उत्तर प्रदेश में स्कूल यूनिफॉर्म के साथ हिजाब पहनने को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद सियासी बयानबाजी तेज हो गई है। हाईकोर्ट ने प्रयागराज की एक छात्रा की याचिका खारिज करते हुए कहा कि हिजाब पहनना धर्म का ऐसा अनिवार्य हिस्सा नहीं है, जिसके बिना आस्था खतरे में पड़ जाए। इस फैसले पर बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती ने संयम बरतने और मुद्दे को कोर्ट ले जाने के बजाय आपसी बातचीत से सुलझाने की नसीहत दी है।
एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने कोर्ट के आदेश पर कड़ी असहमति जताते हुए इसे संविधान प्रदत्त अधिकारों और 'इस्लाम पर सीधा हमला' करार दिया है।
- Published: 26 Aug 2026, 11:35 AM IST
- Last Updated: 26 Aug 2026, 11:35 AM IST
उत्तर प्रदेश के स्कूलों में ड्रेस कोड और हिजाब के इस्तेमाल को लेकर एक बार फिर राजनीतिक और कानूनी बहस तेज हो गई है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने प्रयागराज के एक निजी स्कूल की छात्रा द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया।
याचिका में स्कूल यूनिफॉर्म के साथ अतिरिक्त तौर पर हिजाब पहनने की अनुमति मांगी गई थी। कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि छात्रा यह साबित करने में असफल रही कि हिजाब पहनना इस्लाम का ऐसा अभिन्न या अनिवार्य अंग है, जिसकी अनुपस्थिति में धर्म का पालन असंभव हो जाए।
मायावती की नसीहत, कोर्ट जाने के बजाय मिल-बैठकर निकालें समाधान
हाईकोर्ट के फैसले के बाद बसपा प्रमुख मायावती ने सोशल मीडिया पर अपनी विस्तृत प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने देश को एक ऐसा सेक्युलर और कल्याणकारी संविधान दिया है जो हर जाति व धर्म को बराबरी का अधिकार देता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि महिलाओं की गरिमा, पर्दे और धार्मिक परंपराओं को संवेदनशीलता से देखा जाना चाहिए।
स्कूल यूनिफॉर्म, चादर या हिजाब जैसे मामलों को अनावश्यक तूल देकर अदालतों में खींचने के बजाय स्कूल प्रबंधन, अभिभावकों और स्थानीय प्रशासन को आपसी समझबूझ से हल करना चाहिए ताकि कोई भी इसका राजनीतिक लाभ न उठा सके।
ओवैसी ने फैसले पर उठाए सवाल, बताया मौलिक अधिकारों का हनन
दूसरी ओर, हैदराबाद के दारुस्सलाम में आयोजित जलसा-ए-रहमतुल-लिल-आलमीन कार्यक्रम को संबोधित करते हुए एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्णय पर कड़ा एतराज जताया। उन्होंने कहा कि यह फैसला संविधान के अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) का सीधा उल्लंघन है।
ओवैसी ने सवाल किया कि इस्लाम में क्या जरूरी है और क्या नहीं, यह तय करने का अधिकार न्यायपालिका के पास कैसे हो सकता है। उन्होंने कहा कि छात्राएं हिजाब अपने सिर पर पहनती हैं, दिमाग पर नहीं, और ऐसे फैसलों से मुस्लिम बेटियों की शिक्षा पर नकारात्मक असर पड़ेगा।
सुप्रीम कोर्ट में लंबित सबरीमाला मामले का दिया हवाला
ओवैसी ने अपनी दलील में यह भी रेखांकित किया कि धार्मिक अनिवार्यता का विषय पहले से ही सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की बड़ी संविधान पीठ के विचाराधीन है। ऐसे में हाईकोर्ट को इस तरह का निष्कर्ष नहीं देना चाहिए था। उन्होंने उत्तर प्रदेश में मुस्लिम छात्राओं के हाईस्कूल नामांकन दर का हवाला देते हुए आशंका जताई कि इस तरह की पाबंदियों से लड़कियों का स्कूल जाना और अधिक प्रभावित हो सकता है।
हाईकोर्ट ने तस्वीरों और तथ्यों के आधार पर सुनाया फैसला
उल्लेखनीय है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान स्कूल द्वारा प्रस्तुत रिकॉर्ड और तस्वीरों का संज्ञान लिया था। अदालत ने पाया था कि उसी समुदाय की अन्य छात्राएं निर्धारित स्कूल यूनिफॉर्म में बिना हिजाब के भी कक्षाओं में उपस्थित हो रही हैं। अदालत ने माना कि किसी भी शैक्षणिक संस्थान के निर्धारित अनुशासन और ड्रेस कोड में व्यक्तिगत प्राथमिकताओं के आधार पर बदलाव की मांग को वैधानिक अधिकार नहीं माना जा सकता, जिसके बाद याचिका को खारिज कर दिया गया।