Sep 15, 2026 11:09 am ISTलाइव हिन्दुस्तान

मुख्य बातें
- Tata Sons Listing Matter: सिविल प्रोसीजर कोड की धारा 148A के तहत अगर टाटा संस या उससे जुड़ा कोई पक्ष नियामक के खिलाफ कोई राहत पाने के लिए अदालत जाना चाहता है, तो उसे पहले आरबीआई को सूचना देनी होगी

आरबीआई ने टाटा संस की अनिवार्य लिस्टिंग से जुड़े मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट में पहले ही केविएट दाखिल कर दिया है।
भारतीय रिजर्व बैंक यानी आरबीआई ने टाटा संस की अनिवार्य लिस्टिंग से जुड़े मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट में पहले ही केविएट दाखिल कर दिया है। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि इस मामले को लेकर अगर कोई कोर्ट जाता है, तो अदालत कोई भी आदेश पारित करने से पहले RBI को सुनवाई का मौका दे।
यह कदम आरबीआई द्वारा 11 सितंबर को टाटा संस की उस अर्जी को खारिज किए जाने के बाद उठाया गया है, जिसमें कंपनी ने स्वेच्छा से अपना रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट सरेंडर करके खुद को अनरजिस्टर्ड कोर इनवेस्टमेंट कंपनी यानी CIC के रूप में वर्गीकृत कराने की मांग की थी। इससे रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के इस फैसले ने देश के सबसे बड़े बिजनेस ग्रुप की होल्डिंग कंपनी की सार्वजनिक लिस्टिंग का रास्ता साफ कर दिया है।
नोएल टाटा और ट्रस्टी की क्या है मंशा
द इनॉमिक टाइम्स की खबर के अनुसार टाटा ट्रस्ट के चेयरमैन नोएल टाटा और ज्यादातर ट्रस्टी चाहते हैं कि टाटा संस एक निजी कंपनी बनी रहे। उनकी कोशिश है कि शापूरजी पल्लोनजी यानी एसपी समूह के साथ हिस्सेदारी के मोनेटाइजेशन के लिए कोई आपसी सहमति वाला समाधान खोजा जाए, बजाय इसके कि होल्डिंग कंपनी को सार्वजनिक किया जाए।
केविएट का कानूनी अर्थ क्या है
कानून के जानकारों के मुताबिक सिविल प्रोसीजर कोड की धारा 148A के तहत अगर टाटा संस या उससे जुड़ा कोई पक्ष नियामक के खिलाफ कोई राहत पाने के लिए अदालत जाना चाहता है, तो उसे पहले आरबीआई को सूचना देनी होगी। इससे यह सुनिश्चित होगा कि कोई भी आदेश पारित करने से पहले केविएट दाखिल करने वाले की सुनवाई हो। केविएट का मुख्य काम यह सुनिश्चित करना है कि बिना सुनवाई के कोई एकपक्षीय अंतरिम आदेश पारित न हो।
क्या है आरबीआई का फैसला और क्या कहते हैं नियम
पिछले सप्ताह आरबीआई ने कहा था कि 28 मार्च 2024 की टाटा संस की अर्जी और उसके बाद के पत्राचार पर विचार करने के बाद वह CoR के स्वेच्छा से समर्पण के अनुरोध को स्वीकार नहीं कर सकती। आरबीआई ने टाटा संस को सलाह दी है कि वह NBFC-अपर लेयर यानी NBFC-UL इकाइयों पर लागू सभी दिशानिर्देशों और निर्देशों का पूरी तरह पालन सुनिश्चित करने के लिए जरूरी कदम उठाए। इसका मतलब है कि टाटा संस आगे भी NBFC-UL इकाइयों पर लागू नियामकीय ढांचे के दायरे में बनी रहेगी।
लिमिट के दोगुनी से भी ज्यादा है एसेट्स
केंद्रीय बैंक का यह फैसला जून 2026 में उसके स्केल-आधारित नियामकीय ढांचे में संशोधन के बाद आया है। उस समय आरबीआई ने किसी इकाई को अपर-लेयर NBFC के रूप में वर्गीकृत करने के लिए 1 लाख करोड़ रुपये की एसेट्स लिमिट तय की थी। 31 मार्च 2026 तक टाटा संस की कुल संपत्ति 2.01 लाख करोड़ रुपये थी, जो इस सीमा से दोगुनी से भी ज्यादा है।
कंपनी ने पंजीकरण रद्द कराने और लिस्टिंग से बचने के लिए अपना सारा कर्ज चुका दिया था, लेकिन आरबीआई की पात्रता शर्तों के मुताबिक, केवल वे इकाइयां जो सार्वजनिक फंड नहीं रखतीं, जिनका ग्राहक इंटरफेस नहीं है और जिनकी संपत्ति 1,000 करोड़ रुपये से कम है, 31 दिसंबर तक रजिस्ट्रेशन कैंसिल कराने के लिए पात्र हो सकती हैं।
टाटा ट्रस्ट और एसपी ग्रुप की कितनी हिस्सेदारी
टाटा ट्रस्ट, सर रतन टाटा ट्रस्ट और सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट के जरिए टाटा संस के 66% हिस्से को नियंत्रित करता है। उसने जुलाई 2025 में एक प्रस्ताव पारित कर यह इच्छा जताई थी कि होल्डिंग कंपनी निजी स्वामित्व में ही रहे। शापूरजी पल्लोनजी समूह टाटा संस का सबसे बड़ा माइनॉरिट शेयरहोल्डर है और उसके पास 18.37% हिस्सेदारी है। उसका मानना है कि लिस्टिंग ही मूल्य निकालने का सबसे व्यावहारिक तरीका है।
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Drigraj Madheshia
दृगराज मद्धेशिया पिछले 21 वर्षों से पत्रकारिता जगत का एक विश्वसनीय चेहरा हैं। वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' की बिजनेस टीम के एक महत्वपूर्ण सदस्य के रूप में, वे शेयर बाजार, कमोडिटी, पर्सनल फाइनेंस और यूटिलिटी सेक्टर पर अपनी गहरी पकड़ रखते हैं। वह कलम से बाजार की नब्ज टटोलने वाले एक पत्रकार हैं, जो शेयर बाजार से लेकर आपकी जेब (Personal Finance) तक, हर खबर को आसान बनाते हैं। टीवी, प्रिंट और डिजिटल मीडिया के अपने विस्तृत अनुभव के साथ, दृगराज जटिल मार्केट डेटा को आम पाठकों के लिए 'कुछ अलग' और आसान भाषा में पेश करने के लिए पहचाने जाते हैं। उन्होंने अपने करियर में हिन्दुस्तान, सहारा समय, दैनिक जागरण और न्यूज नेशन जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। मूलत: उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले के रहने वाले दृगराज मैथ्स बैकग्राउंड होने के कारण डेटा और कैलकुलेशन में माहिर हैं, जो बिजनेस पत्रकारिता के लिए एक बड़ा प्लस पॉइंट है। उन्होंने कॅरियर की शुरुआत गोरखपुर से सहारा समय साप्ताहिक से बतौर फ्रीलांसर की और बहुत ही जल्द सहारा समय उत्तर प्रदेश/उत्तराखंड के हिस्सा बन गए। इसके बाद छत्तीसगढ़ में वॉच न्यूज से जुड़े। टीवी को छोड़ हिन्दुस्तान अखबार के बरेली एडिशन की लॉन्चिंग टीम का हिस्सा बने। साढ़े सात साल की मैराथन पारी के बाद अगला पड़ाव न्यूज नेशन डिजिटल रहा। इसके बाद एक बार फिर हिन्दुस्तान दिल्ली से जुड़े और अब डिजिटल टीम का हिस्सा हैं। और पढ़ें
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