रांची54 मिनट पहले
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झारखंड हाईकोर्ट ने कहा- नियोक्ता मुआवजा देने की जिम्मेदारी से बच नहीं सकता
झारखंड हाईकोर्ट ने कार्यस्थल दुर्घटना में जान गंवाने वाले मजदूर की विधवा को बड़ी राहत दी है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम एक कल्याणकारी कानून है। नियोक्ता समय पर मुआवजा देने की जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। ऐसा नहीं होने पर ब्याज और जुर्माना दोनों देना होगा।
जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की अदालत ने गिरिडीह निवासी स्व. लक्ष्मण मंडल की पत्नी सुदामा देवी की याचिका पर फैसला सुनाते हुए 31 अक्टूबर 2014 के श्रम न्यायालय, देवघर के आदेश में संशोधन किया। अदालत ने मुआवजे की मूल राशि 5.83 लाख रुपए पर दुर्घटना की तारीख 26 मई 2012 से भुगतान की तिथि तक ब्याज देने का निर्देश दिया। साथ ही मुआवजे का 50% यानी 2.91 लाख रुपए अतिरिक्त जुर्माने और 5,000 रु. अंतिम संस्कार खर्च भी अदा करने का आदेश दिया।
स्टोन चिप्स उतारने के दौरान हुआ था हादसा मामले के अनुसार, गिरिडीह निवासी लक्ष्मण मंडल गुजरात नंबर के एक ट्रक पर मजदूर के रूप में काम करते थे। 26 मई 2012 को बंगाबाद में स्टोन चिप्स उतारने के दौरान ट्रक पलट गया। इस हादसे में लक्ष्मण गंभीर रूप से घायल हो गए और इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। घटना के संबंध में बंगाबाद थाने में प्राथमिकी दर्ज की गई थी।
श्रम न्यायालय के फैसले में हाईकोर्ट ने किया संशोधन पति की मौत के बाद पीड़िता सुदामा देवी ने कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम के तहत दावा किया था। श्रम न्यायालय देवघर ने 2014 में 5.83 लाख रुपए मुआवजा देने का आदेश तो दिया, लेकिन ब्याज की अवधि, जुर्माना और अंतिम संस्कार खर्च पर स्थिति स्पष्ट नहीं की। इसके खिलाफ सुदामा देवी ने हाईकोर्ट में अपील की थी। हाईकोर्ट ने कहा कि कानूनन दुर्घटना के एक महीने के भीतर मुआवजा न देने पर नियोक्ता पर जुर्माना और ब्याज दोनों लगाया जा सकता है। अदालत ने माना कि पीड़िता को लंबे समय तक वैधानिक अधिकारों से वंचित रखा गया। इसलिए श्रम न्यायालय के आदेश में संशोधन कर सभी वैधानिक लाभ देने का निर्देश दिया गया।
नजीर बनेगा कोर्ट का फैसला यह फैसला कर्मचारी क्षतिपूर्ति मामलों में एक महत्वपूर्ण नजीर बन सकता है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट संदेश दिया है कि मुआवजा केवल मूल राशि तक सीमित नहीं है। यदि नियोक्ता समय पर भुगतान नहीं करता है, तो उसे ब्याज, 50 % तक जुर्माना और अन्य सभी वैधानिक लाभ भी देने होंगे। अदालत ने कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम को एक Ò…बेनेफिशियल लेजिस्लेशन बताते हुए कहा कि मजदूरों और उनके आश्रितों के हितों की रक्षा करना न्यायालय की प्राथमिक जिम्मेदारी है।
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