Putrada Ekadashi 2026 Katha: राजा के पूर्व जन्म का वो कर्म, जिसके कारण नहीं हुई संतान; पढ़ें पुत्रदा एकादशी की पौराणिक कथा - Haribhoomi

Published on 23 अग॰ 2026

Putrada Ekadashi 2026 Katha: जानिए राजा महाजित को संतान सुख क्यों नहीं मिला और पुत्रदा एकादशी के व्रत से कैसे दूर हुआ संकट। पढ़ें इस व्रत की पौराणिक कथा।

Putrada Ekadashi

Putrada Ekadashi 2026 Katha:

  • Published: 23 Aug 2026, 09:07 AM IST
  • Last Updated: 23 Aug 2026, 09:07 AM IST

Putrada Ekadashi 2026 Katha: सावन का महीना भगवान शिव और भगवान विष्णु की आराधना के लिए विशेष माना जाता है। सावन शुक्ल पक्ष में आने वाली पुत्रदा एकादशी का संबंध धार्मिक मान्यताओं में संतान सुख से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा से व्रत रखने, भगवान विष्णु की पूजा करने और एकादशी की कथा सुनने से संतान संबंधी मनोकामनाओं के लिए भगवान का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

पुत्रदा एकादशी की महत्ता बताने वाली पौराणिक कथा में महिष्मती नगरी के राजा महाजित का वर्णन आता है। राजा के पास धन-दौलत और किसी चीज की कमी नहीं थी, लेकिन एक कमी उन्हें अंदर से परेशान करती थी वह संतानहीन थे।

राजा के जीवन में था सब कुछ, फिर भी थे दुखी
द्वापर युग के आरंभ में महिष्मती नाम की नगरी में राजा महाजित का शासन था। राजा अपनी प्रजा का बहुत ध्यान रखते थे और उनके राज्य में सुख-समृद्धि थी। प्रजा भी अपने राजा से बेहद प्रसन्न थी।

इसके बावजूद राजा महाजित के मन में एक गहरा दुख था। उनके कोई संतान नहीं थी। उन्हें चिंता रहती थी कि उनके बाद राज्य की जिम्मेदारी कौन संभालेगा और उनका वंश आगे कैसे बढ़ेगा। समय बीतने के साथ संतान न होने की चिंता राजा पर इतनी हावी हो गई कि उनका मन राजपाट और सुख-सुविधाओं से भी हटने लगा।

प्रजा भी राजा के दुख में हुई शामिल
राजा अपनी प्रजा को संतान की तरह मानते थे। इसलिए जब प्रजा ने अपने राजा को लगातार परेशान देखा तो मंत्रियों और लोगों ने मिलकर उनकी समस्या का समाधान खोजने का फैसला किया।

सभी लोग लोमश ऋषि के आश्रम पहुंचे और राजा महाजित की परेशानी बताई। उन्होंने ऋषि से पूछा कि राजा को संतान सुख क्यों नहीं मिल रहा है और इसके लिए क्या उपाय किया जा सकता है। लोमश ऋषि ने ध्यान लगाकर राजा के पूर्व जन्म के कर्मों का पता लगाया।

पूर्व जन्म का कौन सा कर्म बना संतान सुख में बाधा?
पौराणिक कथा के अनुसार, लोमश ऋषि ने बताया कि पिछले जन्म में राजा महाजित ने एक ऐसा कर्म किया था, जिसका प्रभाव उन्हें वर्तमान जन्म में भुगतना पड़ रहा था।

ऋषि ने बताया कि पिछले जन्म में ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन राजा भूखे थे। इसी दौरान उन्हें बहुत तेज प्यास लगी। पानी पीने के लिए जब वह एक जलाशय के पास पहुंचे तो वहां एक गाय और उसका बछड़ा पानी पी रहे थे।

कथा के अनुसार, राजा ने उन्हें वहां से हटाकर स्वयं पानी पी लिया। इसी कर्म को उनके वर्तमान जन्म में संतान सुख से वंचित रहने का कारण बताया गया।

लोमश ऋषि ने बताया पुत्रदा एकादशी का उपाय
राजा की समस्या सुनने के बाद लोमश ऋषि ने मंत्रियों और प्रजा को सावन शुक्ल पक्ष की पुत्रदा एकादशी का व्रत करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि सभी लोग श्रद्धापूर्वक भगवान विष्णु की पूजा करें, एकादशी का उपवास रखें और रात में जागरण करें। इसके बाद व्रत से प्राप्त पुण्य को राजा महाजित को समर्पित करने की बात कही।

ऋषि की सलाह मानकर मंत्री और प्रजा महिष्मती लौट आए। सभी ने विधि-विधान से पुत्रदा एकादशी का व्रत रखा और भगवान विष्णु की आराधना की।

राजा को मिला संतान सुख
एकादशी का व्रत पूरा होने के बाद द्वादशी के दिन सभी ने व्रत से प्राप्त पुण्य राजा महाजित को समर्पित कर दिया। पौराणिक मान्यता के अनुसार, इस पुण्य के प्रभाव से राजा की पत्नी ने गर्भ धारण किया। कुछ समय बाद रानी ने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। पुत्र के जन्म से राजा महाजित का परिवार और पूरा राज्य खुशी से भर गया। इसी कथा के कारण सावन शुक्ल पक्ष की एकादशी को पुत्रदा एकादशी के रूप में विशेष महत्व मिलने की मान्यता बताई जाती है।

पुत्रदा एकादशी पर क्या करें?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करना, व्रत रखना, विष्णु मंत्रों का जाप करना और पुत्रदा एकादशी की कथा का श्रवण करना शुभ माना जाता है। जरूरतमंदों को सामर्थ्य के अनुसार दान देने की भी परंपरा है।

नोट: इस खबर में दी गई कथा और धार्मिक मान्यताएं पौराणिक एवं आस्था आधारित हैं। इन्हें वैज्ञानिक तथ्य या चिकित्सकीय सलाह के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए।