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UNGA81: जनरल डिबेट के तीसरे दिन पर एक नज़र
25 सितम्बर 2026 यूएन मामले
संयुक्त राष्ट्र महासभा की उच्चस्तरीय जनरल डिबेट के तीसरे दिन इसराइली और फ़लस्तीनी नेताओं ने मध्य पूर्व में जारी युद्ध पर अलग-अलग दृष्टिकोण पेश किए. वहीं, दुनिया भर के नेताओं ने ग़ाज़ा और क़ाबिज़ पश्चिमी तट में जारी संकट के दूरगामी प्रभावों पर चिन्ता जताई. चौथे दिन की शुरुआत से पहले, गुरुवार को महासभा में उठे प्रमुख मुद्दों पर एक नज़र.
यह क्यों अहम है: महासभा की जनरल डिबेट के तीसरे दिन इसराइल-फ़लस्तीन युद्ध प्रमुख मुद्दा रहा. नेताओं ने चेतावनी दी कि इसका असर वैश्विक खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा पर भी पड़ रहा है.
- फ़लस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने अपने प्रतिनिधिमंडल को वीज़ा नहीं मिलने के कारण पहले से रिकॉर्ड किए गए वीडियो सन्देश के ज़रिये महासभा को सम्बोधित किया. उन्होंने चेतावनी दी कि युद्ध से “फ़लस्तीनी लोगों का अस्तित्व ख़तरे में है.”
- इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतनयाहू ने क़ाबिज़ पश्चिमी तट में इसराइली बस्तियों के बाशिन्दों का बचाव किया. उन्होंने कहा कि 7 अक्टूबर 2023 को हमास के नेतृत्व में हुए आतंकवादी हमलों के बाद इसराइल को जवाबी कार्रवाई के लिए मजबूर होना पड़ा.
अलग-अलग बयानों में गहरे मतभेद
क्या कहा गया: इसराइली और फ़लस्तीनी नेताओं ने युद्ध और उसके कारणों को लेकर बिल्कुल विपरीत दृष्टिकोण पेश किए.
- महमूद अब्बास ने ग़ाज़ा में जारी युद्ध को “जनसंहारक युद्ध” बताते हुए कहा कि इससे अभूतपूर्व मानवीय त्रासदी पैदा हुई है.
- उन्होंने ग़ाज़ा पट्टी और क़ाबिज़ पश्चिमी तट को फिर से एकजुट करने की अपील की. साथ ही, 1948 के अरब-इसराइल युद्ध के दौरान फ़लस्तीनियों के व्यापक स्थाई विस्थापन का ज़िक्र करते हुए ‘एक और नकबा’ नहीं होने देने की अपील की.
- बिन्यामिन नेतनयाहू ने अन्तरराष्ट्रीय मीडिया और सोशल मीडिया पर फ़लस्तीनियों के हमलों की अनदेखी करने का आरोप लगाया और इसराइली बस्तियों के बाशिन्दों पर लगे हिंसा के आरोपों को ख़ारिज किया.
- उन्होंने ईरान के परमाणु केन्द्रों पर इसराइली हमलों का भी बचाव करते हुए इन्हें देश के अस्तित्व के लिए ज़रूरी बताया.
खाद्य और ऊर्जा संकट का बढ़ता असर
व्यापक तस्वीर: अन्य देशों के नेताओं ने चेतावनी दी कि युद्ध का असर अब इसराइल और फ़लस्तीन तक सीमित नहीं रहा है.
- कोमोरोस के राष्ट्रपति अज़ाली असूमानी ने कहा कि होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में आवाजाही ठप होने और सीरिया व लेबनान में जारी लड़ाई से आयात पर निर्भर देशों की खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा ख़तरे में है.
- पुर्तगाल के प्रधानमंत्री लुइस मोंटेनेग्रो ने पड़ोसी देशों, व्यापारिक जहाज़ों और नागरिक बुनियादी ढाँचे पर हमले रोकने तथा होर्मुज़ जलडमरूमध्य की नाकेबन्दी समाप्त करने की अपील की.
- उन्होंने कहा कि ऊर्जा और ईंधन संकट से “हर कोई प्रभावित हो रहा है” और इसके असर को कम करने के लिए तत्काल कार्रवाई ज़रूरी है.
- घाना के राष्ट्रपति जॉन महामा ने हमास के सभी आतंकवादी कृत्यों की निन्दा करते हुए अन्तरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की कि वह ग़ाज़ा में मानवीय क्षति की गम्भीरता को गोलमोल कूटनैतिक भाषा की आड़ में छिपाना बन्द करे.
बहुपक्षवाद की विश्वसनीयता पर सवाल
मौजूदा स्थिति: विश्व नेताओं ने बढ़ते युद्ध और हिंसक टकरावों को अन्तरराष्ट्रीय नियमों और संस्थाओं के कमज़ोर पड़ने से जोड़कर देखा.
- गुयाना के राष्ट्रपति मोहम्मद इरफ़ान अली ने बहुपक्षवाद के कमज़ोर पड़ने को दुनिया के सबसे चिन्ताजनक संकटों में से एक बताया. हालाँकि, उन्होंने कहा कि कूटनीति के ज़रिये अब भी हथियारों को ख़ामोश किया जा सकता है.
- गाम्बिया के उपराष्ट्रपति मुहम्मद जालो ने कहा कि बहुपक्षवाद का अर्थ हर मुद्दे पर सहमति नहीं, बल्कि एक-दूसरे की बात सुनना, बातचीत करना और समझौते के लिए तैयार रहना है.
- बारबेडॉस की प्रधानमंत्री मिया मोटले ने चेतावनी दी कि न्यायसंगत और नियम-आधारित अन्तरराष्ट्रीय व्यवस्था के बिना छोटे देशों का “अस्तित्व ख़त्म हो सकता है”.
- उरुग्वे के राष्ट्रपति यामान्दू ओर्सी ने आपसी भरोसा बहाल करने और मौजूदा चुनौतियों से निपटने में सक्षम संयुक्त राष्ट्र को मज़बूत बनाने की अपील की.
मध्यम शक्ति वाले देशों से नेतृत्व की अपील
आगे की राह: बड़ी शक्तियों के बहुपक्षीय प्रतिबद्धताओं से पीछे हटने के बीच, कई नेताओं ने ज़ोर दिया कि मध्यम शक्ति वाले देशों को वैश्विक शासन व्यवस्था में बड़ी भूमिका निभानी चाहिए.
- नीदरलैंड्स के प्रधानमंत्री रॉब येटन ने अन्तरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय को कमज़ोर करने के प्रयासों की निन्दा की और मध्यम शक्ति वाले देशों से मानवाधिकारों व जलवायु कार्रवाई में सहयोग का नेतृत्व करने की अपील की.
- ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज़ ने कहा कि उनका देश वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए अन्य देशों के साथ मिलकर नए समाधान तलाश रहा है.
- उन्होंने कहा कि 2029-2030 के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अस्थाई सदस्यता हासिल करने की ऑस्ट्रेलिया की कोशिश का उद्देश्य, छोटे व मध्यम आकार के देशों की आवाज़ को मज़बूत करना है.
- व्यापक सन्देश: अन्तरराष्ट्रीय सहयोग में भरोसा बहाल करने के लिए सिद्धान्तों पर क़ायम रहना, संस्थाओं को मज़बूत बनाना और कूटनैतिक नेतृत्व को नई ऊर्जा देना ज़रूरी है.
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