ओटीटी प्लेटफॉर्म पर हिंदी हार्टलैंड की रूटेड कहानियों से अपनेपन का एहसास कराने वाली प्रोडक्शन कंपनी टीवीएफ ने आज सिनेमाघरों में रिलीज हुई ‘द वन’ से फिल्मों की मेकिंग में भी कदम रख दिया है. निर्मात्री एकता कपूर के साथ सह-निर्मित टीवीएफ की यह फिल्म लोककथा, फैंटेसी, हॉरर और आस्था के मेल से बनी है. क्या यह जुगलबंदी पर्दे पर एंटरटेन करने में कामयाब होती है या फिर बेअसर रह जाती है, जानने के लिए पढ़ें रिव्यू.
| फिल्म | द वन |
| डायरेक्टर | दीपक मिश्रा |
| कास्ट | सिद्धार्थ मल्होत्रा, तमन्ना भाटिया, सुनील ग्रोवर, श्वेता त्रिपाठी, अनूप सोनी, मनीष पॉल |
| रेटिंग: | ⭐⭐/5 |
ये है कहानी
फिल्म की कहानी की बात करें तो यह बिहार के बिहटा स्थित वन देवी मंदिर से प्रेरित है, जिसके बारे में कई किस्से और कहानियां मशहूर हैं. हालांकि, फिल्म में कहानी को बिहार में नहीं, बल्कि देवांचल नाम की एक काल्पनिक जगह में स्थापित किया गया है.
कहानी की शुरुआत सातवीं शताब्दी से होती है. देवांचल के राजा विक्रमादित्य की गर्भवती पत्नी की तबीयत बेहद खराब है. वैद्य राजा को बताता है कि अब वन देवी ही उसकी पत्नी की रक्षा कर सकती हैं, लेकिन रात में जंगल में प्रवेश करना वर्जित है. राजा आंखों पर पट्टी बांधकर वन देवी के मंदिर पहुंचता है, लेकिन तभी देवी का शेर आ जाता है और कहानी सीधे 2026 के मुंबई में पहुंच जाती है.
ऋषि (सिद्धार्थ मल्होत्रा) और ममता (तमन्ना भाटिया) एक-दूसरे के साथ बेहद खुश हैं. उनके जीवन में बस एक कमी है कि उनकी अपनी कोई संतान नहीं है. इसी वजह से ऋषि भगवान और आस्था से दूर हो चुका है. वहीं, उसकी पत्नी ममता छठ पर देवांचल जाना चाहती है, लेकिन ऋषि वहां जाने के लिए तैयार नहीं है.
हालात कुछ ऐसे बनते हैं कि ऋषि को देवांचल जाना पड़ता है. वहां विकास के नाम पर युवा नेता दीपक (सुनील ग्रोवर) वन देवी के मंदिर को तोड़ना चाहता है, ताकि शहर तक रास्ता बनाया जा सके. गांव वाले इसके लिए तैयार नहीं हैं. उन्हें डर है कि मंदिर तोड़ने पर देवी का प्रकोप पूरे गांव पर पड़ेगा.
ऋषि गांववालों और अपने परिवार के खिलाफ जाकर दीपक का समर्थन करता है. क्या वन देवी का मंदिर टूटने से देवी का प्रकोप आएगा या जंगल में मौजूद बुरी शक्तियां आजाद हो जाएंगी? सातवीं शताब्दी की कहानी और मौजूदा समय का ऋषि से क्या कनेक्शन है? क्या ऋषि एक बार फिर देवी पर अपनी आस्था कायम कर पाएगा? इन्हीं सवालों के जवाब फिल्म आगे देती है.
औसत है फिल्म का ट्रीटमेंट
‘तुम्बाड’, ‘स्त्री’ और ‘कांतारा’ जैसी फिल्मों ने भारतीय लोककथाओं की जमीन को मजबूती दी है. टीवीएफ की यह फिल्म भी बिहार की वन देवी की कहानी से प्रेरित है, जिससे महापर्व छठ की आस्था भी जुड़ी हुई है.
टीवीएफ के लिए इस बार कैनवास बड़ा था. फैंटेसी और लोककथा की वजह से मेकर्स के पास अपनी कल्पना को एक अलग स्तर पर ले जाने का पूरा मौका था, लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले फिल्म को यादगार स्तर तक पहुंचने नहीं देता. यह आखिरकार औसत एंटरटेनमेंट तक ही सीमित रह जाती है.
फिल्म का पहला भाग कहानी को स्थापित करने में ही काफी समय लेता है. वहीं, सेकेंड हाफ में वन देवी, बाघ और बुरी शक्तियां एक के बाद एक कहानी में आती जाती हैं. नतीजा यह होता है कि कई चीजें जल्दबाजी में समेटी हुई लगती हैं.
फिल्म का हॉरर एलिमेंट भी ट्रेलर से आगे नहीं बढ़ता. फिल्म डराने में खास कामयाब नहीं होती. ट्रीटमेंट की एक और बड़ी दिक्कत इसका लगातार बदलता टोन है. एक दृश्य में फिल्म रहस्य और रोमांच बढ़ाती है, लेकिन अगले ही पल मनीष पॉल और सुलभा आर्य का कॉमेडी ट्रैक शुरू हो जाता है. इससे कहानी का माहौल बार-बार टूटता है.
फिल्म में थोड़े-थोड़े अंतराल पर गाने भी आते रहते हैं, जो कहानी में खास योगदान नहीं देते. वीएफएक्स भी औसत ही है.
भव्यता के साथ फिल्माया गया है छठ पूजा
छठ पूजा पावन आस्था का पर्व है. बिहारियों और पूर्वांचल के लोगों के लिए इसमें गलती की कोई गुंजाइश नहीं होती. ऐसे में फिल्म के छठ पूजा सीक्वेंस में खामियां नजर आना लाजिमी है. लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि लोकआस्था के इस पर्व को पहली बार किसी हिंदी फिल्म में इतने बड़े स्तर पर जगह मिली है.
इसके लिए अरुणाभ, दीपक मिश्रा और एकता कपूर बधाई के पात्र हैं. फिल्म में छठ पूजा को भव्यता के साथ फिल्माया गया है.
छठ पूजा शारदा सिन्हा के गीतों के बिना अधूरी सी लगती है. फिल्म के मेकर्स भी इस बात से परिचित थे. यही वजह है कि शारदा सिन्हा के छठ गीत का 60 सेकेंड के मोंटाज में जिस तरह इस्तेमाल किया गया है, वह पर्दे पर इस बात को स्थापित करने के लिए काफी है कि यह छठ का ही माहौल है.
‘अयि गिरि नन्दिनी’ हटा दिया गया है फिल्म से
फिल्म रिलीज से पहले उस वक्त विवादों में फंस गई थी, जब सिंगर सरगम वैश ने आरोप लगाया था कि उनकी इजाजत के बिना फिल्म में ‘अयि गिरि नन्दिनी स्तोत्रम’ के उनके वर्जन का इस्तेमाल किया गया है, जिस पर उन्होंने पिछले तीन साल तक काम किया था.
सरगम वैश ने सोशल मीडिया पर इसे फिल्म से हटाने की अपील की थी. उन्होंने यह भी कहा था कि ऐसा नहीं होने पर वह कानूनी प्रक्रिया का सहारा लेंगी.
फिल्म अब रिलीज हो चुकी है और इसमें वह पूरा स्तोत्र सुनाई नहीं देता. क्लाइमेक्स के फाइटिंग सीक्वेंस में सिर्फ ‘अयि गिरि नन्दिनी’ शब्द सुनाई पड़ते हैं. फिल्म में पूरे स्तोत्र का इस्तेमाल नहीं किया गया है.
हार्टलैंड की खुशबू है मिसिंग
‘द वन’ के साथ ओटीटी प्लेटफॉर्म की मशहूर प्रोडक्शन कंपनी टीवीएफ फिल्मों में अपनी शुरुआत कर रही है. टीवीएफ का नाम ‘कोटा फैक्ट्री’, ‘पंचायत’ और ‘एस्पिरेंट्स’ जैसे आइकॉनिक शोज से जुड़ा रहा है. टीवीएफ हमेशा से हिंदी हार्टलैंड की कहानियां लेकर आता रहा है. यही वजह है कि ‘द वन’ से भी एक खास तरह की रूटेडनेस की उम्मीद थी.
हार्टलैंड की कहानियों को जिस तैयारी और बारीकी के साथ टीवीएफ ओटीटी पर कहता है, वह ‘द वन’ के रुपहले पर्दे पर मिसिंग है. हार्टलैंड की जो मिट्टी की खुशबू होती है, वह फिल्म के किरदारों ने पूरी तरह आत्मसात नहीं की है. अभिनेत्री श्वेता तिवारी ही इस माहौल के सबसे करीब नजर आती हैं.
कलाकारों का सधा हुआ अभिनय
अभिनय की बात करें तो यह सिद्धार्थ मल्होत्रा की फिल्म है, लेकिन पर्दे पर वह अपने उसी अर्बन लुक और अंदाज में नजर आते हैं, जिसमें उन्हें अब तक कई फिल्मों में देखा गया है. उनका किरदार देवांचल में रहता था और छह साल पहले ही मुंबई शिफ्ट हुआ है, लेकिन उनके लुक और बोलचाल से यह बात कहीं से महसूस नहीं होती.
हालांकि, अभिनय की बात करें तो सिद्धार्थ अपनी भूमिका के साथ न्याय करते हैं. खासकर एक्शन दृश्यों में वह प्रभावी रहे हैं.
तमन्ना भाटिया स्क्रीन पर खूबसूरत दिखी हैं, लेकिन फिल्म में उनके किरदार को ज्यादा कुछ करने का मौका नहीं मिला है. सुनील ग्रोवर फिल्म में अपनी लोकप्रिय इमेज से अलग नजर आए हैं.
श्वेता तिवारी और अनूप सोनी का अभिनय रूटेड है. वहीं, मनीष पॉल और सुलभा आर्य फिल्म में कॉमेडी रिलीफ जोड़ने में कामयाब रहे हैं.