Supreme Court on Child Social Media Regulation: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से नाबालिगों द्वारा सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर सख्त कानूनी ढांचा तैयार करने की संभावना तलाशने को कहा है.
Supreme Court on Child Social Media Regulation: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से नाबालिगों द्वारा सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर सख्त कानूनी ढांचा तैयार करने की संभावना तलाशने को कहा है.
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सांकेतिक तस्वीर Photograph: (File Photo)
Supreme Court on Child Social Media Regulation: देश में सोशल मीडिया की अंधी दौड़ के बीच बच्चों की सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद गंभीर रुख अपनाया है. अदालत ने केंद्र सरकार से साफ तौर पर कहा है कि वह ऐसा पुख्ता कानूनी ढांचा तैयार करने की संभावनाओं पर काम करे, जिसके तहत तमाम सोशल मीडिया कंपनियां और डिजिटल प्लेटफॉर्म देश के कानूनों का कड़ाई से पालन करने को मजबूर हों. इस पूरी कवायद का मुख्य मकसद यह तय करना है कि 18 साल से कम उम्र का कोई भी बच्चा बिना किसी रोक-टोक और अभिभावक की जानकारी के सोशल मीडिया पर न तो अपनी मौजूदगी दर्ज करा सके और न ही किसी तरह का अकाउंट बना सके.
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की विशेष पीठ ने इस संवेदनशील मामले की सुनवाई की. अदालत ने इससे पहले दस सितंबर को गैर-सरकारी संगठन ‘जस्ट राइट्स फार चिल्ड्रन अलायंस’ की तरफ से दायर याचिका पर विचार करते हुए इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के साथ-साथ कानून एवं न्याय मंत्रालय से औपचारिक जवाब मांगा था. इस जनहित याचिका में सीधे तौर पर मांग की गई है कि नाबालिग बच्चों को डिजिटल दुनिया के खतरों से बचाने के लिए पुख्ता सुरक्षा तंत्र बने और कंपनियों को मनमानी छूट देना तुरंत बंद किया जाए.
अनुबंध और सहमति पर उठे बुनियादी सवाल
याचिकाकर्ता की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता एचएस. फुल्का ने अदालत के सामने देश के मौजूदा अनुबंध कानून की बारीकियों को रखा. उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय कानून के अनुसार किसी भी नाबालिग द्वारा किया गया कोई भी करार या अनुबंध पूरी तरह से अमान्य होता है. जब भी कोई यूजर किसी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपना खाता बनाता है, तो वह अनजाने में सेवा शर्तों के एक कानूनी अनुबंध पर सहमति देता है. ऐसे में यह साफ है कि टेक कंपनियां देश के बुनियादी नियमों का खुला उल्लंघन कर रही हैं.
वरिष्ठ अधिवक्ता ने इस बात पर जोर दिया कि अब समय आ गया है जब कंपनियों की दया पर निर्भर स्वैच्छिक दिशानिर्देशों से आगे बढ़कर ऐसे बाध्यकारी नियम बनाए जाएं, जिनका उल्लंघन करने पर कंपनियों की कानूनी जवाबदेही तय हो सके. उन्होंने मांग रखी कि 18 साल से कम उम्र के बच्चों के अकाउंट केवल तभी बनाए जाएं, जब उनके माता-पिता या कानूनी अभिभावक की स्पष्ट सहमति मौजूद हो. इसके साथ ही अभिभावक की असली पहचान की पुष्टि करने के लिए इलेक्ट्रॉनिक नो योर कस्टमर यानी ई-केवाईसी की प्रक्रिया को पूरी तरह अनिवार्य किया जाना चाहिए.
अदालत का कड़ा रुख और तकनीकी बदलाव के निर्देश
मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने बड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि बच्चों की हिफाजत से जुड़े मामले को केवल औपचारिक दिशानिर्देशों के सहारे नहीं छोड़ा जा सकता. उन्होंने केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि सरकार इस बात का अध्ययन करे कि क्या इसे सूचना प्रौद्योगिकी के मध्यस्थ नियमों के तहत एक वैधानिक और अनिवार्य प्रविधान बनाया जा सकता है. अदालत ने साफ लफ्जों में कहा कि इन कंपनियों को अपने सॉफ्टवेयर और तकनीकी ढांचे को भारत के कानूनों के अनुसार ही ढालना होगा.
जस्टिस बागची ने सॉलिसिटर जनरल से कहा कि वे कंपनियों को अपने प्लेटफॉर्म के कामकाज के तरीके में बुनियादी बदलाव करने के निर्देश जारी करने की दिशा में सोचें. जब देश का कानून किसी नाबालिग को कानूनी रूप से करार करने की इजाजत नहीं देता, तो किसी भी विदेशी या देसी कंपनी को अपनी मर्जी से 13 साल के बच्चे को खाता खोलने की अनुमति देने का कोई अधिकार नहीं है. याचिकाकर्ता के वकील ने यह भी स्पष्ट किया कि इस कदम के लिए किसी नए डाटा संरक्षण तंत्र के लागू होने का इंतजार करने की कतई जरूरत नहीं है, क्योंकि मौजूदा कानून पहले से ही नाबालिगों के साथ अनुबंध को अवैध ठहराता है.
विदेशी कंपनियों की नीतियां और भारत की जमीनी हकीकत
याचिका में सोशल मीडिया कंपनियों की दोहरी नीतियों पर गहरा एतराज जताया गया है. याचिकाकर्ता के अनुसार फेसबुक, इंस्टाग्राम और स्नैपचैट जैसे बड़े प्लेटफॉर्म महज 13 साल के बच्चों को अपनी सेवाएं इस्तेमाल करने और प्रोफाइल बनाने की छूट दे रहे हैं. यह नीति पश्चिमी देशों के हिसाब से बनाई गई हो सकती है, लेकिन भारत का कानून 18 वर्ष से कम उम्र के प्रत्येक व्यक्ति को नाबालिग का दर्जा देता है. इस तरह ये कंपनियां सीधे तौर पर भारतीय कानूनी व्यवस्था को धता बता रही हैं.
इसके अलावा याचिका में एक और गंभीर पहलू सामने रखा गया है कि इंटरनेट की दुनिया में बच्चों के यौन शोषण, उत्पीड़न और अश्लील सामग्री के प्रसार पर रोक लगाने के लिए भले ही भारत में कड़े दंडात्मक कानून मौजूद हैं, लेकिन तकनीकी मंच अपनी जिम्मेदारियों से बचते रहे हैं. वे न तो बच्चों की सही उम्र की जांच करने वाला कोई सटीक सिस्टम लगा पाए हैं और न ही नुकसानदेह सामग्री को तुरंत रोकने वाले आटोमेटेड टूल्स का सही इस्तेमाल कर रहे हैं. केंद्र सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल ने पीठ को भरोसा दिलाया है कि सरकार इस पूरे विषय को पूरी गंभीरता से लेगी और जल्द ही उचित कदम उठाएगी.
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