The Bonus Market Update: शेयर बाजार में सुस्ती, वैश्विक तनाव व महंगे क्रूड ने सेंसेक्स-निफ्टी पर बढ़ाया दबाव

Published on 21 जुल॰ 2026

पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के बीच घरेलू शेयर बाजारों की शुरुआत फ्लैट रही है। आज सुबह सेंसेक्स और निफ्टी में कोई बड़ा उतार-चढ़ाव देखने को नहीं मिला। वैश्विक संकेतों और विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) की लगातार बिकवाली के कारण विशेषज्ञ बाजार के सीमित दायरे में रहने की उम्मीद जता रहे हैं। कॉरपोरेट नतीजों के सीजन के बीच चुनिंदा शेयरों में तेज एक्शन देखने को मिल सकता है।

बाजार की शुरुआत कैसी रही और प्रमुख सूचकांकों का क्या हाल है?

तीस शेयरों वाला बीएसई सेंसेक्स शुरुआती कारोबार में 58.89 अंक गिरकर 77,649.63 पर आ गया। पचास शेयरों वाला एनएसई निफ्टी 22.45 अंक फिसलकर 24,216.05 पर पहुंच गया।

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बाजार में गिरावट के बीच किन शेयरों में सबसे बड़ी सुस्ती देखी जा रही है?

सेंसेक्स के शेयरों में, एचडीएफसी बैंक, रिलायंस इंडस्ट्रीज, एक्सिस बैंक, सन फार्मा और मारुति जैसे शेयर नुकसान में रहे। एचडीएफसी बैंक लगातार दूसरे दिन गिरा, क्योंकि ऋणदाता की तिमाही आय मार्जिन के मोर्चे पर उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी। वहीं, टेक महिंद्रा, अल्ट्राटेक सीमेंट, एशियन पेंट्स और एचसीएल टेक जैसे शेयर लाभ में रहे।

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एक्सचेंज के आंकड़ों के अनुसार, विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) ने सोमवार, 20 जुलाई 2026 को भारतीय इक्विटी से 1,121.04 करोड़ रुपये की निकासी की। वैश्विक तेल बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड 0.63 फीसदी कम होकर 88.66 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था।

बाजार की सुस्त चाल के पीछे कौन से बड़े वैश्विक और घरेलू कारण हैं?

बाजार विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में शेयर बाजार एक मिश्रित झुकाव के साथ सीमित दायरे में ही घूमता नजर आएगा। इसके पीछे ये मुख्य कारण जिम्मेदार हैं:

  • भू-राजनीतिक तनाव: पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने निवेशकों को सतर्क कर दिया है।
  • कच्चा तेल: ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें प्रति बैरल 88 डॉलर के पार बनी हुई हैं, जिससे चिंता बढ़ी है।
  • कमजोर रुपया: डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये में कमजोरी लगातार बनी हुई है और यह प्रति डॉलर 96 रुपये के आसपास कारोबार कर रहा है।
  • एफआईआई की बिकवाली: विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) भारतीय बाजार से लगातार अपनी पूंजी निकाल रहे हैं।
  • कमजोर वैश्विक संकेत: दुनिया भर के बाजारों से मिल रहे संकेत काफी मिले-जुले और सुस्त हैं।

एशिया से लेकर अमेरिका और यूरोप के बाजारों का क्या रुख है?

ग्लोबल मार्केट की बात करें तो अलग-अलग देशों से मिले-जुले रुझान देखने को मिल रहे हैं:

  • अमेरिकी बाजार: यूएस में एसएंडपी 500 फ्यूचर्स में टोक्यो समय के अनुसार सुबह 11:58 बजे तक 0.2 प्रतिशत की बढ़त देखी गई।
  • जापानी बाजार: जापान का टॉपिक्स सूचकांक 1.8 प्रतिशत की मजबूत बढ़त के साथ कारोबार कर रहा है।
  • ऑस्ट्रेलिया और चीन: ऑस्ट्रेलिया के S&P/ASX 200 में 0.1 प्रतिशत और हांगकांग के हैंगसेंग (Hang Seng) में 0.6 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। वहीं, चीन का शंघाई कंपोजिट 0.2 प्रतिशत की बढ़त के साथ कारोबार कर रहा है।
  • यूरोपीय बाजार: यूरो स्टॉक्स 50 फ्यूचर्स में 0.4 प्रतिशत की कमजोरी दर्ज की गई है।

कच्चे तेल की कीमतों का बाजार पर क्या असर होगा?

जियोजित इन्वेस्टमेंट्स लिमिटेड के मुख्य निवेश रणनीतिकार वीके विजयकुमार ने कहा कि निकट भविष्य में बाजार कच्चे तेल की कीमतों के रुझानों से काफी प्रभावित होगा। उन्होंने बताया कि ब्रेंट क्रूड का करीब 88 अमेरिकी डॉलर के स्तर तक नरम होना एक सकारात्मक संकेत है। हालांकि, अनिश्चितता इतनी अधिक है कि कच्चे तेल की कीमत में वृद्धि का जोखिम बना हुआ है। विजयकुमार के अनुसार, कच्चे तेल की कीमतों में संभावित वृद्धि बाजारों पर अतिरिक्त दबाव डालेगी। यह स्थिति निवेशकों की धारणा को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकती है।

निवेशकों की इक्विटी में रुचि क्यों कम हुई?

एनरिच मनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी पोनमुडी आर ने बताया कि बाहरी चुनौतियों के संयोजन ने जोखिम से बचने की भावना को मजबूत किया है। इस कारण निवेशकों की इक्विटी में निवेश की भूख सीमित हो गई है। सोमवार, 20 जुलाई 2026 को सेंसेक्स 442.93 अंक या 0.57 फीसदी गिरकर 77,708.52 पर बंद हुआ था। निफ्टी 95.80 अंक या 0.39 फीसदी गिरकर 24,238.50 पर समाप्त हुआ था। यह गिरावट बाहरी कारकों के प्रभाव को दर्शाती है।

बाजार के लिए आगे का क्या दृष्टिकोण है?

चूंकि चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही (Q1) के कॉरपोरेट नतीजों का सीजन धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ रहा है, इसलिए बाजार में अब इंडेक्स से ज्यादा स्टॉक-स्पेसिफिक एक्शन यानी चुनिंदा शेयरों में बड़ी हलचल देखने को मिलेगी। विश्लेषकों का मानना है कि जब तक ग्लोबल फ्रंट पर स्थितियां सामान्य नहीं होतीं और रुपये की कमजोरी दूर नहीं होती, तब तक व्यापक बाजार में एक सीमित रेंज के भीतर ही उतार-चढ़ाव होने की संभावना सबसे अधिक है।