भारत में ऊर्जा सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा के बीच संतुलन साधने के लिए केंद्र सरकार ने एक क्रांतिकारी रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) के अनुसार, भारत अगले तीन से चार वर्षों में 'एग्रीवोल्टाइक' (Agrivoltaics यानी AgriPV) तकनीक के माध्यम से 5 गीगावाट (GW) से अधिक की अतिरिक्त सौर ऊर्जा क्षमता जोड़ सकता है। इस तकनीक का सबसे बड़ा चमत्कार यह है कि इसमें एक ही जमीन पर ऊपर सोलर पैनल्स के जरिए हरित बिजली बनाई जाती है और ठीक नीचे पारंपरिक फसलों, सब्जियों व बागवानी की खेती जारी रहती है।
देश में यूटिलिटी-स्केल बड़े सोलर पार्कों के लिए बड़े पैमाने पर उपजाऊ जमीन के अधिग्रहण से जुड़ी चिंताओं को दूर करने के लिए यह पहल गेम-चेंजर मानी जा रही है। 21 से 23 अक्टूबर को नई दिल्ली में आयोजित होने वाले उच्चस्तरीय सम्मेलन से ठीक पहले मंत्रालय ने साफ किया है कि एग्रीवोल्टाइक्स को अब प्रायोगिक (पायलट) प्रोजेक्ट्स से निकालकर बड़े पैमाने पर व्यावसायिक रोलआउट की ओर ले जाने का रोडमैप तैयार कर लिया गया है।
क्या है एग्रीवोल्टाइक (AgriPV) तकनीक: एक ही खेत से दोहरा मुनाफा
पारंपरिक सोलर प्लांट्स में जमीन की सतह के बिल्कुल करीब सोलर पैनल्स लगाए जाते हैं, जिससे वह पूरी जमीन खेती के अयोग्य हो जाती है। इसके विपरीत, एग्रीवोल्टाइक प्रणाली में सोलर पैनल्स को 2.5 से 3.5 मीटर ऊंचे स्ट्रक्चरों पर लगाया जाता है।
इन पैनल्स के बीच पर्याप्त दूरी और कोण इस तरह रखा जाता है कि जमीन पर धूप और हवा की आवाजाही सामान्य रूप से बनी रहे। किसान इन पैनल्स के नीचे ट्रैक्टर और अन्य आधुनिक कृषि यंत्रों को आसानी से चला सकते हैं। पैनल्स की हल्की छाया के कारण मिट्टी में नमी लंबे समय तक बरकरार रहती है, जिससे वाष्पीकरण (Evaporation) कम होता है और सिंचाई के पानी की 20 से 30 प्रतिशत तक बचत होती है। वहीं सोलर पैनल्स के नीचे हरियाली रहने से स्थानीय तापमान ठंडा रहता है, जिससे सोलर पैनल्स की बिजली उत्पादन दक्षता (Efficiency) भी बढ़ जाती है।
लागत 25 से 30% अधिक, गैप पाटने के लिए सरकार लाएगी नई सपोर्ट स्कीम
नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के सचिव संतोष कुमार सारंगी के मुताबिक, एग्रीवोल्टाइक प्रोजेक्ट्स में ऊंचे लोहे के स्ट्रक्चर्स और विशेष फाउंडेशन की आवश्यकता होती है। इसके चलते ये प्रोजेक्ट्स सामान्य ग्राउंड-माउंटेड सोलर प्लांट्स की तुलना में 25 से 30 प्रतिशत अधिक महंगे होते हैं।
मंत्रालय इसी अतिरिक्त लागत के अंतर (Cost Gap) को पाटने के लिए एक विशेष 'AgriPV सपोर्ट स्कीम' और व्यापक नीतिगत दस्तावेज तैयार कर रहा है। केंद्र सरकार का उद्देश्य वित्तीय प्रोत्साहन देकर राज्यों और निजी डेवलपर्स को प्रेरित करना है ताकि बड़े पैमाने पर उत्पादन होने से समय के साथ इसकी निर्माण लागत घट सके और टैरिफ वाणिज्यिक रूप से प्रतिस्पर्धी बन जाए।
बिजली कंपनियों (Discoms) के साथ समन्वय: किसानों को मिलेगा पक्का खरीदार
एग्रीवोल्टाइक प्रणाली को तेजी से जमीन पर उतारने की रफ्तार इस बात पर निर्भर करेगी कि राज्य सरकारें और उनकी बिजली वितरण कंपनियां (Discoms) किस तरह के खरीद नियम लागू करती हैं। मंत्रालय विभिन्न राज्य डिस्कॉम के साथ विस्तृत बैठकें कर रहा है ताकि एक ऐसा पारदर्शी टैरिफ ढांचा बनाया जा सके, जिससे डिस्कॉम सीधे किसानों और ग्रामीण डेवलपर्स से एग्री-सोलर बिजली की खरीद सुनिश्चित कर सकें।
पीएम-कुसुम (PM-KUSUM) योजना के तहत पहले से ही किसानों को अपने बंजर या उपजाऊ खेतों में 500 किलोवाट से 2 मेगावाट तक के छोटे सोलर प्लांट लगाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। एग्री-पीवी पॉलिसी को पीएम कुसुम के साथ एकीकृत करने से किसानों को अपनी फसल की आमदनी के साथ-साथ ग्रिड को अतिरिक्त बिजली बेचकर हर महीने एक स्थिर और गारंटीड मासिक आय हासिल होगी।
विभिन्न कृषि जलवायु क्षेत्रों के लिए फसलों का चयन और पायलट मॉडल
भारत विविधताओं वाला देश है, जहां हर राज्य की मिट्टी, धूप की तीव्रता और जलवायु अलग है। मंत्रालय विभिन्न कृषि विश्वविद्यालयों और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के साथ मिलकर अलग-अलग एग्रो-क्लाइमैटिक जोन्स के लिए मुफीद फसलों की पहचान कर रहा है।
अब तक के अध्ययनों में यह साबित हुआ है कि सोलर पैनल्स के नीचे पत्तेदार सब्जियां (जैसे पालक, मेथी, धनिया), टमाटर, मिर्च, हल्दी, अदरक और औषधीय पौधे सामान्य से अधिक पैदावार देते हैं, क्योंकि इन्हें अत्यधिक तीखी धूप की आवश्यकता नहीं होती। राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में एग्रीवोल्टाइक फार्मिंग के सफल पायलट प्रोजेक्ट्स ने यह दिखा दिया है कि किसान अपनी मुख्य आजीविका को गंवाए बिना ऊर्जा उत्पादक (Prosumer) बन सकते हैं।
2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म ऊर्जा लक्ष्य में रीढ़ बनेगा एग्री-सोलर
भारत ने वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा क्षमता हासिल करने का महत्वाकांक्षी वैश्विक संकल्प लिया है। इस लक्ष्य को पाने के लिए देश को लाखों हेक्टेयर भूमि की आवश्यकता होगी। घनी आबादी वाले देश में केवल ऊर्जा के लिए उपजाऊ कृषि भूमि को छोड़ना संभव नहीं है।
ऐसे में एग्रीवोल्टाइक तकनीक 'जमीन की दोहरी उपयोगिता' (Dual Use of Land) सुनिश्चित करके भारत के ग्रामीण परिदृश्य को हमेशा के लिए बदलने की क्षमता रखती है। अगले 3-4 वर्षों में 5 गीगावाट क्षमता का यह लक्ष्य न केवल भारत के स्वच्छ ऊर्जा क्रांति को नई गति देगा, बल्कि देश के अन्नदाता को वास्तव में 'ऊर्जादाता' बनाकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को आर्थिक स्वावलंबन की नई ऊंचाइयों पर पहुंचाएगा।