VIP वोटर्स कौन होते हैं? दिल्ली में चुनाव आयोग के बयान पर घमासान

Published on 21 सित॰ 2026

VIP वोटर्स कौन होते हैं? दिल्ली में चुनाव आयोग के बयान पर घमासान

VIP वोटर्स कौन? Image Credit source: getty image

दिल्ली की वोटर लिस्ट में चल रही विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR ने अब एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है- आखिर मतदाता सूची में नाम होना कितना सुरक्षित है? रिपोर्ट के मुताबिक, 21 सितंबर 2026 तक, दिल्ली में SIR से पहले करीब 1.45 करोड़ मतदाता थे. इनमें से 47.6 लाख नामों को हटाया जा चुका है, जबकि 31.6 लाख अन्य मतदाताओं को नोटिस भेजकर उनकी पहचान और दिल्ली में वोट देने के अधिकार से जुड़े दस्तावेज मांगे गए हैं.

रिपोर्ट के आंकड़ों के मुताबिक, कुल 79.2 लाख यानी करीब 54.6% मतदाता ऐसे हैं, जिनका नाम या तो हट चुका है या जिन पर अभी सवाल खड़ा किया गया है. नोटिस पाने वालों को 29 अक्टूबर तक अपनी स्थिति साबित करनी है. इसी बीच VIP voters की पुरानी चुनावी व्यवस्था भी चर्चा में है. गुजरात में 2012 और कर्नाटक में 2024 के चुनावों के दौरान ऐसी अलग लिस्ट का इस्तेमाल किया गया था. लेकिन, यहां एक अहम फर्क समझना जरूरी है- VIP सूची का मतलब मतदान केंद्र पर VIP सुविधा मिलना नहीं है.

बड़ी संख्या में नाम हटे हैं

दिल्ली के SIR को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा इसलिए हो रही है क्योंकि मतदाता सूची से नाम हटना सिर्फ वोट देने का अधिकार प्रभावित करने तक सीमित नहीं रह सकता. रिपोर्ट में बताया गया है कि पड़ताल में ऐसे इलाकों का जिक्र है जहां घर टूटने या लोगों के दूसरी जगह चले जाने के बाद बड़ी संख्या में नाम हटे. रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली के 14,947 मतदान केंद्रों में सिर्फ 51 बूथ ऐसे थे जहां हटाए गए मतदाताओं की संख्या 2% की सीमा के भीतर थी, जबकि 639 बूथों पर आधे से ज्यादा मतदाताओं के नाम हटे.

VIP वोटर्स को लेकर क्या है विवाद?

दिल्ली CEO कार्यालय ने 20 सितंबर को कहा कि VIP/marked electors को भेजा गया नोटिस केवल रिकॉर्ड में गड़बड़ी या पुराने SIR के रिकॉर्ड से लिंक न होने की वजह से है. लेकिन इसी बयान में VIP/marked electors शब्द के इस्तेमाल ने राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने सवाल उठाया कि क्या SIR में अब VIP मतदाताओं और सामान्य मतदाताओं के लिए अलग व्यवस्था है. उन्होंने आरोप लगाया कि आम मतदाताओं के लिए प्रक्रिया कठिन है, जबकि बड़े लोगों के मामले में चुनाव आयोग अलग से प्रेस रिलीज जारी कर रहा है.

इस पूरे मामले में क्या-क्या हो रहा है?

  • 47.6 लाख वोटर ड्राफ्ट रोल में हटाए गए हैं.
  • 31.6 लाख वोटरों को नोटिस देकर अपनी पहचान और वोट के अधिकार से जुड़े दस्तावेज देने को कहा गया है.
  • कुल मिलाकर 79.2 लाख यानी 54.6% मतदाता हटाए गए या जांच के दायरे में बताए गए हैं.
  • नोटिस पाने वालों के पास अपनी स्थिति साबित करने के लिए 29 अक्टूबर तक का समय है.
  • दूसरी तरफ चुनावी व्यवस्था में VIP electors की अलग निगरानी पहले से इस्तेमाल होती रही है.
  • VIP का मतलब अलग मतदान अधिकार या कतार से छूट नहीं है.

VIP वोटर कौन होते हैं?

VIP वोटर शब्द सुनकर ऐसा लग सकता है कि चुनाव आयोग ने कुछ लोगों को आम मतदाताओं से अलग कोई विशेष दर्जा दिया है. लेकिन उपलब्ध चुनावी रिकॉर्ड और अधिकारियों के बयानों के मुताबिक ऐसा नहीं है. 2012 में गुजरात के मुख्य निर्वाचन कार्यालय ने VIP मतदाताओं की अलग सूची को अपडेट करने के लिए दिशानिर्देश जारी किए थे. इसमें मौजूदा और पूर्व MP, MLA, हाई कोर्ट के जज, IAS, IPS, दूसरे प्रशासनिक अधिकारी, जिला और तालुका स्तर के अधिकारी, स्थानीय निकायों के पदाधिकारी, मजिस्ट्रेट, प्रमुख उद्योगपति और प्रतिष्ठित NGO के पदाधिकारी शामिल किए गए थे.

Press note to various print and social media reports on issuance of notices to VIP/marked electors.#sir2026 #sirdelhi @ECISVEEP pic.twitter.com/AhQ0MiF57q

— CEO, Delhi Office (@CeodelhiOffice) September 20, 2026

VIP लिस्ट क्यों बनाई जाती है?

इसका मुख्य उद्देश्य ऐसे प्रमुख लोगों के नामों को मतदाता सूची में अलग से ट्रैक करना बताया गया है. यानी अगर उनका नाम हटाना हो, किसी दूसरे पते पर ट्रांसफर करना हो या नई एंट्री करनी हो तो चुनाव अधिकारी उनकी जानकारी की अतिरिक्त जांच करते हैं. 2024 में कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) मनोज कुमार मीना ने इसके बारे में कहा था कि “ये वे प्रमुख मतदाता हैं जो सेवा में व्यस्त हैं. इनमें विधायक, सांसद, आईएएस, आईपीएस अधिकारी आदि शामिल हो सकते हैं.”

VIP को मतदान में कोई खास सुविधा नहीं

यहां सबसे जरूरी बात यही है. VIP मतदाता को पोलिंग बूथ पर आम वोटर से अलग सुविधा नहीं मिलती. कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के मुताबिक ऐसे मतदाताओं को कतार से बाहर जाने या किसी दूसरे तरह का खास सुविधा देने का प्रावधान नहीं है. यानी कोई सांसद, अधिकारी या बड़ी हस्ती मतदान करने पहुंचे तो सिर्फ VIP सूची में नाम होने की वजह से वह आम मतदाता को मिलने वाली प्रक्रिया से अलग नहीं हो जाता.

फिर सवाल उठता है कि इनके नाम पर ज्यादा निगरानी क्यों? अधिकारियों की दलील है कि अगर किसी प्रमुख व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से छूट जाए तो मामला सार्वजनिक चर्चा का विषय बन सकता है. इसलिए उनके नामों को सूची में बनाए रखने और रिकॉर्ड को सही रखने के लिए अतिरिक्त निगरानी की जाती है.

VIP सूची को लेकर सवाल क्यों उठ रहे हैं?

इलेक्शन कमीशन की ओर से बताया गया कि “लॉजिकल गड़बड़ी का पता लगाने वाला सॉफ्टवेयर एग्नोस्टिक है और VIP और आम आदमी में फर्क नहीं करता.” कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने चुनाव आयोग पर हमला बोला है. मल्लिकार्जुन खरगे ने चुनाव आयोग की ओर से जारी बयान में VIP/marked electors शब्द के इस्तेमाल पर सवाल उठाया.

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उन्होंने पूछा कि क्या अब देश की वयस्क मताधिकार व्यवस्था में VIP वोटर और आम वोटर की अलग श्रेणी बन गई है? खरगे ने सवाल किया कि क्या यह संविधान के One Person, One Vote, One Value के सिद्धांत के खिलाफ नहीं है और क्या VIP वोट ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है.

किन बड़े नामों को नोटिस मिला?

नोटिस पाने वाले प्रमुख लोगों में पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, विदेश मंत्री एस जयशंकर, पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, नई दिल्ली की सांसद बांसुरी स्वराज समेत कई प्रमुख नेता और अधिकारी शामिल हैं.

अंकिता पाण्डेय

अंकिता पाण्डेय

शिव की नगरी काशी से अपने करियर की शुरुआत करने वाली अंकिता पाण्डेय ने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से पत्रकारिता में अपनी मास्टर्स की डिग्री पूरी की है.  पत्रकारिता में आने के लिए उन्होंने बनारस के लोकल न्यूज पेपर "काशीवार्ता" से अपनी शुरुआत की, बाद में दिल्ली जैसे महानगरी का रुख करते हुए उन्होंने TV9 भारतवर्ष में अक्टूबर साल 2023 से जुड़ी. आज वह इस ऑर्गनाइजेशन में बतौर सब-एडिटर काम कर रही हैं. क्राइम, एंटरटेनमेंट और अन्य सभी को न्यूज के साथ विजुअल तरीके से पेश करने में रुचि है. पत्रकारिता के अलावा कविताएं लिखना, फोटोग्राफी करना और म्यूजिक का भी शौक रखती हैं.

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