नेत्रोत्सव और नवयौवन दर्शन का विशेष स्थान है। ये दोनों अनुष्ठान भगवान के पुनः दर्शन और दिव्य नवजीवन के प्रतीक माने जाते हैं।
अनासर काल के बाद होता है नेत्रोत्सव
देवस्नान पूर्णिमा के दिन भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा का 108 कलशों के पवित्र जल से अभिषेक किया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस स्नान के बाद भगवान अस्वस्थ हो जाते हैं और लगभग 15 दिनों तक अनासर काल में विश्राम करते हैं। इस दौरान मंदिर में आम श्रद्धालुओं के लिए दर्शन बंद रहते हैं और भगवान को स्वस्थ होने के लिए कई प्रकार के काढ़ा और शहद से बने व्यंजन भोग लगाए जाते हैं।
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क्या है नेत्रोत्सव?
अनासर काल समाप्त होने पर भगवान की प्रतिमा का पुनः श्रृंगार किया जाता है और उनकी आंखों का विशेष रूप से चित्रांकन किया जाता है। इसी अनुष्ठान को नेत्रोत्सव कहा जाता है। ‘नेत्रोत्सव’ का अर्थ है आंखों का उत्सव, जो भगवान जगन्नाथ के पुनः दिव्य दर्शन का प्रतीक माना जाता है। इस दिन भगवान को नए वस्त्रों और आभूषणों से सजाया जाता है और प्रभु का रूप अविस्मरणीय होता है। भक्त भी प्रभु की एक झलक पाने को बेताब रहते हैं।
क्या है नवयौवन दर्शन?
नेत्रोत्सव के साथ ही श्रद्धालुओं को भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा के नवयौवन दर्शन का अवसर मिलता है। धार्मिक मान्यता है कि बीमारी से स्वस्थ होने के बाद भगवान नए तेज, नई ऊर्जा और युवा स्वरूप में प्रकट होते हैं। इसलिए इसे नवयौवन दर्शन कहा जाता है। यह रथ यात्रा से ठीक पहले होने वाला पहला सार्वजनिक दर्शन होता है और इसे अत्यंत शुभ माना जाता है।
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भक्तों के लिए क्यों खास है यह दिन?
अनासर काल के दौरान भगवान के दर्शन नहीं हो पाते, इसलिए लगभग 15 दिनों के लंबे इंतजार के बाद जब नवयौवन दर्शन होता है, तो देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु पुरी पहुंचते हैं। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि इस दिन भगवान के दर्शन करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है और भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
रथ यात्रा की शुरुआत का संकेत
नेत्रोत्सव और नवयौवन दर्शन को रथ यात्रा की औपचारिक शुरुआत से पहले का सबसे महत्वपूर्ण चरण माना जाता है। इसके बाद भगवान अपने भव्य रथों पर सवार होकर गुंडिचा मंदिर की यात्रा के लिए निकलते हैं। यही परंपरा सदियों से पुरी की जगन्नाथ रथ यात्रा का अभिन्न हिस्सा रही है।
